देश के नजरिये से अगर इस दौर में सरकार को परिभाषित किया जाये तो पहले देश बेचना, फिर देश की फिक्र करना और अब फिक्र करते हुये देश को अपनी अंगुलियो पर नचाना ही सरकार का राजनीतिक हुनर है।
Wednesday, November 30, 2011
एसएंडपी ने प्रमुख अमेरिकी बैंकों की रेटिंग घटाई
प्रमुख वैश्विक रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स रेटिंग्स सर्विसेज ने कहा कि बैंकों के लिए नए रेटिंग मानदंड लागू करने की प्रक्रिया के एक हिस्से के तौर पर उसने प्रमुख अमेरिकी बैंकों की रेटिंग घटा दी है।रेटिंग एजेंसी ने कहा कि उसने दुनिया के 37 सबसे बड़े बैंकों की फिर से रेटिंग की है। इनमें बैंक ऑफ अमेरिका, सिटीग्रुप, गोल्डमैन सैक्स, वेल्स फार्गो, जेपीमोर्गन चेज और मोर्गन स्टेनले जैसे प्रमुख अमेरिकी बैंक शामिल हैं।एसएंडपी ने एक साल से अधिक समय तक अध्ययन और विश्लेषण करने के बाद पिछले सप्ताह संशोधित रेटिंग मानदंड जारी किए।रेटिंग एजेंसी ने बैंकों के लिए नए मानदंड में निवेश बैंकिंग के साथ जुड़े जोखिम, बैंकों के लिए वित्तीय व्यवस्था और बैंकिंग उद्योग में सरकार और केंद्रीय बैंकों की भूमिका जैसे तत्वों को शामिल किया है।रेटिंग एजेंसी ने बार्कलेज, एचएसबीसी, ल्योड्स और रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड जैसे प्रमुख ब्रिटिश बैंकों की भी रेटिंग घटाई है। लेकिन क्रेडिट सुईस और डॉयश बैंक की रेटिंग में बदलाव नहीं किया गया है।
Monday, May 2, 2011
कांग्रेस की घास कांग्रेस के कीड़े
आज़ाद भारत पर सबसे ज्यादा सालों तक शासन करने का श्रेय कांग्रेस के पास है । घोटालेबाज और महंगाईगीरी में एकाधिकार वर्चस्व स्थापित कर चुकी कांग्रेस के पास एक ऐसी घास है जो पिछले कई दशकों से देश की लक्ष्मी को तो चाट रही है साथ ही भारतीयों को अस्थमा और फोड़े फुंसियां जैसी बीमारियाँ भी बोनस में दे रही है।
दरअसल, आज़ादी के बाद जब देश में गेहूं की कमी हो गयी थी । तब तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने १९५० में अमेरिका से पी.एल - ४८० किस्म के गेहूं का आयात किया गया था । इस गेहूं के साथ अमेरिका ने एक घास भी भेज दिया था। इस घास का वैज्ञानिक नाम - पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस है। भारत में इसे गाजर घास के नाम से जाना जाता है। लेकिन सियासी मैदान में ये घास कांग्रेस घास के नाम से बहुचर्चित है। इस घास को सबसे पहले १९५६ में पुणे में देखा गया था।
कांग्रेस घास पिछले ५५ सालों में देश की करीब ३५० लाख हेक्टेयर भूमि पर फ़ैल चुकी है । इनमें से लगभग २० लाख हेक्टेयर जमीन खेती की है कारगिल से लेकर अंडमान निकोबार और दिल्ली तक इसने अपने पैर पसार लिए हैं।
फसल और इन्सान के लिए खतरनाक - कांग्रेस घास के पौधे की लम्बाई एक मीटर से डेढ़ मीटर तक होती है। एक पौधे में तकरीबन २५-३० हजार बीज पैदा होते हैं। और प्रकीर्णन के माध्यम से दूर - दूर तक पहुँच जाते हैं। जिसका इलाज वैज्ञानिक अभी तक नहीं ढूंढ पाए हैं। इसके कारण त्वचा काली पड़ जाती है। और उस पर फुन्सिया निकल आती हैं। इस घास के बीजों के संपर्क मेंआने से अस्थमा भी हो सकता है । जानवरों के लिए ये घास बेहद खतरनाक है। गाय और बकरी जैसे पशुओं की त्वचा में ये बुरा प्रभाव डालती हैं। दुधारू पशु जब इस घास को खाते हैं तो उनके दूध का स्वाद कसैला महसूस होता हैं। और लम्बे समय तक अगर ऐसे दूध का सेवन किया जाए तो मौत भी हो सकती है। कांग्रेस घास हर तरह की भूमि और जलवायु में उग सकती है। तकरीबन २५-३० डिग्री सेल्सियस तापमान पर इसका अंकुरण हो सकता है। इस घास का प्रसार अनाज उत्पादन में कमी के लिए भी जिम्मेदार है । यह एक ऐसी खरपतवार है जो फसलों और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है।
