Friday, September 27, 2013

पुराण- मानव इतिहास

साभार: चाँद शर्मा,http://hindumahasagar.wordpress.com

पुराण शब्द का अर्थ है प्राचीन कथा। पुराण विश्व साहित्य के प्रचीनत्म ग्रँथ हैं। उन में लिखित ज्ञान और नैतिकता की बातें आज भी प्रासंगिक, अमूल्य तथा मानव सभ्यता की आधारशिला हैं। वेदों की भाषा तथा शैली कठिन है। पुराण उसी ज्ञान के सहज तथा रोचक संस्करण हैं। उन में जटिल तथ्यों को कथाओं के माध्यम से समझाया गया है। पुराणों का विषय नैतिकता, विचार, भूगोल, खगोल, राजनीति, संस्कृति, सामाजिक परम्परायें, विज्ञान तथा अन्य विषय हैं। विशेष तथ्य यह है कि पुराणों में देवा-देवताओं, राजाओ, और ऋषि-मुनियों के साथ साथ जन साधारण की कथायें भी उल्लेख करी गयी हैं जिस से पौराणिक काल के सभी पहलूओं का चित्रण मिलता है।

महृर्षि वेदव्यास ने 18 पुराणों का संस्कृत भाषा में संकलन किया है। ब्रह्मा विष्णु तथा महेश्वर उन पुराणों के मुख्य देव हैं। त्रिमूर्ति के प्रत्येक भगवान स्वरूप को छः पुराण समर्पित किये गये हैं। इन 18 पुराणों के अतिरिक्त 16 उप-पुराण भी हैं किन्तु विषय को सीमित रखने के लिये केवल मुख्य पुराणों का संक्षिप्त परिचय ही दिया गया है। मुख्य पुराणों का वर्णन इस प्रकार हैः- 

ब्रह्म पुराणब्रह्म पुराण सब से प्राचीन है। इस पुराण में 246 अध्याय तथा 14000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में ब्रह्मा की महानता के अतिरिक्त सृष्टि की उत्पत्ति, गंगा आवतरण तथा रामायण और कृष्णावतार की कथायें भी संकलित हैं। इस ग्रंथ से सृष्टि की उत्पत्ति से लेकर सिन्धु घाटी सभ्यता तक की कुछ ना कुछ जानकारी प्राप्त की जा सकती है। 

पद्म पुराण - पद्म पुराण में 55000 श्र्लोक हैं और यह गॅंथ पाँच खण्डों में विभाजित है जिन के नाम सृष्टिखण्ड, स्वर्गखण्ड, उत्तरखण्ड, भूमिखण्ड तथा पातालखण्ड हैं। इस ग्रंथ में पृथ्वी आकाश, तथा नक्षत्रों की उत्पति के बारे में उल्लेख किया गया है। चार प्रकार से जीवों की उत्पत्ति होती है जिन्हें उदिभज, स्वेदज, अणडज तथा जरायुज की श्रेणा में रखा गया है। यह वर्गीकरण पुर्णत्या वैज्ञायानिक है। भारत के सभी पर्वतों तथा नदियों के बारे में भी विस्तरित वर्णन है। इस पुराण में शकुन्तला दुष्यन्त से ले कर भगवान राम तक के कई पूर्वजों का इतिहास है। शकुन्तला दुष्यन्त के पुत्र भरत के नाम से हमारे देश का नाम जम्बूदीप से भरतखण्ड और पश्चात भारत पडा था। 

विष्णु पुराण - विष्णु पुराण में 6 अँश तथा 23000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में भगवान विष्णु, बालक ध्रुव, तथा कृष्णावतार की कथायें संकलित हैं। इस के अतिरिक्त सम्राट पृथु की कथा भी शामिल है जिस के कारण हमारी धरती का नाम पृथ्वी पडा था। इस पुराण में सू्र्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास है। भारत की राष्ट्रीय पहचान सदियों पुरानी है जिस का प्रमाण विष्णु पुराण के निम्नलिखित शलोक में मिलता हैःउत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तद भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।(साधारण शब्दों में इस का अर्थ है कि वह भूगौलिक क्षेत्र जो उत्तर में हिमालय तथा दक्षिण में सागर से घिरा हुआ है भारत देश है तथा उस में निवास करने वाले सभी जन भारत देश की ही संतान हैं।) भारत देश और भारत वासियों की इस से स्पष्ट पहचान और क्या हो सकती है? विष्णु पुराण वास्तव में ऐक ऐतिहासिक ग्रंथ है। 

शिव पुराणशिव पुराण में 24000 श्र्लोक हैं तथा यह सात संहिताओं में विभाजित है। इस ग्रंथ में भगवान शिव की महानता तथा उन से सम्बन्धित घटनाओं को दर्शाया गया है। इस ग्रंथ को वायु पुराण भी कहते हैं। इस में कैलास पर्वत, शिवलिंग तथा रुद्राक्ष का वर्णन और महत्व, सप्ताह के दिनों के नामों की रचना, प्रजापतियों तथा काम पर विजय पाने के सम्बन्ध में वर्णन किया गया है। सप्ताह के दिनों के नाम हमारे सौर मण्डल के ग्रहों पर आधारित हैं और आज भी लगभग समस्त विश्व में प्रयोग किये जाते हैं। 

भागवत पुराणभागवत पुराण में 18000 श्र्लोक हैं तथा 12 स्कंध हैं। इस ग्रंथ में अध्यात्मिक विषयों पर वार्तालाप है। भक्ति, ज्ञान तथा वैराग्य की महानता को दर्शाया गया है। विष्णु और कृष्णावतार की कथाओं के अतिरिक्त महाभारत काल से पूर्व के कई राजाओं, ऋषि मुनियों तथा असुरों की कथायें भी संकलित हैं। इस ग्रंथ में महाभारत युद्ध के पश्चात श्रीकृष्ण का देहत्याग, दूारिका नगरी के जलमग्न होने और यादव वँशियों के नाश तक का विवर्ण भी दिया गया है। 

नारद पुराण - नारद पुराण में 25000 श्र्लोक हैं तथा इस के दो भाग हैं। इस ग्रंथ में सभी 18 पुराणों का सार दिया गया है। प्रथम भाग में मन्त्र तथा मृत्यु पश्चात के क्रम आदि के विधान हैं। गंगा अवतरण की कथा भी विस्तार पूर्वक दी गयी है। दूसरे भाग में संगीत के सातों स्वरों, सप्तक के मन्द्र, मध्य तथा तार स्थानों, मूर्छनाओं, शुद्ध ऐवम कूट तानो और स्वरमण्डल का ज्ञान लिखित है। संगीत पद्धति का यह ज्ञान आज भी भारतीय संगीत का आधार है। जो पाश्चात्य संगीत की चकाचौंध से चकित हो जाते हैं उन के लिये उल्लेखनीय तथ्य यह है कि नारद पुराण के कई शताब्दी पश्चात तक भी पाश्चात्य संगीत में केवल पाँच स्वर होते थे तथा संगीत की थि्योरी का विकास शून्य के बराबर था। मूर्छनाओं के आधार पर ही पाश्चात्य संगीत के स्केल बने हैं। 

