Thursday, June 18, 2009

स्विस को स्विच करो. ..

एक कविता सुना था खाए जाओ घूस दनादन कौन पकड़ने वाला। लेकिन यहाँ पर घूस खा रहे हैं साथ ही स्विट्जर्लैंड को भारत का देसी घी भी पिला रहे हो। अब यहाँ भले सूखी रोटी खा रहे हों। लेकिन देश के मलाईदार लोग ख़ुद मलाई खाने के आलावा विदेश को भी मलाई खिला रहे हैं जैसे उनका कोई क़र्ज़ खाया हो।
चुनाव के पहले स्विस बैंक ने खूब सुर्खियाँ बटोरी लेकिन नतीजे आते ही सबके दिमाग से स्विस का स्विच ऑफ़ हो गया। स्विस बैंक में जमा काला धन जग जाहिर हैं । अगर बैंक में जमा राशि के बारे में बात किया जाए तो सबसे पहले दुनिया के सामने २००६ में रिपोर्ट आयी थी। उस रिपोर्टके मुताबिक १४५६ बिलियन डॉलरयानी करीब ७४ लाख ९८ करोड़ रूपया भारत का स्विस बैंक में जमा है। और यह राशि दुनिया के सभी देशों की जमा राशि से ज्यादा है।
एक मोटे अनुमान के मुताबिक पूर्व राष्ट्रपति डॉ। शर्मा के जमाने में इस राशि का अनुमान एक लाख करोड़ रुपया था। इसके बाद श्री के.आर.नारायण के ज़माने में अनुमान दो लाख करोड़ रूपया का था। और साल २००६ में ये राशि बढ़कर तकरीब ७५ लाख रुपये में पहुँच गयी थी। और २००९ में मार्च माह के अंत में २३ लाख करोड़ रुपये की बढोत्तरी की संभावनाएं मिली हैं। यानी भारत की लगभग ९७ लाख करोड़ रुपये स्विट्जर्लैंड मैं जमा है।
अब यक्ष सवाल ये उठता है की इतनी भारी भरकम राशि वहाँ पडी हुयी है इधर देश के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने वर्ल्ड बैंक से बड़ी रकम क़र्ज़ के रूप में उठाने का फैसला किया है। बताया जा रहा है कि यह रकम लगभग ४.२ अरब अमेरिकी डॉलर होगी। आर्थिक मंदी से जूझ रहे बैंक व्यवसाय को राहत पहुचाने के लिए ये कदम उठाया जा रहा है। अब ऐसे में यही लगता है हम कर्ज में मरेंगे क्योंकि मनमोहन सरकार कर्ज की धार से मारेगी। वैसे भी भारत वर्ल्ड बैंक का ही घी पीता रहा है । आज भी हम मानसिक गुलामी का दंश ६० साल बाद भी झेल रहे है। और देश बहाली के बजाय बदहाली की ओर जा रहा है ऐसे में जरूरत है कि हम अपने पैसों को ही लाने की करवाई क्यों न करें जिससे कर्ज के मर्ज से बचा जा सके साथ ही काला धन भी देश में आ जाएगा इसी लिए भारत सरकार को जरूरत है कि स्विस बैंक की स्विच को ऑन करें।