घास चरने की तैयारी - अब वैज्ञानिकों ने इसका नामो निशान मिटाने के लिए मक्सिको से जायागोग्रेम्मा बाइको लोराटा नाम के कीट के आयात का फैसला किया गया है। यह कीट कांग्रेस घास को चट कर जाता है। इसके ट्रायल के नतीजे अच्छे खासे रहे हैं। केमिकल्स की मदद से भी इसे ख़त्म करने की कोशिशें की जा रही हैं। लोगों को इस घास और इसके दुष्प्रभावों के बारे में बताया जा रहा है । इस कांग्रेस घास ने सरकारी खजाने को भी कायदे से साफ़ किया हैं। अब तक सरकारी खजाने से इस घास ने डेढ़ लाख करोड़ रुपये चाट चुकी है। जानकारों की मानें तो अभी इस घास से मुक्ति पाने के लिए भारी भरकम रकम खर्च करने की ज़रुरत है। जिसमें मजदूरों पर तकरीबन १६,८०० और रासायनों पर ११,900 करोड़ रुपये का मोटा खर्च होने की उम्मीद है।
अब महंगाई के इस सर्पदंश से खेल रहे देश के आम नागरिकों के साथ कांग्रेस की घास औरकांग्रेस के कीड़े क्या नया शिगूफा रचेंगे ये भी देखना दिलचस्प रहेगा।
दरअसल, आज़ादी के बाद जब देश में गेहूं की कमी हो गयी थी । तब तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने १९५० में अमेरिका से पी.एल - ४८० किस्म के गेहूं का आयात किया गया था । इस गेहूं के साथ अमेरिका ने एक घास भी भेज दिया था। इस घास का वैज्ञानिक नाम - पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस है। भारत में इसे गाजर घास के नाम से जाना जाता है। लेकिन सियासी मैदान में ये घास कांग्रेस घास के नाम से बहुचर्चित है। इस घास को सबसे पहले १९५६ में पुणे में देखा गया था।
कांग्रेस घास पिछले ५५ सालों में देश की करीब ३५० लाख हेक्टेयर भूमि पर फ़ैल चुकी है । इनमें से लगभग २० लाख हेक्टेयर जमीन खेती की है कारगिल से लेकर अंडमान निकोबार और दिल्ली तक इसने अपने पैर पसार लिए हैं।
फसल और इन्सान के लिए खतरनाक - कांग्रेस घास के पौधे की लम्बाई एक मीटर से डेढ़ मीटर तक होती है। एक पौधे में तकरीबन २५-३० हजार बीज पैदा होते हैं। और प्रकीर्णन के माध्यम से दूर - दूर तक पहुँच जाते हैं। जिसका इलाज वैज्ञानिक अभी तक नहीं ढूंढ पाए हैं। इसके कारण त्वचा काली पड़ जाती है। और उस पर फुन्सिया निकल आती हैं। इस घास के बीजों के संपर्क मेंआने से अस्थमा भी हो सकता है । जानवरों के लिए ये घास बेहद खतरनाक है। गाय और बकरी जैसे पशुओं की त्वचा में ये बुरा प्रभाव डालती हैं। दुधारू पशु जब इस घास को खाते हैं तो उनके दूध का स्वाद कसैला महसूस होता हैं। और लम्बे समय तक अगर ऐसे दूध का सेवन किया जाए तो मौत भी हो सकती है। कांग्रेस घास हर तरह की भूमि और जलवायु में उग सकती है। तकरीबन २५-३० डिग्री सेल्सियस तापमान पर इसका अंकुरण हो सकता है। इस घास का प्रसार अनाज उत्पादन में कमी के लिए भी जिम्मेदार है । यह एक ऐसी खरपतवार है जो फसलों और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है।
घास चरने की तैयारी - अब वैज्ञानिकों ने इसका नामो निशान मिटाने के लिए मक्सिको से जायागोग्रेम्मा बाइको लोराटा नाम के कीट के आयात का फैसला किया गया है। यह कीट कांग्रेस घास को चट कर जाता है। इसके ट्रायल के नतीजे अच्छे खासे रहे हैं। केमिकल्स की मदद से भी इसे ख़त्म करने की कोशिशें की जा रही हैं। लोगों को इस घास और इसके दुष्प्रभावों के बारे में बताया जा रहा है । इस कांग्रेस घास ने सरकारी खजाने को भी कायदे से साफ़ किया हैं। अब तक सरकारी खजाने से इस घास ने डेढ़ लाख करोड़ रुपये चाट चुकी है। जानकारों की मानें तो अभी इस घास से मुक्ति पाने के लिए भारी भरकम रकम खर्च करने की ज़रुरत है। जिसमें मजदूरों पर तकरीबन १६,८०० और रासायनों पर ११,900 करोड़ रुपये का मोटा खर्च होने की उम्मीद है।
अब महंगाई के इस सर्पदंश से खेल रहे देश के आम नागरिकों के साथ कांग्रेस की घास औरकांग्रेस के कीड़े क्या नया शिगूफा रचेंगे ये भी देखना दिलचस्प रहेगा।