मार्कण्डेय पुराणअन्य पुराणों की अपेक्षा यह छोटा पुराण है। मार्कण्डेय पुराण में 9000 श्र्लोक तथा 137 अध्याय हैं। इस ग्रंथ में सामाजिक न्याय और योग के विषय में ऋषिमार्कण्डेय तथा ऋषि जैमिनि के मध्य वार्तालाप है। इस के अतिरिक्त भगवती दुर्गा तथा श्रीक़ृष्ण से जुड़ी हुयी कथायें भी संकलित हैं। 
अग्नि पुराणअग्नि पुराण में 383 अध्याय तथा 15000 श्र्लोक हैं। इस पुराण को भारतीय संस्कृति का ज्ञानकोष (इनसाईक्लोपीडिया) कह सकते है। इस ग्रंथ में मत्स्यावतार, रामायण तथा महाभारत की संक्षिप्त कथायें भी संकलित हैं। इस के अतिरिक्त कई विषयों पर वार्तालाप है जिन में धनुर्वेद, गान्धर्व वेद तथा आयुर्वेद मुख्य हैं। धनुर्वेद, गान्धर्व वेद तथा आयुर्वेद को उप-वेद भी कहा जाता है। 

भविष्य पुराणभविष्य पुराण में 129 अध्याय तथा 28000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में सूर्य का महत्व, वर्ष के 12 महीनों का निर्माण, भारत के सामाजिक, धार्मिक तथा शैक्षिक विधानों आदि कई विषयों पर वार्तालाप है। इस पुराण में साँपों की पहचान, विष तथा विषदंश सम्बन्धी महत्वपूर्ण जानकारी भी दी गयी है। इस पुराण की कई कथायें बाईबल की कथाओं से भी मेल खाती हैं। इस पुराण में पुराने राजवँशों के अतिरिक्त भविष्य में आने वाले नन्द वँश, मौर्य वँशों, मुग़ल वँश, छत्रपति शिवा जी और महारानी विक्टोरिया तक का वृतान्त भी दिया गया है। ईसा के भारत आगमन तथा मुहम्मद और कुतुबुद्दीन ऐबक का जिक्र भी इस पुराण में दिया गया है। इस के अतिरिक्त विक्रम बेताल तथा बेताल पच्चीसी की कथाओं का विवरण भी है। सत्य नारायण की कथा भी इसी पुराण से ली गयी है। यह पुराण भी भारतीय इतिहास का महत्वशाली स्त्रोत्र है जिस पर शोध कार्य करना चाहिये। 

ब्रह्मावैवर्ता पुराणब्रह्माविवर्ता पुराण में 18000 श्र्लोक तथा 218 अध्याय हैं। इस ग्रंथ में ब्रह्मा, गणेश, तुल्सी, सावित्री, लक्ष्मी, सरस्वती तथा क़ृष्ण की महानता को दर्शाया गया है तथा उन से जुड़ी हुयी कथायें संकलित हैं। इस पुराण में आयुर्वेद सम्बन्धी ज्ञान भी संकलित है। 

लिंग पुराणलिंग पुराण में 11000 श्र्लोक और 163 अध्याय हैं। सृष्टि की उत्पत्ति तथा खगौलिक काल में युग, कल्प आदि की तालिका का वर्णन है। राजा अम्बरीष की कथा भी इसी पुराण में लिखित है। इस ग्रंथ में अघोर मंत्रों तथा अघोर विद्या के सम्बन्ध में भी उल्लेख किया गया है। 

वराह पुराणवराह पुराण में 217 स्कन्ध तथा 10000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में वराह अवतार की कथा के अतिरिक्त भागवत गीता महामात्या का भी विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इस पुराण में सृष्टि के विकास, स्वर्ग, पाताल तथा अन्य लोकों का वर्णन भी दिया गया है। श्राद्ध पद्धति, सूर्य के उत्तरायण तथा दक्षिणायन विचरने, अमावस और पूर्णमासी के कारणों का वर्णन है। महत्व की बात यह है कि जो भूगौलिक और खगौलिक तथ्य इस पुराण में संकलित हैं वही तथ्य पाश्चात्य जगत के वैज्ञिानिकों को पंद्रहवी शताब्दी के बाद ही पता चले थे। 

स्कन्द  पुराण स्कन्द  पुराण सब से विशाल पुराण है तथा इस पुराण में 81000 श्र्लोक और छः खण्ड हैं। स्कन्द  पुराण में प्राचीन भारत का भूगौलिक वर्णन है जिस में 27 नक्षत्रों, 18 नदियों, अरुणाचल प्रदेश का सौंदर्य, भारत में स्थित 12 ज्योतिर्लिंगों, तथा गंगा अवतरण के आख्यान शामिल हैं। इसी पुराण में स्याहाद्री पर्वत श्रंखला तथा कन्या कुमारी मन्दिर का उल्लेख भी किया गया है। इसी पुराण में सोमदेव, तारा तथा उन के पुत्र बुद्ध ग्रह की उत्पत्ति की अलंकारमयी कथा भी है। 

वामन पुराण - वामन पुराण में 95 अध्याय तथा 10000 श्र्लोक तथा दो खण्ड हैं। इस पुराण का केवल प्रथम खण्ड ही उप्लब्द्ध है। इस पुराण में वामन अवतार की कथा विस्तार से कही गयी हैं जो भरूचकच्छ (गुजरात) में हुआ था। इस के अतिरिक्त इस ग्रंथ में भी सृष्टि, जम्बूदूीप तथा अन्य सात दूीपों की उत्पत्ति, पृथ्वी की भूगौलिक स्थिति, महत्वशाली पर्वतों, नदियों तथा भारत के खण्डों का जिक्र है। 

कुर्मा पुराणकुर्मा पुराण में 18000 श्र्लोक तथा चार खण्ड हैं। इस पुराण में चारों वेदों का सार संक्षिप्त रूप में दिया गया है। कुर्मा पुराण में कुर्मा अवतार से सम्बन्धित सागर मंथन की कथा विस्तार पूर्वक लिखी गयी है। इस में ब्रह्मा, शिव, विष्णु, पृथ्वी, गंगा की उत्पत्ति, चारों युगों, मानव जीवन के चार आश्रम धर्मों, तथा चन्द्रवँशी राजाओं के बारे में भी वर्णन है। 