Thursday, June 11, 2009

सीनातान कर बोलता नस्लवाद

जिस जगह को भारतीयों ने विद्या का घर बनाया। जहाँ क्रिकेट के मैदान पर चौके छक्के लगते थे। वो जगह अब नस्लवाद का ऑपरेशन थियेटर बन गया है। अब कितने आश्चर्य की बात है किजिस रंगभेद के ख़िलाफ़ अथक संघर्ष कर नेल्सन मंडेला ने दक्षिण अफ्रीका में उसका नामोनिशान मिटा डाला। और अमेरिका में अहिंसक आन्दोलन कर मार्टिन लूथर किंग ने जिसे दफ़न कर दिया। वही वर्णभेद आज आस्ट्रेलिया में अपना घिनौना सर उठाकर समूची मानवता को कलंकित कर रहा है। यह केवल भारत की ही नहीं समूचे विश्व के लिए चिंता का विषय होना चाहिए कि आस्ट्रेलिया में रंगभेद का कोढ़ पनप रहा है। और वहाँ भारतीय छात्रों पर लगातार हमले हो रहे हैं। इतना होने के बावजूद भी वहां की सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। और उल्टे भारतीय छात्रों से अपनी सुरक्षा का ख़ुद ध्यान रखने की सलाह दे रही है। ये बेहद गैरजिम्मेदारना रवैया है। आस्ट्रेलिया सरकार को हर हाल में अपने यहाँ मौजूद सभी भारतीयों की सुरक्षा का जिम्मा लेना चाहिए। पहले तो इस मामले पर आस्ट्रेलिया सरकार ने लीपापोती करने की कोशिश की। लेकिन जब मामला उजागर हुआ। तो स्वीकार कर लिया कि हमारे यहाँ रंगभेद के मामले होते रहते हैं। भारतीय छात्रों पर हमला होना ये कोई पहली बार नहीं है। इसकेपहले भी भारतीयों पर हमले होते रहे है। लेकिन तब छिटपुट की घटनाएँ थी। तब भारतीय ज्यादा शिकायत भी नहीं करते थे। क्योंकि उनके अन्दर ऐसी भावना घर कर गयी थी शिकायत करने से कोई कार्रवाई होती नहीं है।जो कोई भी मामले सामने आते थे उस पर कोई ध्यान नहीं देता था। भारत सरकार ने भी कभी ध्यान नहीं दिया। इसी के आज नतीजे हैं कि भारतीय वहां काल के गाल में समा रहे हैं।

इधर अभिनेता अमिताभ बच्चन ने आस्ट्रेलिया के एक विश्वविद्यालय से मिलाने वाली मानद उपाधि को ठुकरा दी है। और कहा है कि जब तक मेरे देश के नागरिकों के साथ अमानवीयता हो रही है तो मेरी आत्मा मुझे उस देश से सम्मान लेने की अनुमति नहीं दे रही है। अब ऐसे में आस्ट्रेलिया सरकार को होश आना चाहिए कि उसकी छवि कितनी मटियामेट हो रही है। दुनिया नस्लवाद को नकार चुकी है। ओबामा जैसे अश्वेत नेता अमेरिका के राष्ट्रपति बन चुके है। इसके बाद अगर आस्ट्रेलिया में रंगभेद पनप रहा है तो समूची दुनिया को धिक्कार करना चाहिए।