Tuesday, January 25, 2011
लहराते तिरंगे का सफ़र
देश की आन बान शान लहराता तिरंगा झंडा ने आज 66 साल का सफ़र पूरा कर
लिया हैं। देश में तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज का दर्जा 22 जुलाई 1947 को मिला। इससे
पहले इसे "स्वराज फ्लैग " के नाम से जाना जाता था। और
इसका उपयोग कांग्रेस पार्टी किया करती थी।
महात्मा गाँधी ने कांग्रेस के समक्ष पहली बार 1921 में ध्वज का प्रस्ताव रखा। इस ध्वज की डिजाइन कृषि वैज्ञानिक पिंगाली वेंकैया ने तैयार किया था। थोड़ा सा बदलाव करके इस ध्वज को "स्वराज फ्लैग " नाम से 1931 में कांग्रेस ने अपना आधिकारिक ध्वज घोषित कर दिया। स्वराज फ्लैग में तीन रंग केसरिया, सफ़ेद और हरा रंग था और बीच में चरखा बना हुआ था। जब आज़ादी का समय आया तो डॉ राजेंद्र प्रसाद कि अध्यक्षता में एक कमेटी बनायीं गयी। इस कमेटी ने 14 जुलाई 1947 को कांग्रेस पार्टी के स्वराज फ्लैग को राष्ट्रीय ध्वज बनाने का सुझाव दिया गया। और इसके बाद स्वराज फ्लैग से चरखा हटाकर "अशोक चक्र" अंकित किया गया और 22 जुलाई 1947 को राष्ट्रीय ध्वज का दर्जा दिया गया। राष्ट्रीय ध्वज के निर्धारण में इस बात का ख़याल रखा गया कि सभी पार्टियों और धार्मिक समुदायों को स्वीकार्य हो। पूर्व उप राष्ट्रपति ने सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने इसे परिभाषित किया - जिसमें केसरिया रंग त्याग और सहस, श्वेत रंग शांति और सत्य एवं हरा रंग विश्वास और हरियाली का प्रतीक हैं। इसके अलावा ध्वज के मध्य अशोक चक्र देश कि गतिशीलता व धर्म को दर्शाता हैं। राष्ट्र ध्वज का इस्तेमाल और प्रदर्शन फ्लैग कोड ऑफ इंडिया द्वारा संचालित होता हैं।
क़ानून के तहत अगर कोई व्यक्ति या संस्थान राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करता पाया जाता हैं तो उसे तीन साल की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं । सन 2009 के पहले किसी को भी स्वतंत्रता दिवस या फिर गणतन्त्र दिवस के अलावा अन्य अवसरों पर राष्ट्रीय ध्वज अपने घर या कार्यालय पर फहराने कि इजाज़त नहीं थी। लेकिन 26 जनवरी 2002 से सरकार ने फ्लैग कोड ऑफ इंडिया में संसोधन करके इसकी इजाज़त प्रदान की। इसी तरह राष्ट्रीय ध्वज को रात्रि में फहराने की इजाज़त नहीं थी । मगर 2009 में एक जनहित याचिका की सुनवाई पर सरकार ने विशेष शर्तों के साथ इसे फहराने की अनुमति दे दी।
तिरंगे का इतिहास - पहली बार तिरंगा
झंडा 7 अगस्त 1906 में सचिन्द्र बोस ने बंगाल विभाजन के विरोध में बनाया था। इसे "
कलकत्ता फ्लैग " का नाम दिया गया . इस ध्वज में केसरिया,पीला और हरा रंग उपयोग में
लाया गया। और झंडे के बीच में हिंदी में वन्दे मातरम लिखा हुआ था।महात्मा गाँधी ने कांग्रेस के समक्ष पहली बार 1921 में ध्वज का प्रस्ताव रखा। इस ध्वज की डिजाइन कृषि वैज्ञानिक पिंगाली वेंकैया ने तैयार किया था। थोड़ा सा बदलाव करके इस ध्वज को "स्वराज फ्लैग " नाम से 1931 में कांग्रेस ने अपना आधिकारिक ध्वज घोषित कर दिया। स्वराज फ्लैग में तीन रंग केसरिया, सफ़ेद और हरा रंग था और बीच में चरखा बना हुआ था। जब आज़ादी का समय आया तो डॉ राजेंद्र प्रसाद कि अध्यक्षता में एक कमेटी बनायीं गयी। इस कमेटी ने 14 जुलाई 1947 को कांग्रेस पार्टी के स्वराज फ्लैग को राष्ट्रीय ध्वज बनाने का सुझाव दिया गया। और इसके बाद स्वराज फ्लैग से चरखा हटाकर "अशोक चक्र" अंकित किया गया और 22 जुलाई 1947 को राष्ट्रीय ध्वज का दर्जा दिया गया। राष्ट्रीय ध्वज के निर्धारण में इस बात का ख़याल रखा गया कि सभी पार्टियों और धार्मिक समुदायों को स्वीकार्य हो। पूर्व उप राष्ट्रपति ने सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने इसे परिभाषित किया - जिसमें केसरिया रंग त्याग और सहस, श्वेत रंग शांति और सत्य एवं हरा रंग विश्वास और हरियाली का प्रतीक हैं। इसके अलावा ध्वज के मध्य अशोक चक्र देश कि गतिशीलता व धर्म को दर्शाता हैं। राष्ट्र ध्वज का इस्तेमाल और प्रदर्शन फ्लैग कोड ऑफ इंडिया द्वारा संचालित होता हैं।