मतस्य पुराणमतस्य पुराण में 290 अध्याय तथा 14000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में मतस्य अवतार की कथा का विस्तरित उल्लेख किया गया है। सृष्टि की उत्पत्ति हमारे सौर मण्डल के सभी ग्रहों, चारों युगों तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास वर्णित है। कच, देवयानी, शर्मिष्ठा तथा राजा ययाति की रोचक कथा भी इसी पुराण में है
  
गरुड़ पुराणगरुड़ पुराण में 279 अध्याय तथा 18000 श्र्लोक हैं। इस ग्रंथ में मृत्यु पश्चात की घटनाओं, प्रेत लोक, यम लोक, नरक तथा 84 लाख योनियों के नरक स्वरुपी जीवन आदि के बारे में विस्तार से बताया गया है। इस पुराण में कई सूर्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का वर्णन भी है। साधारण लोग इस ग्रंथ को पढ़ने से हिचकिचाते हैं क्यों कि इस ग्रंथ को किसी सम्वन्धी या परिचित की मृत्यु होने के पश्चात ही पढ़वाया जाता है। वास्तव में इस पुराण में मृत्यु पश्चात पुनर्जन्म होने पर गर्भ में स्थित भ्रूण की वैज्ञानिक अवस्था सांकेतिक रूप से बखान की गयी है जिसे वैतरणी नदी आदि की संज्ञा दी गयी है। समस्त योरुप में उस समय तक भ्रूण के विकास के बारे में कोई भी वैज्ञानिक जानकारी नहीं थी। अंग्रेज़ी साहित्य में जान बनियन की कृति दि पिलग्रिम्स प्रौग्रेस कदाचित इस ग्रंथ से परेरित लगती है जिस में एक एवेंजलिस्ट मानव को क्रिस्चियन बनने के लिये प्रोत्साहित करते दिखाया है ताकि वह नरक से बच सके। 
  
ब्रह्माण्ड पुराण - ब्रह्माण्ड पुराण में 12000 श्र्लोक तथा पू्र्व, मध्य और उत्तर तीन भाग हैं। मान्यता है कि अध्यात्म रामायण पहले ब्रह्माण्ड पुराण का ही एक अंश थी जो अभी एक प्रथक ग्रंथ है। इस पुराण में ब्रह्माण्ड में स्थित ग्रहों के बारे में वर्णन किया गया है। कई सूर्यवँशी तथा चन्द्रवँशी राजाओं का इतिहास भी संकलित है। सृष्टि की उत्पत्ति के समय से ले कर अभी तक सात मनोवन्तर (काल) बीत चुके हैं जिन का विस्तरित वर्णन इस ग्रंथ में किया गया है। परशुराम की कथा भी इस पुराण में दी गयी है। इस ग्रँथ को विश्व का प्रथम खगोल शास्त्र कह सकते है। भारत के ऋषि इस पुराण के ज्ञान को इण्डोनेशिया भी ले कर गये थे जिस के प्रमाण इण्डोनेशिया की भाषा में मिलते है। 

हिन्दू पौराणिक इतिहास की तरह अन्य देशों में भी महामानवों, दैत्यों, देवों, राजाओं तथा साधारण नागरिकों की कथायें प्रचिलित हैं। कईयों के नाम उच्चारण तथा भाषाओं की विभिन्नता के कारण बिगड़ भी चुके हैं जैसे कि हरिकुल ईश से हरकुलिस, कश्यप सागर से केस्पियन सी, तथा शम्भूसिहं से शिन बू सिन आदि बन गये। तक्षक के नाम से तक्षशिला और तक्षकखण्ड से ताशकन्द बन गये। यह विवरण अवश्य ही किसी ना किसी ऐतिहासिक घटना कई ओर संकेत करते हैं।

प्राचीन काल में इतिहास, आख्यान, संहिता तथा पुराण को ऐक ही अर्थ में प्रयोग किया जाता था। इतिहास लिखने का कोई रिवाज नहीं था और राजाओ नें कल्पना शक्तियों से भी अपनी वंशावलियों को सूर्य और चन्द्र वंशों से जोडा है। इस कारण पौराणिक कथायें इतिहास, साहित्य तथा दंत कथाओं का मिश्रण हैं।

रामायण, महाभारत तथा पुराण हमारे प्राचीन इतिहास के बहुमूल्य स्त्रोत्र हैं जिन को केवल साहित्य समझ कर अछूता छोड़ दिया गया है। इतिहास की विक्षप्त श्रंखलाओं को पुनः जोड़ने के लिये हमें पुराणों तथा महाकाव्यों पर शोध करना होगा।

साभार
 : चाँद शर्मा,http://hindumahasagar.wordpress.com


Tuesday, September 24, 2013

महीनों के नाम कैसे पड़े ?

महीने के नामों को तो हम सभी जानते हैं, लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि महीनों के यह नाम कैसे पड़े एवं किसने इनका नामकरण किया। नहीं न! तो जानिए.....

जनवरी : रोमन देवता 'जेनस' के नाम पर वर्ष के पहले महीने जनवरी का नामकरण हुआ। मान्यता है कि जेनस के दो चेहरे हैं। एक से वह आगे तथा दूसरे से पीछे देखता है। इसी तरह जनवरी के भी दो चेहरे हैं। एक से वह बीते हुए वर्ष को देखता है तथा दूसरे से अगले वर्ष को। जेनस को लैटिन में जैनअरिस कहा गया। जेनस जो बाद में जेनुअरी बना जो हिन्दी में जनवरी हो गया।

फरवरी : इस महीने का संबंध लेटिन के फैबरा से है। इसका अर्थ है 'शुद्धि की दावत।' पहले इसी माह में 15 तारीख को लोग शुद्धि की दावत दिया करते थे। कुछ लोग फरवरी नाम का संबंध रोम की एक देवी फेबरुएरिया से भी मानते हैं। जो संतानोत्पत्ति की देवी मानी गई है इसलिए महिलाएं इस महीने इस देवी की पूजा करती थीं ताकि वे प्रसन्न होकर उन्हें संतान होने का आशीर्वाद दें।

मार्च : रोमन देवता 'मार्स' के नाम पर मार्च महीने का नामकरण हुआ। रोमन वर्ष का प्रारंभ इसी महीने से होता था। मार्स मार्टिअस का अपभ्रंश है जो आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। सर्दियां समाप्त होने पर लोग शत्रु देश पर आक्रमण करते थे इसलिए इस महीने को मार्च नाम से पुकारा गया।