Tuesday, June 9, 2009

सागर की छाती पर बन गया पुल

कानूनी दावं पेंच सियासी अखाडे की जंग और स्थानीय लोगों की नाराजगी झेलकर मुंबई करों के स्वागत के लिए सागर की छाती पर बांद्रावरली सी लिंक बनाकर तैयार हो गया है। २००१ में पुल बनाने की नींव शुरू हुई थी। और २००४ में बनाकर तैयार होना था। लेकिन इस योजना को नज़र लग गयी और काम धीरे धीरे खटाई में पड़ता चला गया। चार सौ करोड़ रुपये में बनकरतैयार होने वाला ये पुल १६०० करोड़ रुपये बनकरतैयार हुआ। प्रोजेक्ट पर काम जैसे ही काम शुरू हुआ। तो सागर की अथाह गहराई की तरह अड़चने आने शुरू हों गयी। कभी मछिमारों की मार तो कभी पर्यावरण विदों ने अड़ंगा डालते रहे। रही सही कसर सियासत भी होती रही । और नतीजे ये निकलते रहे की प्रोजेक्ट ख़ुद सागर में गोताखाने लगा। लेकिन पुल को बनाने वाली कंपनी हिन्दुस्तान कन्स्ट्रशन ने हार नहीं मानी । और सागर की अथाह गहराईको नापने के लिए आतुर रही।
लगभग ५० मंजिल की ईमारत की ऊंचाई पर बनाये गए इस पुल को केबल से बांधा गया है। और इसके केबल चीन से मंगाए गए हैं। एक केबल तकरीबन ८०० टन का वजन सहन कर सकता है।सात किलोमीटर के लंबे इस पुल ५.१ किलोमीटर का समुद्री मार्ग है। इस पुल से हर दिन करीबन सवा लाख गाड़िया गुजरेंगी।
मुसाफिरों को जो रास्ता तय करने में 40 मिनट का समय खर्च करना पड़ता था, अब यह दूरी महज 6-7 मिनट में तय की जा सकेगी। करीबन साढ़े सात किलोमीटर लम्बे इस अजूबे में ट्रैफिक का दबाव न पड़े इसके लिए इस पुल को आठ लेन का बनाया गया है। इस पुल की ऊंचाई समुद्रीय सतह से 126 मीटर से भी ज्यादा है। आम लोगों की भाषा में कहे तो मुंबई की 50 माले वाली बिल्डिंग से भी ज्यादा ऊंचा है।
पुल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरा पुल केबल्स की मदद से बांधकर खड़ा किया गया है। पुल में लगे केबल्स चीन से मंगवाए गए हैं। करीबन 432 केबल्स द्वारा बांधे गए इस पुल को जंग से बचाने के लिए खास पेस्ट और पोलिथीन से कवर किया गया है। इसके अलावा पुल में कंक्रीट और स्टील का ही ज्यादातर इस्तेमाल किया गया है।
इस सुहाने सफर के लिए लोगों को अपनी जेब भी ढीली करनी पड़ेगी और सरकार की कमाई भी खूब होगी। इस पुल से एक दिन में लगभग 80 लाख रुपये बतौर टोल टैक्स के रूप में मिलेंगे।एक अनुमान के मुताबिक पुल से हर दिन करीबन एक लाख तीस हजार गाड़ियां गुजरेंगी। लेकिन मोटरसाइकिल प्रेमियों के लिए निराशा भरी बात यह है कि इस पुल पर मोटरसाइकिल चलाने की अनुमति नहीं दी गई है।क्योंकि लम्बा समुद्री पुल होने की वजह से मोटरसाइकिल चालकों के लिए यह पुल खतरनाक साबित हो सकता है जो की तेज हवाएं और गाड़ियों की रफ्तार के चलते मोटरसाइकिल चालक का संतुलन कभी भी बिगाड़ सकती है।इस पुल से करीबन 1।30 लाख गाड़िया गुजरेंगी। एक गाड़ी से औसत टोल टैक्स 60 रुपये भी मान लिया जाए तो 78 लाख रुपये होता है इसको देखते हुए माना जा रहा है कि एक दिन में इस पुल से करीबन 80 लाख रुपये टोल टैक्स के रुप में वसूला जाएगा।
पुल की खासियत को देखकर आई आई बी ई ने ब्रिज को देश का सर्वश्रेष्ठ ब्रिज का एवार्ड दिया है। अब इस ब्रिज को जल्द ही आम जनता के हाथों में आ जाएगा जिससे सभी लोग ऊंचाई से सागर का नज़ारा ले सकते है। और भारत की आधुनिक तकनीक और बुलंद इरादों के बल पर देश का पहला समुद्री पुल बनकर तैयार हो गया है। जो सागर की गहराई और आसमान की ऊंचाई नाप रहा है। सागर की छाती पर बनकर पूरे देशवासियों का तहे दिल से स्वागत कर रहा है।