क़ानून के तहत अगर कोई व्यक्ति या संस्थान राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करता पाया जाता हैं तो उसे तीन साल की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं । सन 2009 के पहले किसी को भी स्वतंत्रता दिवस या फिर गणतन्त्र दिवस के अलावा अन्य अवसरों पर राष्ट्रीय ध्वज अपने घर या कार्यालय पर फहराने कि इजाज़त नहीं थी। लेकिन 26 जनवरी 2002 से सरकार ने फ्लैग कोड ऑफ इंडिया में संसोधन करके इसकी इजाज़त प्रदान की। इसी तरह राष्ट्रीय ध्वज को रात्रि में फहराने की इजाज़त नहीं थी । मगर 2009 में एक जनहित याचिका की सुनवाई पर सरकार ने विशेष शर्तों के साथ इसे फहराने की अनुमति दे दी।
--- इसके बाद होम रूल आन्दोलन के दौरान बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट ने 1917 में नया ध्वज बनाया । इस ध्वज पर पांच लाल और चार हरी तिरक्षी पट्टियाँ बनीं थी। सात तारों को भी इस पर अंकित किया गया था। यह ध्वज लोगों के बीच ज्यादा प्रसिद्द नहीं हुआ।
इस तरह से तिरंगे ने इतना लंबा सफ़र तय करने के बाद आज भी देश में तिरंगे की हालत बाद से बदतर हैं। प्लास्टिक के झंडे ज्यादा बाज़ार में आ गए हैं। ये नष्ट नहीं होते जिसकी वजह से लोगों के पैरों तले और नालियों में पड़े रहते हैं। अब तो तिरंगे में भी चीन घुस गया है... इन दिनों बाज़ार में सबसे ज्यादा चीनी तिरंगे बिक रहे हैं... धन्य है देश जो आन बान शान में भी चीन... आज एक बार फिर सभी को देश के प्रति जागरूक होने की ज़रुरत हैं।
Tuesday, November 30, 2010
हमारे समाज का महारोग एड्स
एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशिएंसी सिंड्रोम अथवा एड्स पूरी दुनिया में तेजी से पाँव पसार रहा हैं। एचआईवी पाजटिव होने का मतलब आम तौर पर ज़िन्दगी का अंत मान लिया जाता हैं लेकिन यह अधूरा सच हैं और डाक्टरों के मुताबिक एच आई वी पॉजीटिव लोग भी सामान्य आदमी की तरह लम्बे समय तक जीवन जी सकते हैं। न्यूयॉर्क में एड्स की पहचान १९८१ में समलिंगी वयस्क पुरुषों में प्रतिरक्षण क्षमता में कमी एवं उच्च मृत्यु दर के लक्षणों के साथ की गयी। और इसका नाम एड्स रखा गया।
ए- मतलब एक्वायर्ड यानी यह रोग किसी दूसरे व्यक्ति से लगता है।
आई डी-- मतलब इम्यूनो डिफीशिएंसी यानी यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को खत्म कर देता हैं।
एस -मतलब सिंड्रोम यानी कई तरह के लक्षणों से पहचानी जाती हैं।
वास्तव में एड्स वर्तमान समाज में मानव सभ्यता की समझ सबसे बड़ी चुनौती बनकर खडा है। इस बीमारी का लाइलाज होना ही इससे भयाक्रांत होने का सबसे प्रमुख कारण हैं। पूरी दुनिया में अब तक तकरीबन ढाई करोड़ लोग एड्स के गाल में समा चुके हैं और करोड़ों लोग अभी इसके प्रभाव में हैं। एड्स रोगियों में अफ्रीका पहले नंबर में हैं जबकि भारत दूसरे नंबर में हैं। भारत में पहला एड्स मरीज मद्रास में पाया गया था। अमेरिका में ये रोग समलैंगिकता के कारण तेजी से फैला जबकि भारत में असुरक्षित यौन सम्बन्धों के कारण दिनों दिन अपने पैर जमा रहा हैं।
जुलाई २००५ में ब्राजील की राजधानी रियो-डी - जेनेरिया में १२५ देशों के लगभग ५०० विशेषज्ञों ने मिलकर एक सेमिनार का आयोजन किया था। और उसमें २६० शोध पत्र पेश किये गए थे। बीमारी से लड़ने हेतु तमाम सुझाव भी दिए गए थे। शोध के मुताबिक पूरी दुनिया में १४००० लोग हर दिन एड्स की चपेट में आते हैं। ९५ फ़ीसदी लोग मध्यम और कम आय वाले देशों के होते हैं । २००५ में ६.५ मिलियन एड्स से पीड़ित लोगों को उपचार की ज़रुरत थी लेकिन एक मिलियन का ही उपचार हो सका ।