अप्रैल : इस महीने की उत्पत्ति लैटिन शब्द 'एस्पेरायर' से हुई। इसका अर्थ है खुलना। रोम में इसी माह कलियां खिलकर फूल बनती थीं अर्थात बसंत का आगमन होता था इसलिए प्रारंभ में इस माह का नाम एप्रिलिस रखा गया। इसके पश्चात वर्ष के केवल दस माह होने के कारण यह बसंत से काफी दूर होता चला गया। वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के सही भ्रमण की जानकारी से दुनिया को अवगत कराया तब वर्ष में दो महीने और जोड़कर एप्रिलिस का नाम पुनः सार्थक किया गया।

मई : रोमन देवता मरकरी की माता 'मइया' के नाम पर मई नामकरण हुआ। मई का तात्पर्य 'बड़े-बुजुर्ग रईस' हैं। मई नाम की उत्पत्ति लैटिन के मेजोरेस से भी मानी जाती है।

जून : इस महीने लोग शादी करके घर बसाते थे। इसलिए परिवार के लिए उपयोग होने वाले लैटिन शब्द जेन्स के आधार पर जून का नामकरण हुआ। एक अन्य मतानुसार जिस प्रकार हमारे यहां इंद्र को देवताओं का स्वामी माना गया है उसी प्रकार रोम में भी सबसे बड़े देवता जीयस हैं एवं उनकी पत्नी का नाम है जूनो। इसी देवी के नाम पर जून का नामकरण हुआ।

जुलाई : राजा जूलियस सीजर का जन्म एवं मृत्यु दोनों जुलाई में हुई। इसलिए इस महीने का नाम जुलाई कर दिया गया।

अगस्त : जूलियस सीजर के भतीजे आगस्टस सीजर ने अपने नाम को अमर बनाने के लिए सेक्सटिलिस का नाम बदलकर अगस्टस कर दिया जो बाद में केवल अगस्त रह गया।

सितंबर : रोम में सितंबर सैप्टेंबर कहा जाता था। सेप्टैंबर में सेप्टै लेटिन शब्द है जिसका अर्थ है सात एवं बर का अर्थ है वां यानी सेप्टैंबर का अर्थ सातवां किन्तु बाद में यह नौवां महीना बन गया।

अक्टूबर : इसे लैटिन 'आक्ट' (आठ) के आधार पर अक्टूबर या आठवां कहते थे किंतु दसवां महीना होने पर भी इसका नाम अक्टूबर ही चलता रहा।

नवंबर : नवंबर को लैटिन में पहले 'नोवेम्बर' यानी नौवां कहा गया। ग्यारहवां महीना बनने पर भी इसका नाम नहीं बदला एवं इसे नोवेम्बर से नवंबर कहा जाने लगा।


दिसंबर : इसी प्रकार लैटिन डेसेम के आधार पर दिसंबर महीने को डेसेंबर कहा गया। वर्ष का 12वां महीना बनने पर भी इसका नाम नहीं बदला।

Monday, September 23, 2013

पांच प्रकार की गृहणियां - बुद्ध

घर की लक्ष्मी कौन?

एक बार गौतम बुद्ध अनाथपिंडक सेठ के घर पधारे। वे बातचीत कर ही रहे थे कि अंतःपुर में कलह होने की आवाज सुनाई दी। तथागत के उस संबंध में पूछने पर सेठ ने बताया कि वे अपनी बहू सुजाता के कारण बड़े परेशान हैं। वह बड़ी अभिमानिनी है, पति का अनादर करती है और हमारी अवज्ञा। इसी कारण घर में हमेशा कलह रहता है।

तथागत ने सेठ से बहू को भेजने को कहा। उसके आने पर उन्होंने उससे प्रश्न किया- 'बताओ भला, तुम वधिकसमा, चोरसमा, आर्यसमा, मातृसमा तथा भगिनीसमा इन पांच प्रकार की गृहिणियों में से कौन हो?'

सुजाता बोली- 'मैं इनका तात्पर्य समझी नहीं। कृपया स्पष्ट करें।'

तब तथागत बोले-

* 'जो गृहिणी हमेशा क्रोध करती रहती है, जिसका पति पर बिलकुल प्रेम नहीं होता, जो उसका अपमान करती है और परपुरुष पर मुग्ध होती है, वह ठीक एक हत्यारिणी के समान ती है और इसीलिए ऐसी स्त्रियों को 'वधिकसमा' कहा जाता है।

* जो अपने पति की संपत्ति का सदुपयोग नहीं करती, वरन्‌ उसे चुराकर अपने उपभोग में लाती है वह 'चोरसमा' होती है।

* जो आलसी होती है बिलकुल काम नहीं करती, कर्कशा होती है तथा पति के सामने अपना बड़प्पन दिखाती है, वह 'आर्यसमा' होती है।

* जो हमेशा अपने पति का चिंतन करती है, अपने प्राणों से भी अधिक उसकी रक्षा करती है, वह 'मातृसमा' होती है।

* जो बहन के समान पति पर स्नेह करती है तथा लज्जापूर्वक उसका अनुगमन करती है, वह 'भगिनीसमा' होती है। तब बताओ भला, तुम इनमें से कौन हो?'

यह सुनते वह तथागत के चरणों में गिर पड़ी और बोली- 'भगवन्‌ ! मुझे क्षमा करें। इनमें से मैं कौन हूं, यह बताने में मेरी वाणी असमर्थ है, किंतु आपको विश्वास दिलाती हूं कि आज से मैं अपने पति और बड़ों का आदर करूंगी तथा उनका जी नहीं दुखाऊंगी। आज से मैं अपने को घर की दासी मानकर ही जीवनयापन करूंगी।'

Friday, September 13, 2013

हिंदी दिवस

‘हिंदी दिवस’ प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को मनाया जाता है। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि ‘हिन्दी’ ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर सन् 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है।

हिंदी भाषा को देवनागरी लिपि में सन 1950 में अनुच्छेद 343 के अंतर्गत राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया।

हिंदी भाषा प्रेम, मिलन और सौहार्द की भाषा है,इस भाषा की उत्पत्ति ही इस बात का प्रमाण है। हिंदी मुख्यतः आर्यों और पारसियों की देन है। हिंदी के अधिकतम शब्द संस्कृत,अरबी और फारसी भाषा से लिए गये है और यह भाषा अवधी,ब्रज आदि स्थानीय भाषाओँ का परिवर्धन भी है। इसीलिए तो इस भाषा को ‘सम्बन्ध भाषा’ के नाम से भी जाना जाता है। हिंदी (खड़ी बोली) की पहली कविता प्रख्यात कवि ‘अमीर खुसरों’ ने लिखी थी।