Friday, June 5, 2009

आंकडें बाजी का खेल

आम जनता के दुखदर्द और उसकी माली हालत में आला अधिकारी कितने अवगत हैं , जो एयर कंडीशन कमरों में बैठकर कागजों पर आंकडों की फसल उगते हैं। उनमें से कितने अधिकारी ऐसे हैं जिन्होंने देश के धूल भरे देहातों या मलिन बस्तियों की ख़ाक छानी है। और महसूस किया है की गरीब लोग किस हालत में रहते हैं। महंगाई की चक्की में पिसते , दुर्दशा और अभाव में जैसे तैसे रोते झींकते जीवन बिताते गरीब को सिर पर छप्पर और दो वक्त का भोजन भी मुश्किल से नसीब होता है। गरीबी रेखा के नीचे जीवन बिताने वालों की आबादी करोड़ों में है। लेकिन हमारे यहाँ के नौकरशाहों की इसकी कोई चिंता नहीं है। अब तो सर्वे भी कहता है भारत के नौकरशाह सबसे आलसी हैं। ऐसे कई सरकारी संगठन हैं जिनका काम है सरकार को आंकडे उपलब्ध कराना जिससे सरकार अग्रिम योजनाओं को क्रियान्वित कर सके। लेकिन ये आंकडे कितने सही है या वास्तविकता के करीब हैं इसपर भी बहस हो सकती है। और सरकार है की इन आंकडों को भी सही मान लेती है । आंकडों का खेल करने वाले बड़े - बड़े विशेषज्ञों का आंकलन कितना सटीक होता है इसे लेकर संदेह हो सकता है। केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन यानी सी एस ओ ने देश के प्रति व्यक्ति की मासिक आय तीन हाजार रुपये से भी अधिक बताई है। लेकिन सच्चाई ये है की साल १९९९-२००० के स्थिर मूल्य पर २००० रुपये से कुछ ही अधिक है। अब यह कितनी अजीब बात है कि सभी वास्तविक गणनाओं का आंकलन साल १९९९-२००० के स्थिर मूल्य के आधार पर किया जाता है। वरतमान मूल्यों के आधार पर नहीं। अब आप भी आंकलन कीजिये कि एक दशक पहले के आधार पर किया गया आंकलन कितना सटीक हो सकता है। वर्त्तमान मूल्यों के आधार पर तो सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की वृधि १४.२ बैठती फीसदी है। इसी तरह प्रति व्यक्ति आय वर्तमान मूल्यों के आधार पर ३७४९० रुपये वार्षिक हो गयी। स्थिर मूल्यों पर यह अभी भी २५४९४ रुपये वार्षिक यानी २१२४ रुपये मासिक चल रही है। आंकडों का यह मायाजाल उस वर्ग के लिए ठीक है जिन्हें वेतन भत्ता वृद्धि और बदलते वेतनमान का लाभ मिलता है।वेतन आयोग की सिफारिशें आम गरीब के लिए कोई मायने नहीं रखती हैं। इसके विपरीत इसके फलस्वरूप बाज़ार में अधिक पैसा पहुँचने से महंगाई बढ़ जाती है। जिससे गरीब दुखी और बेबस हो जाता है। और आज आज़ादी के ६१ साल बीत जाने के बाद भी गरीब जस के तस हैं हाँ चुनाव जब भी आते है तो गरीबों को मोहरा बनाकर मुद्दे तय होते है। नतीजा ये निकालता है कि उन्हें सस्ते दाम पर गेहूं चावल देने का भरोसा दिया जाता है और नौकरशाह और राजनेता मलाई खाते है। आखिर क्या आंकड़े सरकार इसी लिए मंगाती है कि गेहूं चावल ही देते रहें। और मलाई मिलाती रहे धन्य हैं ये आंकडे। और धन्य है आंकडों का खेल।

Thursday, May 28, 2009

मुंबई की सुरक्षा में छेद

भारत को मनमोहनी सरकार फ़िर से मिल गयी। लेकिन देश को अब अंतर्राष्ट्रीय स्तरपर एक नयी दिशा व दशा तय करनी होगी। आतंक से जूझ रहे देश को सबसे पहले श्रीलंका से सबक लेकर आतंक की लहलहाती फसल को जड़ से काटना होगा। सबसे ज्यादा आतंक का घिनौनी खेल मुंबई ने देखा है । अगर मुंबई की बात की जाए तो मुंबई न केवल अंतर्राष्ट्रीय स्तर का बड़ा शहर है।बल्कि देश की आर्थिक राजधानी भी है। लेकिन कानून व्यवस्था के ढीलेपन की वजह से हालत बिल्कुल लावारिश मालुम पड़ती है। आतंक, बमबारी, अपराधी गिरोह सभी ने इसका सुख चैन छीन लिया है। सहसा ऐसी वारदात हो जाती है की लोग सिहर उठाते हैं। और भगवान भरोसे मुंबई रहती है। कानून के रखवाले कुम्भकरण की नींद में सो रहे हैं या फ़िर अपराधियों से मिलीभगत है ? कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है की मुंबई के अंतर्राष्ट्रीय विमानतल के कार्गो टर्मिनल से दिनदहाडे चार नकाबपोश लुटेरे १०० किलो सोना चांदीभरे बॉक्स लूट ले जायेंगे। ऐसा द्रश्य अगर किसी फ़िल्म में दिखाई देता तो शायद स्क्रिप्ट राईटर की कल्पना की उड़ान मान लेते। लेकिन वास्तव में जब ऐसी दुस्साहसिक लूट होती है तो वाकईअचम्भा होता है। एअरपोर्ट की सुरक्षा को भेदकर लुटेरे लूट कर चंपत हो गए.आतंक के साए की वजह से एअरपोर्ट में भारी चौकसी रहती है। और वहाँ जांच पड़ताल के चलते पंछीभी पर नहीं मार सकता है। ऐसे में सवाल यह उठता है की ये लुटेरे वहाँ तक कैसे पहुँच गए। उनसे कोई पूछताछ कैसे नहीं हुई। एअरपोर्ट हाई सिक्योरिटी ज़ोन में आता हैं। कोई बस अड्डा नहीं की टहलते टहलते चाहे जो कोई पहुँच जाए। जिस तरह से लूटेरोंने लूट को अंजाम दिया है उससे यही लगता है की किसी के आंखों से काजल चुराने वाली बात है। क्योंके एक सामान्य यात्री को कई सुरक्षा घेरों से निकला होता है। मुंबई में सुरक्षा के नाम पर पहले भी कई छेद देखे गए है। और इसकी कीमत मुम्बई करों को जान देकर चुकानी पड़ी। अभी आतंक के छर्रे खाया घायल ताज कराह रहा है। की एक बार फ़िर सुरक्षा व्यवस्था तार तार हो गयी। आख़िर मुंबई की सुरक्षा पर कब बंद होगा छेद,अमनचैन के लुटेरों को कब तक मिलेगी छूट , और कब सागर की अथाह गहराई नापने वाले मुंबई को मिलेगी चैन।