भारत में एड्स के हालत -
यूनिसेफ,यूएन एड्स और विश्व स्वस्थ्य संगठन के ताजे सर्वेक्षण
माता से बच्चों में एचआईवी संक्रमण की रोक -
--- एचआईवी पॉजीटिव गर्भाधारित महिलाओं की संख्या - ६४,०००
-- एचआईवी पॉजीटिव के साथ उत्पन्न बच्चों की संख्या और प्रतिशत - १२,00 {२%}
-- १५ - २४ साल के लोगों में एचआईवी पुरुषों में - ०.३% और महिला ०.३%
-- १५-२४ साल के लोगों में जो पिछले एक वर्ष में एक से अधिक जीवन साथी के साथ लैंगिक सम्बन्ध बनाये उनका प्रतिशत पुरुष - १.६%, महिला ०.१%
-- एचआईवी से ग्रसित अनाथ बच्चों की संख्या २५,०००,०००
इस सच्चाई को जानने के बाद यही कहा जा सकता हैं की एड्स एक बड़ी बीमारी हैं - बेहद खतरनाक भी, लेकिन कोई समाज जितना बीमारियों से नहीं मरता उतना अपने रवैये से नष्ट होता हैं। एड्स का हम मुकाबला कर सकते हैं लेकिन उस डर, उस नासमझ का सामना कैसे करें जो अमानवीय ढंग से हमें अपने ही समाज के कुछ असहाय लोगों से काट डालती हैं । उन्हें अछूत बना डालती हैं। भारत सिर्फ एड्स का नहीं बल्कि कई बीमारियों का घर है। उन्नीसवीं सदी की बीमारियाँ इस इक्कीसवी सदी में पलट कर हमला कर रही हैं। हम प्लेग और पोलियो से भी लड़ रहे हैं। कैंसर एड्स की ही तरह रहस्यमय और जानलेवा बीमारी बना हुआ हैं। डायबिटीज को खामोश महामारी कहा जाता हैं। लेकिन और भी कई खामोश महामारियां से इस समाज को बीमार बनाने में लगी हैं। हमने एक चमकता हुआ भारत बनाया लेकिन इस भारत में कई हाँफते,कराहते,खांसते भारत भी शामिल हैं। वो बेदखल भारत शामिल हैं जो अपने घर परिवार से सैकड़ों मील दूर ज़िन्दगी और रोजगार की जद्दोजहद में रोज खुद को गला रहे हैं। छोटे-छोटे शहरों से देश के महानगरों तक ज़िन्दगी की तलाश में पहुंचे ये लोग अपने जिस्म में मौत के कीड़े लेकर लौटते हैं। और उनके घर वाले जान तक नहीं पाते कि आखिर उन्हें बीमारी है क्या ? ये वो एड्स हैं जो शरीर को नहीं बल्कि समाज को खा रहा हैं। फिर कहना होगा कि एड्स का इलाज सिर्फ एंटी रेट्रो वायरल थेरपी से नहीं हो सकता। इसके लिए पूरे समाज की धमानिया साफ़ करनी होगी उसका रक्त बदलना होगा। ये काम आसान नहीं है इसके बिना हम एड्स और कैंसर के इलाज खोज भी लें तो भी अपने समाज को नहीं बचा पायेंगे। क्यों कि हम इस लिए नहीं मर रहे हैं कि दवाएं नहीं हैं बल्कि इस लिए मर रहे हैं कि उनके पास दवाओं तक पहुंचने का साधन नहीं हैं ।
ए- मतलब एक्वायर्ड यानी यह रोग किसी दूसरे व्यक्ति से लगता है।
आई डी-- मतलब इम्यूनो डिफीशिएंसी यानी यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को खत्म कर देता हैं।
एस -मतलब सिंड्रोम यानी कई तरह के लक्षणों से पहचानी जाती हैं।
वास्तव में एड्स वर्तमान समाज में मानव सभ्यता की समझ सबसे बड़ी चुनौती बनकर खडा है। इस बीमारी का लाइलाज होना ही इससे भयाक्रांत होने का सबसे प्रमुख कारण हैं। पूरी दुनिया में अब तक तकरीबन ढाई करोड़ लोग एड्स के गाल में समा चुके हैं और करोड़ों लोग अभी इसके प्रभाव में हैं। एड्स रोगियों में अफ्रीका पहले नंबर में हैं जबकि भारत दूसरे नंबर में हैं। भारत में पहला एड्स मरीज मद्रास में पाया गया था। अमेरिका में ये रोग समलैंगिकता के कारण तेजी से फैला जबकि भारत में असुरक्षित यौन सम्बन्धों के कारण दिनों दिन अपने पैर जमा रहा हैं।
जुलाई २००५ में ब्राजील की राजधानी रियो-डी - जेनेरिया में १२५ देशों के लगभग ५०० विशेषज्ञों ने मिलकर एक सेमिनार का आयोजन किया था। और उसमें २६० शोध पत्र पेश किये गए थे। बीमारी से लड़ने हेतु तमाम सुझाव भी दिए गए थे। शोध के मुताबिक पूरी दुनिया में १४००० लोग हर दिन एड्स की चपेट में आते हैं। ९५ फ़ीसदी लोग मध्यम और कम आय वाले देशों के होते हैं । २००५ में ६.५ मिलियन एड्स से पीड़ित लोगों को उपचार की ज़रुरत थी लेकिन एक मिलियन का ही उपचार हो सका ।