स्वतंत्रता संग्राम के समय तो हिंदी का प्रयोग अपने चरम पर था। भारतेंदु हरिश्चंद्र, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, हरिशंकर परसाई, महादेवी वर्मा, हरिवंश राय बच्चन,सुभद्रा कुमारी चौहान जैसे लेखकों और कवियों ने अपने शब्दों से जन मानस के ह्रदय में स्वतंत्रता की अलख जलाकर इस संग्राम में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। महात्मा गांधीजी के स्वदेशी आन्दोलन में तो अंग्रेजी भाषा का पूर्ण रूप से त्याग कर हिंदी भाषा को अपनाया गया।

हिंदी  भाषा का स्वरुप ही अलग है, यह भाषा अत्यंत मीठी और खुले प्रकृति की भाषा है। हिंदी अपने अन्दर हर भाषा को अन्तर्निहित कर लेती है और अपने इसी गुण के कारण ही वर्तमान में विश्व की चौथी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। यह भाषा केवल एक देश तक सीमित नही है, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन, दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया, सिंगापुर जैसे कई देशों तक इसका विस्तार है। हिंदी का सरल स्वाभाव इसकी लोकप्रियता को बढ़ा रहा है।  कुछ बाधाएं आयी है इसके मार्ग में,पर हमें पूर्ण विश्वास है कि हिंदी हमारे दिल में यूं ही समाकर हमारी भावनाओं को जन-जन तक पहुंचती रहेगी और राष्ट्रभाषा के रूप में हमे गौरान्वित करती रहेगी।

संस्कृत और हिंदी देश के दो भाषा रूपी स्तंभ हैं जो देश की संस्कृति, परंपरा और सभ्यता को विश्व के मंच पर बखूबी प्रस्तुत करते हैं। आज विश्व के कोने-कोने से विद्यार्थी हमारी भाषा और संस्कृति को जानने के लिए हमारे देश का रुख कर रहे हैं।

हिंदी भाषा को हम राष्ट्र भाषा के रूप में पहचानते हैं। हिंदी भाषा विश्व में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली तीसरी भाषा है।

देश के गुलामी के दिनों में यहाँ अँग्रेज़ी शासनकाल होने की वजह से, अंग्रेजी का प्रचलन बढ़ गया था। लेकिन स्वतंत्रता के पश्चात देश के कई हिस्सों को एकजुट करने के लिए एक ऐसी भाषा की जरुरत थी जो सर्वाधिक बोली जाती है, जिसे सीखना और समझना दोनों ही आसान हों।

इसके साथ ही एक ऐसी भाषा की तलाश थी जो सरकारी कार्यों, धार्मिक क्रियाओं और राजनीतिक कामों में आसानी से प्रयोग में लाई जा सके। हिंदी भाषा ही तब एक ऐसी भाषा थी जो सबसे ज्‍यादा लोकप्रिय थी।

धीरे-धीरे हिंदी भाषा का प्रचलन बढ़ा और इस भाषा ने राष्ट्रभाषा का रूप ले लिया। अब हमारी राष्ट्रभाषा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बहुत पसंद की जाती है। इसका एक कारण यह है कि हमारी भाषा हमारे देश की संस्कृति और संस्कारों का प्रतिबिंब है।

हिंदी भाषा से जुड़े कुछ रोचक तथ्य :

- आपको यह जानकर भी आश्चर्य होगा कि हिंदी भाषा के इतिहास पर पहले साहित्य की रचना भी ग्रासिन द तैसी, एक फ्रांसीसी लेखक ने की थी।

- हिंदी और दूसरी भाषाओं पर पहला विस्तृत सर्वेक्षण सर जॉर्ज अब्राहम ग्रीयर्सन (जो कि एक अंग्रेज हैं) ने किया।

- हिंदी भाषा पर पहला शोध कार्य ‘द थिओलॉजी ऑफ तुलसीदास’ को लंदन  विश्वविद्यालय में पहली बार एक अंग्रेज विद्वान जे.आर.कार्पेंटर ने प्रस्तुत किया था।

Wednesday, September 11, 2013

विवेकानंद का ऐतिहासिक भाषण

स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के शिकागो में 11 सितंबर, 1893 को आयोजित विश्व धर्म संसद में जो भाषण दिया था उसकी प्रतिध्वनि युगों-युगों तक सुनाई देती रहेगी। आज स्वामीजी के भाषण को 120 साल पूरे हो रहे हैं। शिकागो में दिए भाषण के मुख्य अंश

मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों!

आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया है उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा है। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परंपरा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूं। धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूं और सभी संप्रदायों एवं मतों के कोटि-कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूं।
मैं इस मंच पर से बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूं जिन्होंने आपको यह बतलाया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं।
मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूं जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृत दोनों की ही शिक्षा दी है। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरन समस्त धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं।
मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। 
मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता है कि हमने अपने वक्ष में उन यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मंदिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था।
ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूं जिसने महान जरथुष्ट्र जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है।
भाइयों, मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियां सुनाता हूं जिसकी आवृत्ति मैं बचपन से कर रहा हूं और जिसकी आवृत्ति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं :
।।रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम। नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।।
अर्थात् जैसे विभिन्न नदियां भिन्न-भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न-भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जाने वाले लोग अंत में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।
यह सभा, जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है स्वत: ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा करती है :
।।ये यथा मा प्रपद्यंते तांस्तथैव भजाम्यहम। मम वत्मार्नुर्वतते मनुष्या: पार्थ सर्वश:।।
अर्थात् जो कोई मेरी ओर आता है- चाहे किसी प्रकार से हो, मैं उसको प्राप्त होता हूं। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अंत में मेरी ही ओर आते हैं।
सांप्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मांधता इस सुंदर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं व उसको बारंबार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को ध्वस्त करती हुई पूरे के पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं।
यदि ये वीभत्स दानवी शक्तियां न होतीं तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता। पर अब उनका समय आ गया है और मैं आंतरिक रूप से आशा करता हूं कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घंटाध्वनि हुई है वह समस्त धर्मांधता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होने वाले सभी उत्पीड़नों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्परिक कटुता का मृत्यु निनाद सिद्ध हो।