Saturday, March 7, 2009

मुंबई का सियासी गलियारा

चुनाव का यानी निर्वाचन आयोग ने जैसे ही चुनाव का घंटा बजाया. सभी राज नेता घंटा सुनते ही गंभीर हो गए. मुंबई में तो धनुष बाण हमेशा कमल पर निशाना साध रहा था. लेकिन चुनावी बिगुल बजाते ही धनुष पर कमल खिल गया.. हालाँकि अभी भी दोनों के बीच घमासान जारी है. महाराष्ट्र राज्य के मुंबई में छः लोकसभा सीटें है. १. उत्तर मुंबई (दहिसर, बोरीवली , कांदिवली, मलाड) २. उत्तर पशिम मुंबई ( जोगेश्वरी, दिन्दोशी ,गोरेगावों,वर्शोवा,अँधेरी) ३. उत्तर पूर्व मुंबई (मुलुंड, विक्रोली,भांडुप, शिवाजी नगर,और घाटकोपर)४. दक्षिण मुंबई (वरली,शिवादी, भायखला,मालाबार हिल,कोलाबा मुम्बा देवी.)५. दक्षिण मध्य मुंबई ( अणुशक्ति नगर ,चेम्बूर, धारावी, कोलीवाडा, महिम, सायन) ६. उत्तर मध्य मुंबई ( कुर्ला, बंदर, कलिना, विलेपार्ले) इन सभी में से पांच सीटों पर हाथ का कब्जा था. लेकिन एस बार हाथ और घडी दोनों बराबरी के हक़ पर ताल ठोंक रहे हैं. कांग्रेस और एनसीपी , सपा ,बसपा के पास उत्तर भारतीय वोट हैं. जिसमे सपा और बसपा तो केवल उत्तर भारतीयों के भरोसे है. जबकि शिवसेना और भाजपा के उत्तर भारतीय वोट के मराठी वोट सबसे ज्यादा है. राज्य में नए परिसीमन के तहत चुनाव हो रहे हैं. लिहाजा सभी दिग्गज नेताओं का चुनावी अखाडा बदल गया है. मुंबई और उससे सटे ठाणे जिले में एक करोड़ ५८ लाख सात हजार ६५२ मतदाता हैं.राज्य में ठाणे लोकसभा सीट सबसे बड़ी है. जिसमे १७ लाख ८८ हजार ५०० मतदाता हैं. मुंबई की हर एक सीट पर दिग्गज ही दिग्गज ताल ठोंक रहे हैं. उत्तर पश्चिम मुंबई से सपा प्रदेश अध्यक्ष अबू आसिम आज़मी चुनाव लड़ने का एलन कर चुके हैं. जबकि पिचली बार इस सीट से प्रिया दत्त संसद रह चुकी थी. लेकिन एस बार एस सीट पर कांग्रेस अध्यक्ष कृपा शंकर सिंह भाग्य अजमाना चाहते हैं. इस सीट पर अभी से ही कांटे के सामान टक्कर होने की उम्मीद बढ़ गयी है. उधर चुनावी क्षेत्र के बंटवारे से सभी राजनेता अपने अपने समीकरण बैठने में जुटे हुए हैं. अगर नए गणित का आंकला करे तो भाजपा सबसे ज्यादा फायदे में दिख रही हैं. कई सीटों पर भाजपा की सीट मजबूत दिख रही है जैसे उत्तर मुंबई सीट इस सीट पर गोविंदा संसद थे. लेकिन जनता तो अपने संसद के कभी दर्शन नहीं कर पायी लिहाजा फिर से जनता अपने पुराने नेता राम नाईक को चुन सकते है, उधर उत्तर पूर्व मुंबई से भाजपा के संभावित उम्मेदवार किरीट सोम्या को बेहद फायदा पहुंचेगा. शिवसेना भाजपा का गठबंधन भी गठजोड़ के बजाय गठ्तोड़ नज़र आ रहा है. दक्षिण मुंबई सीट पर शिवसेना ने दावा ठोंका है लेकिन भाजपा दिवंगत नेता प्रमोद महाजन की बेटी प्पोंं महाजन को मैदान में उतरना चाहती है. केंद्र में यू पीए को समर्थन करने वाली सपा के उम्मेदवार उतरने से कांटे की टक्कर मुंबई में पैदा हो जायेगी. इधर बसपा भी बाहुबली नेताओं के तलाश में जुट गयी है. बसपा प्रदेशध्यक्ष ने बसपा अरुण गवली के शामिल होने की खबर दी है. ऐसे में जिश तरह से बहन जी ने यूपी में बाहुबली को मैदान में उतर रही है वैसे ही महाराष्ट्र में भी हांथी पर बाहुबली सवार हो रहे हैं.