भारत में एड्स के हालत -
यूनिसेफ,यूएन एड्स और विश्व स्वस्थ्य संगठन के ताजे सर्वेक्षण
माता से बच्चों में एचआईवी संक्रमण की रोक -
--- एचआईवी पॉजीटिव गर्भाधारित महिलाओं की संख्या - ६४,०००
-- एचआईवी पॉजीटिव के साथ उत्पन्न बच्चों की संख्या और प्रतिशत - १२,00 {२%}
-- १५ - २४ साल के लोगों में एचआईवी पुरुषों में - ०.३% और महिला ०.३%
-- १५-२४ साल के लोगों में जो पिछले एक वर्ष में एक से अधिक जीवन साथी के साथ लैंगिक सम्बन्ध बनाये उनका प्रतिशत पुरुष - १.६%, महिला ०.१%
-- एचआईवी से ग्रसित अनाथ बच्चों की संख्या २५,०००,०००
इस सच्चाई को जानने के बाद यही कहा जा सकता हैं की एड्स एक बड़ी बीमारी हैं - बेहद खतरनाक भी, लेकिन कोई समाज जितना बीमारियों से नहीं मरता उतना अपने रवैये से नष्ट होता हैं। एड्स का हम मुकाबला कर सकते हैं लेकिन उस डर, उस नासमझ का सामना कैसे करें जो अमानवीय ढंग से हमें अपने ही समाज के कुछ असहाय लोगों से काट डालती हैं । उन्हें अछूत बना डालती हैं। भारत सिर्फ एड्स का नहीं बल्कि कई बीमारियों का घर है। उन्नीसवीं सदी की बीमारियाँ इस इक्कीसवी सदी में पलट कर हमला कर रही हैं। हम प्लेग और पोलियो से भी लड़ रहे हैं। कैंसर एड्स की ही तरह रहस्यमय और जानलेवा बीमारी बना हुआ हैं। डायबिटीज को खामोश महामारी कहा जाता हैं। लेकिन और भी कई खामोश महामारियां से इस समाज को बीमार बनाने में लगी हैं। हमने एक चमकता हुआ भारत बनाया लेकिन इस भारत में कई हाँफते,कराहते,खांसते भारत भी शामिल हैं। वो बेदखल भारत शामिल हैं जो अपने घर परिवार से सैकड़ों मील दूर ज़िन्दगी और रोजगार की जद्दोजहद में रोज खुद को गला रहे हैं। छोटे-छोटे शहरों से देश के महानगरों तक ज़िन्दगी की तलाश में पहुंचे ये लोग अपने जिस्म में मौत के कीड़े लेकर लौटते हैं। और उनके घर वाले जान तक नहीं पाते कि आखिर उन्हें बीमारी है क्या ? ये वो एड्स हैं जो शरीर को नहीं बल्कि समाज को खा रहा हैं। फिर कहना होगा कि एड्स का इलाज सिर्फ एंटी रेट्रो वायरल थेरपी से नहीं हो सकता। इसके लिए पूरे समाज की धमानिया साफ़ करनी होगी उसका रक्त बदलना होगा। ये काम आसान नहीं है इसके बिना हम एड्स और कैंसर के इलाज खोज भी लें तो भी अपने समाज को नहीं बचा पायेंगे। क्यों कि हम इस लिए नहीं मर रहे हैं कि दवाएं नहीं हैं बल्कि इस लिए मर रहे हैं कि उनके पास दवाओं तक पहुंचने का साधन नहीं हैं ।
Wednesday, November 10, 2010
जय हिन्द बराक ओबामा
आखिर ऊँट पहाड़ के नीचे आ ही गया। यानी दुनिया का तानाशाह औकात पर आ गया। कल तक जो भारत की तरफ आँखें तरेरता था अब उसकी आँखों में पानी भर आया हैं। और आँखों में पानी भरने कि वजह भी साफ़ हैं । जब राजा के यहाँ बेरोजगारी मुह फैलाकर खड़ी होने लगी तो भारत कि तरफ आस जागी। और इसी आस के साथ इस व्यापारी ने भारत से कारोबार करके अब अमेरिकी बाज़ार को गुलजार करेगा। " जय हिन्द, बहुत धन्यवाद,नमस्ते" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके और लच्छीदार भाषण पिलाकर भारत से जो उसे चाहिए था वो ले लिया। और भारत भी उसके इस भाषण से लट्टू हो गया। और भारत को जिस तरह कि उम्मीद थी वो मिल गयी। ओबामा ने आज भारत को विश्व पटल में एक नया आयाम दिया हैं। और इसकी बानगी यही हैं कि भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थाई सदस्यता के लिए ओबामा ने वकालत भी कर दी। यानी सुरक्षा परिषदमें भारत कि दावेदारी पर मोहर लगा दी हैं। सुरक्षा परिषद के क्या दाँव पेंच हैं इसे समझने के लिए सबसे पहले सुरक्षा परिषद के बारे में जाना जरूरी होगा।
संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रमुख अंग
सयुंक्त राष्ट्र संघ के संविधान में इसके छह प्रमुख अंगों का वर्णन किया गया हैं ।
१ - महासभा
२ - सुरक्षा परिषद