Wednesday, September 4, 2013

आधुनिक कचरा यानी ई-वेस्ट

आधुनिक कचरा

सोफे पर बैठे-बैठे हम खबरों की दुनिया से निकलकर फिल्मी दुनिया में घूमने लगते हैं। रिमोट के बटन के आसरे चैनल बदलने का सिलसिला शुरू हो जाता है। कंप्यूटर पर उंगलियों के आसरे हम दुनियाभर में होने वाली गतिविधियों को महसूस कर सकते हैं। दो दशक पहले तक जिंदगी इतनी आसान नही थी। लेकिन अब वक्त बदल गया है क्योंकि अब हमारे पास इलेक्ट्रॉनिक साधनों की भरमार है। जहाँ इनइलेक्ट्रॉनिक साधनों के आसरे लोगों की जिंदगी कठिनाईयों और लेटलतीफी से बाहर निकली, वहीं इनके बढ़ते इस्तेमाल ने लोगों के लिए एक बहुत बड़ा ख़तरा भी पैदा कर दिया। और ये खतरा है ई-वेस्ट
आखिर क्या है ये ई-वेस्ट, क्यों आज इस विषय पर चर्चा हो रही है और क्या जरूरत पड़ी सरकार को ई-कचरा (प्रबंधन एवं संचालन) अधिनियम 2011 को लागू करने की।
इलेक्ट्रॉनिक साधनों के बिना जिंदगी गुजारना किसी भयावह सपने से कम नही है। बिना कंप्यूटर के ऑफिसो में काम नामुमकिन होता जा रहा है, घरों में बच्चे वीडियोगेम खेलने के लिए कंप्यूटरों का इस्तेमाल करने लगे हैं, स्कूली पाठ्यक्रमों में कम्प्यूटर जरूरी हो गया है। तेजी से बढ़ते कंप्यूटरमेनिया  से ई-वेस्ट में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। जहाँ पहले एक कंप्यूटर की उम्र 7 से 8 साल हुआ करती थी वहीं वो घटकर 3से 4 साल हो गई है। देश में अभी करीब 8 करोड़ कंप्यूटर हैं और आप जानकर चौंक जाएंगे कि अगले पाँच साल में इसकी संख्या बढ़कर दोगुनी से भी ज्यादा हो जाएगी। लोगों के घरों में मनोरंजन के साधन टेलीविजन की आबादी भी 2015 तक बढ़कर 24 करोड़ के आसपास पहुँच जाएगी। वहीं बात की जाए मोबाइल्स की तो भारत में इसके यूजर भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारत में लगभग 70 करोड़ मोबाइल इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ई-वेस्ट का प्रबंधन करने वाली कंपनियों का मानना है  कि किसी मोबाइल फोन को 98 फीसदी तक रिसाइकिल किया जा सकता है, उसी तरह कंप्यूटर की रिसाइकिलिंग भी कई तरह के नए उत्पादों को जन्म दे सकती है। मेमोरी डिवाइस, एमपी3 प्लेयर और आईपॉड, ई-वेस्ट में निश्चित तौर पर इज़ाफा करते हैं।
ई-वेस्ट के बढ़ते इस्तेमाल ने बाजार को एक नया कारोबार खोलने के लिए भी प्रेरित किया है। इलैक्ट्रोनिक साधनों के बढ़ते इस्तेमाल और उसके बाद उससे  होने वाले खतरों को देखते हुए विशेषज्ञों ने वेस्ट मैनेजमेंट का रास्ता सबके सामने रखा। इलैक्ट्रोनिक कचरे को फिर से इस्तेमाल करने का तरीका है वेस्ट मैनेजमेंट। इसमें कचरे को नष्ट करने की बजाए उसे रिसाइकिल किया जाता है। इलैक्ट्रोनिक कचरा पैदा करने के मामले में अव्वल देश होने के नाते ये जरूरी होता है कि भारत सरकार इसे लेकर कुछ प्रयास करे। इसी कड़ी में मंगलवार को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की अधिसूचना प्रभावी हो गई। मंगलवार से प्रभावी हुए ई-कचरा (प्रबंधन एवं संचालन)अधिनियम 2011 के प्रावधान के मुताबिक जो कंपनियां इलेक्ट्रोनिक उत्पाद बनाती हैं उसे सही ढंग से रिसाइकल करने की जिम्मेदारी उन्हीं की होगी। इसके लिए कंपनियों को जगह- जगह कुछ ऐसे सेंटर खोलने होंगे जहाँ इन उत्पादों की कलेक्शन हो सके। इतना ही नही इन रिसाइकल केंद्रों के प्रति लोगो को जागरूक करने का काम भी निर्माता कंपनियों को ही करना होगा। अहम बात ये है कि यह कानून एक साल पहले ही बन गया था लेकिन कंपनियों ने अब तक रिसाइकिलिंग सेंटर्स के बारे में जागरूकता संबंधी कार्यक्रम चलाए हों ऐसा प्रतीत नही होता। दिलचस्प बात तो ये है कि कंपनियाँ अभी तक ये भी सुनिश्चित नही कर पाई है कि जो लोग ई-कचरा कंपनियों को लौटाएंगे उसके एवज उन्हें कितनी कीमत दी जाएगी। कंपनियाँ इस सामान को मुफ्त में लेना चाहती हैं लेकिन गौरतलब है कि जब कबाड़ी भी हमसे ई-कचरा ले जाता है तो वो भी उसकी कुछ कीमत अदा करता है तो बड़ा सवाल ये है कि कंपनियाँ इससे क्यों इंकार कर रही हैं
हालांकि इस मामले में कंपनियां कहती हैं कि उन्हें ई-वेस्ट को रिसाइकिल करने में खर्चा करना पड़ेगा। अगर सरकारी पक्ष पर ध्यान दें तो पाएंगे कि सरकार  भी इस मामले में लोगों को जागरूक करने में विफल ही रही है। लोग अभी भी ई-कचरे के निपटान को लेकर जागरूक नही है। एक अनुमान के मुताबिक करीब 3.5 लाख टन ई-कचरा सालान दिल्ली में इकट्ठा होता है और उस कचरे का अवैज्ञानिक ढंग से निपटारा किया जा रहा है।  दरअसल कचरे के अवैज्ञानिक ढंग से निपटान करने की वजह से पर्यावरण और लोगों को काफी नुकसान हो रहा है। गौर करने की बात ये है ई-कचरे के अवैज्ञानिक तरीके से निपटारा होने के एवज में पर्यावरण एवं संरक्षण अधिनियम के तहत कार्रवाई तक का प्रावधान है। दोषी पाए जाने पर 5 साल तक की सज़ा और 1 लाख रूपये के जुर्माने तक का प्रावधान है। लेकिन दुर्भाग्य है कि ई-कचरे के निपटारा एक गोरखधंधा बन गया है और कई जिंदगियों को नाश करने पर तुला हुआ है।
जनसंख्या का लगातार बढ़ना और  आर्थिक विकास की राह पर दौड़ते भारत के सामने इस कचरे का अंबार लगातार बढ़ता जा रहा है। कार्बनिक उत्पाद, गंदगी और धूल लगभग 80 फीसदी कचरे को पैदा करते है। बढ़ती जनसंख्या की वजह से इस कचरे को पैदा होने से रोका तो नही जा सकता लेकिन इसका मैनेजमेंट करके इसका सही इस्तेमाल जरूर किया जा सकता है। एक्सर्ट्स के अनुसार तीन तरीकों से इलैक्ट्रोनिक कचरे को मैनेज किया जा सकता है। पहला तरीका है जमीन में गड्ढा खोदकर कचरा गाडना, दूसरा है कचरे को इकट्ठा करके उसे जलाना और तीसरा और सबसे कारगर तरीका है कचरे को रिसाइकिल करके फिर से इस्तेमाल करना। विशेषज्ञ इस तरीके को सबसे कारगर समझते हैं।  देश में सन् 2000 से पहले कचरे को रिसाइकिल करने की नीति नही थी। लेकिन उसी साल सरकार ने इस पर सोचना शुरू किया।
वेस्ट मैनेजमेंट की नीतियाँ समाज के हर तबके के हिसाब से अलग-अलग बनाई गई। ये नीतियाँ विकसित और विकासशील देशों के लिए अलग है और शहरी और ग्रामीण इलाकों के लिए अलग। औद्योगिक क्षेत्रों के लिए भी अलग से नीतियाँ बनाई गई, इन नीतियों पर कुछ देशों में तो काम हो रहा है लेकिन भारत में  इस ओर न के बराबर ध्यान दिया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया में कचरा इकट्ठा करने के लिए म्युनिसिपैलिटी हर एक मकान मालिक को तीन तरह के डस्टबिन देती है, जिनमें रिसाइकिल होने वाला कचरा, साधारण कचरा और बगीचे का कचरा अलग-अलग डाला जाता है। वहीं कनाडा में सारे शहर का कूड़ा इकट्ठा कर उसे रिसाइकिल किया जाता है। कनाडा में गाँवों में ट्रांसफर स्टेशन बनाकर कचरा रिसाइकिल केंद्रों को भेजा जाता है।  दरअसल भारत में इस तरह के प्रयोगों की तरफ ज्यादा ध्यान नही दिया जाता। कुछ एनजीओ भी इस विषय पर काम कर रहे हैं लेकिन भारत में इस प्रयास को जागरूकता के अभाव में वो कामयाबी नही मिल पा रही जो विदेशों में मिल रही है.। ई-वेस्ट मैनेजमेंट को कारोबार के तौर पर भी कई कंपनियाँ अपना रही है और देश में जिस तरह से इलैक्ट्रोनिक साधनों का प्रयोग बढ़ रहा है  उससे इन कंपनियों के सुनहरे भविष्य को लेकर कोई आशंका नज़र नही आती।
चिंता कि बात तो ये है कि इलैक्ट्रोनिक कचरे ने लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी बड़ा खतरा पैदा कर दिया है। इलैक्ट्रोनिक कचरा कई तरह की बीमारियों को पैदा करता है, जिनमें सांस से संबंधित बीमारियों के अलावा,स्किन से संबंधित बीमारियाँ, हैपेटाइटिस-बी शामिल है। आपको जानकर हैरानी होगी कि ई-वेस्ट कैंसर तक का खतरा पैदा करने का माद्दा रखता है। इसके अलावा कई तरह की संक्रमित बीमारियों को जन्म देता है ई-वेस्ट। ई-वेस्ट के खतरे को रोकने के लिए कई तरह के प्रोग्राम भी चलाए जा रहे हैं जिनमें स्वास्थ्य कर्मियों, कार्यकर्ताओं और गैरसरकारी संगठनों को शिक्षित किया जा रहा है। इस समस्या का सामना करने के लिए इग्नू ने वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाईजेशन के साथ हाथ मिलाकर कई तरह के कार्यक्रमों की शुरूआत भी की है। हालांकि जैसे-जैसे लोगों में जागरूकता आएगी इस ओर सुधार आएगा, लेकिन ये भी सच्चाई है कि जागरूकता का स्तर जिस गति से बढ़ेगा उस गति से इलैक्ट्रोनिक साधनों के प्रयोग में भी इज़ाफा होगा और ये निश्चित तौर पर गंभीर समस्या को ही जन्म देगा।
ई-वेस्ट के तौर पर ज्यादा चर्चा हमारे देश में नही होती बल्कि भारत ई-वेस्ट उत्पादन के मामले में अव्वल देशों में गिना जाता है। दुनियाभर में 80 प्रतिशत ई-वेस्ट चीन,पाकिस्तान और भारत में पैदा होता है और दुर्भाग्य है कि ई-वेस्ट को मैनेज करने के बारे में सबसे कम जागरूकता इन्हीं देशों मे देखने को मिलती है। ई-वेस्ट निश्चित तौर पर कई बीमारियों को तो जन्म देता ही है उसके साथ पर्यावरण के लिए भी भयानक खतरा पैदा करता है और ये खतरा भारतीयों की बढ़ती तादात के बाद और भी भयानक रूप में सामने आने की कगार पर है। किसी वस्तु को कई बार इस्तेमाल करना भारतीय मानसिकता का पॉजिटिव पहलू है। भारतीय घरों में इलैक्ट्रोनिक साधनों की चिपों में से तांबा और मेटल निकालने का काम जोरों पर होता है और यही मेटल और तांबा मल्टीनेशनल कंपनियों में दोबारा इस्तेमाल के लिए पहुँचता है। दरअसल रिसाइकिलिंग का काम भारत में निचले स्तर पर तो हो रहा है लेकिन इसे ऑर्गेनाइज्ड तौर से करना उतना ही जरूरी है जितना अस्पतालों में दवाइयों का वितरण और बात अस्पताल की आ ही गई है तो हम आपको बता दें कि अस्पतालों से भी बहुत बड़ी मात्रा में ई-कचरा पैदा होता है। मल्टीनेशनल कंपनियाँ अपने फायदे के लिए भारत के गरीब क्षेत्रों में छोटे स्तर पर इलैक्ट्रोनिक पार्टस की रिसाइकिलिंग करवा रही है जिससे लोगों के स्वास्थ्य को भयंकर खतरा है।