Monday, December 22, 2008

हाय रे मनमोहन ये तूने क्या किया

यूं पी ऐ सरकार के गठन के बाद मनमोहन सरकार महंगाई के आंच से झुलस रही थी। इसके बाद मंदी का दीमक लग गया। अभी सरकार को दीमक खा रहा था कि बीच में आतंकी छर्रे भी खाने पड़े। इन ढेर साडी समस्याओं से पीड़ित होकर सरकार ने सोचा कि अब सत्ता का भोग दोबारा मिलाना मुश्किल है। लेकिन जैसे ही विधान सभा चुनाव में नतीजे अच्छे निकले। तो मनमोहन सरकार को आस जगी और आनन् फानन में लम्बी लम्बी घोशनाएँ करना शुरू कर दिया जैसे मंदी से निपटने के लिए बैंकों को रहत पॅकेज होम लोन में ब्याज डरघटाकर बहार लाना। नौकरी के दौरान निकले गए कर्मचारियों को ६ महीने का वेतन दिलाना।
सरकार ने घोषणाओं का अम्बर लगा दिया। लेकिन मेरे हिसाब से घाव कहीं और है और मरहम कहीं और लगाया जा रहा है। जैसे आवासीय पॅकेज में सरकार ने २० लाख लोन तक में ब्याज दर घटी हैं। लेकिन मुंबई ठाणे जैसे शहरों में तो २० लाख से ऊपर का माकन मिलाता नहीं है। बिल्डर बंधू दाम घटने के मूड में नहीं हैं। मकान बीके या नहीं। उल्टे ग्राहकों को लुभाने के लिए स्कीम और चला दी है वो भी दाम बढाकर । तब तो होम लोन का तो फायदा मिलाने से रहा। अब दूसरी बात मंदी से निपटने के लिए कर्मचारिओं की छंटनी पर ६ महीने का वेतन दिया जाए। उसमे भी शर्त रख दी गयी के कंम्पनी में पाँच साल तक काम कर चुका हो। अब मैं यहांं पर ये बताना चाहता हूँ कि पाँच साल का मतलब बाजपेयी की सरकर में नौकरी लगी और मनमोहन की सरकार में मरहम मिला रहा है जबकि असलियत ये है के जितना मनमोहन सरकार में प्राइवेट सेक्टर में उफान आया है उतना बाजपेयी सरकार में नहीं आया था॥ और लोग मनमोहन सरकार में ही ज्यादातर कम्पनियों में जों हुए हैं।
यानी कि आप्कावे ज़माने में जो भरती हुए हैं वो तो बेचारे नीबू नमक ही चटाकर रह जायेंगे। और जो बाजपेयी सरकार में शामिल हुए उनकी तो बहार है।
अब में यही कह रहा हूँ कि हे मनमोहन सरकार ये आपने क्या किया । थोड़ा बहुत तो आप अपने काम काज को परख लें । आप क्या कर रहे है और इधर काया हो रहः है।