३- आर्थिक व सामाजिक परिषद
४- न्याशी परिषद
५- अंतरर्राष्ट्रीय न्यायलय
६- सचिवालय
सुरक्षा परिषद
सुरक्षा परिषद विश्व शांति एवं सुरक्षा से सम्बन्धित संयुक्त राष्ट्र संघ के दायित्वों को पूरा करने वाला आदेशात्मक संस्था है। इसके १५ सदस्य हैं। जिनमें पांच स्थायी सदस्य हैं- अमेरिका, ब्रिटेन, साम्यवादी चीन, फ़्रांस और रूस । अस्थायी सदस्यों को सयुंक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा दो वर्षों के लिए चुना जाता है। अस्थायी सदस्यों में सामान्यतः पांच अफ्रीकी एशियाई देशों से, दो लैटिन अमेरिका, दो पश्चिमी यूरोप तथा एक पूर्वी यूरोप से चुने जाते हैं। अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षरों के क्रम से सभी देश एक-एक मास के लिए सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता करते हैं। सुरक्षा परिषद के अंतर्गत प्रक्रिया संबंधी सामान्य विषयों पर किन्ही ९ सदस्यों के समर्थन से कोई प्रस्ताव पारित किया जा सकता है। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा से सम्बंधित किसी विषय पर उन नौ सदस्यों में पांचो स्थायी सदस्यों का समर्थन हासिल होना आवश्यक हैं। यदि स्थायी सदस्यों में से किसी ने प्रस्ताव के खिलाफ समर्थन कर दिया तो प्रस्ताव पारित नहीं माना जाएगा। इस प्रकार स्थायी सदस्यों को वीटो शक्ति का निषेधाधिकार दिया गया हैं। जिसका प्रयोग करके वो किसी मुद्दे पर प्रस्ताव पारित करने या किसी कारवाई को रोक देते हैं।
अपने दायित्वों को पूरा करने के क्रम में सुरक्षा परिषद सर्वप्रथम शांतिपूर्ण उपायों से विवादों के समाधान का प्रयास करती हैं। जिनमें विचार विमर्श, मध्यस्थता आदि शामिल हैं। यह क्षेत्रीय संगठनों को भी विवादों के समाधान हेतु प्रोत्साहित करती है। शांतिपूर्ण उपायों द्वारा विवादों का समाधान न होने पर यह दोषी राष्ट्रों के विरुद्ध कूटनीतिक, आर्थिक व वित्तीय दंड निर्धारित करती है एवं अंतिम उपाय के रूप में सैनिक कारवाई का आदेश भी दे सकती है।
सुरक्षा परिषद में सुधार का प्रश्न - वर्तमान समय में विश्व की बदली हुई राजनैतिक एवं आर्थिक व्यवस्था के अनुरूप सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग लगातार की जा रही हैं। जिससे अफ्रीका, एशिया तथा लैटिन अमेरिकी देशों को उचित प्रतिनिधत्व प्राप्त हो सके । संयुक्त राष्ट्र के अस्तित्व में आने के छह दशकों के दौरान विश्व व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव आ गया है। दूसरे विश्व युद्ध के खलनायक देश जापान और जर्मनी की अर्थ व्यवस्था क्रमशः विश्व की दूसरी और तीसरी बड़ी अर्थ व्यवस्था बन चुकी है। दूसरी ओर भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, व मैक्सिको जैसे देश विश्व की तेजी से बढ़ती हुई अर्थ व्यवस्था वाले देश बनकर उभरे हैं । जहां तक भारत की सुरक्षा परिषद में दावेदारी का प्रश्न है अमेरिका व चीन को छोड़कर अन्य तीन स्थायी सदस्यों ने खुलकर समर्थन किया हैं ( अमेरिका ने अब समर्थन किया हैं ) । जबकि विश्व के अन्य प्रमुख देशों सहित विकासशील देशों ने ऐसी ही मंशा जतायी हैं। हालाँकि सुरक्षा परिषद में सुधार के स्वरूप को लेकर देशों के बीच मतभेद हैं कुछ का मानना है कि सुरक्षा परिषद के नए सदस्यों को वीटो पावर न दिया जाए। जबकि सदस्यता के इच्छुक भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका,जापान व जर्मनी इस शक्ति के बगैर सुरक्षा परिषद की सदस्यता को उचित नहीं मानते।