दुर्भाग्य है कि इन गैरसंगठित मजदूरों के लिए सरकार के पास किसी भी तरह का कोई ब्लू प्रिंट नही है।  दिल्ली का सीलमपुर ,मुंडका और नेहरू प्लेस, सैकेंड हैंड इलैक्ट्रोनिक पार्टस के एक बहुत बड़े बाजार के रूप में उभर रहे हैं। उसी तरह मुंबई का धारावी इलाका भी गैरसंगठित मजदूरों की फैक्ट्री बन गया है, जहाँ मल्टीनेशनल कंपनियों के सैकड़ों एजेंट अपने ही लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। कोड़ी के भाव के खराब हो चुके पार्टस रिसाइकिल होने के बाद हजारों की कीमत का भाव रखते हैं। नदियों की अविरल बहती धारा में बड़े पैमाने पर इन पार्टस का गंदा पानी जहर के रूप में घोला रहा है। सरकार से सवाल है कि क्या ये जनता के अधिकारों का हनन नही है? उनके स्वास्थ्य से खिलवाड़ का हक आखिर इस धंधे में लगे लोगों को किसने दिया? ई-कचरे को जमीन में दबाना या जलाना एक वैकल्पिक उपाय तो हो सकता है लेकिन उस कचरे की रिसाइकिलिंग निश्चित तौर पर एक बेहतर उपाय होगी, लेकिन इसके लिए जरूरत है एक राष्ट्रीय सोच की और सबसे अधिक जागरूकता की। सरकार की पहल, इंतजार ही बढाएगी इसलिए जागरूकता का प्रसार अपने स्तर पर शुरू हो जाना चाहिए। ई-वेस्ट बहुत बड़ा खतरा है, जब तक उसे मैनेज न किया जाए। मैनेज करने के बाद वो निश्चित तौर पर किफायती ही साबित होगा।

Monday, September 2, 2013

'नमस्कार' क्यों जरूरी और नमस्कार के लाभ

'नम:' धातु से बना है 'नमस्कार'। नम: का अर्थ है नमन करना या झुकना। नमस्कार का मतलब पैर छूना नहीं होता। नमस्कार शब्द हिन्दी, गुजराती, मराठी, तमिल, बंगाली आदि वर्तमान में प्रचलित भाषाओं का शब्द नहीं है। यह हिन्दू धर्म की भाषा संस्कृत का शब्द है। संस्कृत से ही सभी भाषाओं का जन्म हुआ।
हिन्दू और भारतीय संस्कृति के अनुसार मंदिर में दर्शन करते समय या किसी सम्माननीय व्यक्ति से मिलने पर हमारे हाथ स्वत: ही नमस्कार मुद्रा में जुड़ जाते हैं। नमस्कार करते समय व्यक्ति क्या करें और क्या न करें इसके भी शास्त्रों में नियम हैं। नियम से ही समाज चलता है।

नमस्कार के मुख्यत: तीन प्रकार हैं:- सामान्य नमस्कार, पद नमस्कार और साष्टांग नमस्कार।
सामान्य नमस्कार : किसी से मिलते वक्त सामान्य तौर पर दोनों हाथों की हथेलियों को जोड़कर नमस्कार किया जाता है। प्रतिदिन हमसे कोई न कोई मिलता ही है, जो हमें नमस्कार करता है या हम उसे नमस्कार करते हैं।
पद नमस्कार : इस नमस्कार के अंतर्गत हम अपने परिवार और कुटुम्ब के बुजुर्गों, माता-पिता आदि के पैर छूकर नमस्कार करते हैं। परिवार के अलावा हम अपने गुरु और आध्यात्मिक ज्ञान से संपन्न व्यक्ति के पैर छूते हैं।
साष्टांग नमस्कार : यह नमस्कार सिर्फ मंदिर में ही किया जाता है। षड्रिपु, मन और बुद्धि, इन आठों अंगों से ईश्वर की शरण में जाना अर्थात साष्टांग नमन करना ही साष्टांग नमस्कार है।
सामान्य नमस्कार :
1.कभी भी एक हाथ से नमस्कार न करें और न ही गर्दन हिलाकर नमस्कार करें। दोनों हाथों को जोड़कर ही नमस्कार करें। इससे सामने वाले के मन में आपके प्रति अच्छी भावना का विकास होगा और आप में भी। इसे मात्र औपचारिक अभिवादन न समझें।
2.नमस्कार करते समय मात्र 2 सेकंड के लिए नेत्रों को बंद कर देना चाहिए। इससे आंखें और मन रिफ्रेश हो जाएंगे।
3.नमस्कार करते समय हाथों में कोई वस्तु नहीं होनी चाहिए।  
पाद नमस्कार : 
1. ऐसे किसी व्यक्ति के पैर नहीं छूना चाहिए जिसे आप अच्छी तरह जानते नहीं हों या जो आध्यात्मिक संपन्न व्यक्ति नहीं है। बहुत से लोग आजकल चापलूसी या पद-लालसा के चलते राजनीतिज्ञों के पैर छूते रहते हैं, जो कि गलत है। 

साष्टांग नमस्कार : इसे दंडवत प्रणाम भी कहते हैं।
1. मंदिर में नमस्कार करते समय या साष्टांग नमस्कार करते वक्त पैरों में चप्पल या जूते न हों।
2. मंदिर में नमस्कार करते समय पुरुष सिर न ढंकें और स्त्रियों को सिर ढंकना चाहिए। हनुमान मंदिर और कालिका के मंदिर में सभी को सिर ढंकना चाहिए।
3. हाथों को जोड़ते समय अंगुलियां ढीली रखें। अंगुलियों के बीच अंतर न रखें। हाथों की अंगुलियों को अंगूठे से दूर रखें। हथेलियों को एक-दूसरे से न सटाएं, उनके बीच रिक्त स्थान छोड़ें।
4. मंदिर में देवता को नमन करते समय सर्वप्रथम दोनों हथेलियों को छाती के समक्ष एक-दूसरे से जोड़ें। हाथ जोड़ने के उपरांत पीठ को आगे की ओर थोड़ा झुकाएं।
5. फिर सिर को कुछ झुकाकर भ्रूमध्य (भौहों के मध्यभाग) को दोनों हाथों के अंगूठों से स्पर्श कर, मन को देवता के चरणों में एकाग्र करने का प्रयास करें।
6. इसके बाद हाथ सीधे नीचे न लाकर, नम्रतापूर्वक छाती के मध्यभाग को कलाइयों से कुछ क्षण स्पर्श कर, फिर हाथ नीचे लाएं।

नमस्कार के लाभ : अच्छी भावना और तरीके से किए गए नमस्कार का प्रथम लाभ यह है कि इससे मन में निर्मलता बढ़ती है। निर्मलता से सकारात्मकता का विकास होता है। अच्छे से नमस्कार करने से दूसरे के मन में आपके प्रति अच्छे भावों का विकास होता है।
इस तरह नस्कार का आध्यात्मिक और व्यावहारिक दोनों ही तरह का लाभ मिलता है। इससे जहां दूसरों के प्रति मन में नम्रता बढ़ती है वहीं मंदिर में नमस्कार करने से व्यक्ति के भीतर शरणागत और कृतज्ञता के भाव का विकास होता है। इससे मन और मस्तिष्क शांत होता है और शीघ्र ही आध्यात्मिक सफलता मिलती है।