लेकिन अब अमेरिका ने भारत के दावेदारी को मजबूती प्रदान कर दी हैं। लिहाजा विरोध झेलना है केवल चीन का । इस लिहाज से स्थायी सदस्यता की राह खुलती नजर आ रही हैं। लेकिन अभी राह आसान नहीं हैं । केवल उम्मीद जाग गयी हैं । और उम्मीद पर तो पूरी दुनिया टिकी है। लेकिन जैसे ही ओबामा ने खुल कर समर्थन किया तो दावेदारी के अन्य सदस्यों की भौंहें तन गयी हैं । इस सीट के लिए प्रबल दावेदारों में शुमार किये जा रहे जापान और जर्मनी ने आरोप लगाया है कि उनकी अनदेखी की जा रही है। भारत के धुर विरोधी पाकिस्तान ने तो अमेरिकी राजदूत से मिलकर अपना विरोध औपचारिक रूप से भी दर्ज करा दिया हैं। जब कि तथ्य यही है कि अभी ये तो दूर की कौड़ी हैं। लेकिन अन्य देशों की नीद हराम हो गयी हैं।
ओबामा की नब्ज - ओबामा ने भारत को एक उभर चुका देश कहा हैं। यानी अब हम विकसित देश की कतार में शामिल हो गए। लेकिन ऐसा नहीं हैं। अमेरिका ने अभी स्थायी सदस्यता के लिए जापान का समर्थन किया है। जब कि जी - ४ का विरोध किया है । इस समूह में जापान, जर्मनी , भारत और ब्राजील शामिल हैं। इस तरह ओबामा ने भारत के दावे का समर्थन करके अपना रूख तो स्पष्ट कर दिया है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि जी- ४ मामले में अमेरिका भारत का समर्थन करेगा।
कौन किसके खिलाफ - सयुंक्त राष्ट्र की स्थायी सदस्यता चाहने वालों में आपस में ही एक दूसरे के विरोधी हैं । जैसे - जापान और भारत की दावेदारी के खिलाफ चीन हैं। ब्राजील को मैक्सिकोऔर अर्जेंटीन का विरोध झेलना पड़ रहा है। अफ्रीका में दक्षिण अफ्रीका सबसे प्रबल दावेदार हैं । लेकिन कुछ और देश अपनी दावेदारी पेश कर सकते हैं। इधर इसके स्थायी सदस्य ज्यादातर यूरोपीय देशों के हैं। और वो चाहते हैं कि विश्व के हर हिस्से के देशों को इसका प्रतिनिधत्व दिया जाए ।
इन सब तमाम पेंच को देखकर लगता हैं कि कहीं स्थायी सदस्यता खैनी पुलाव न साबित हो लेकिन ऐसा नहीं होगा। और ओबामा के जय हिन्द ने भारत को एक नयी ऊर्जा दी हैं और उसी सकारात्मक ऊर्जा के साथ भारत को अपने कदम आगे बढ़ाना होगा।
संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रमुख अंग
सयुंक्त राष्ट्र संघ के संविधान में इसके छह प्रमुख अंगों का वर्णन किया गया हैं ।
१ - महासभा
२ - सुरक्षा परिषद
३- आर्थिक व सामाजिक परिषद
४- न्याशी परिषद
५- अंतरर्राष्ट्रीय न्यायलय
६- सचिवालय
सुरक्षा परिषद
सुरक्षा परिषद विश्व शांति एवं सुरक्षा से सम्बन्धित संयुक्त राष्ट्र संघ के दायित्वों को पूरा करने वाला आदेशात्मक संस्था है। इसके १५ सदस्य हैं। जिनमें पांच स्थायी सदस्य हैं- अमेरिका, ब्रिटेन, साम्यवादी चीन, फ़्रांस और रूस । अस्थायी सदस्यों को सयुंक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा दो वर्षों के लिए चुना जाता है। अस्थायी सदस्यों में सामान्यतः पांच अफ्रीकी एशियाई देशों से, दो लैटिन अमेरिका, दो पश्चिमी यूरोप तथा एक पूर्वी यूरोप से चुने जाते हैं। अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षरों के क्रम से सभी देश एक-एक मास के लिए सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता करते हैं। सुरक्षा परिषद के अंतर्गत प्रक्रिया संबंधी सामान्य विषयों पर किन्ही ९ सदस्यों के समर्थन से कोई प्रस्ताव पारित किया जा सकता है। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा से सम्बंधित किसी विषय पर उन नौ सदस्यों में पांचो स्थायी सदस्यों का समर्थन हासिल होना आवश्यक हैं। यदि स्थायी सदस्यों में से किसी ने प्रस्ताव के खिलाफ समर्थन कर दिया तो प्रस्ताव पारित नहीं माना जाएगा। इस प्रकार स्थायी सदस्यों को वीटो शक्ति का निषेधाधिकार दिया गया हैं। जिसका प्रयोग करके वो किसी मुद्दे पर प्रस्ताव पारित करने या किसी कारवाई को रोक देते हैं।
अपने दायित्वों को पूरा करने के क्रम में सुरक्षा परिषद सर्वप्रथम शांतिपूर्ण उपायों से विवादों के समाधान का प्रयास करती हैं। जिनमें विचार विमर्श, मध्यस्थता आदि शामिल हैं। यह क्षेत्रीय संगठनों को भी विवादों के समाधान हेतु प्रोत्साहित करती है। शांतिपूर्ण उपायों द्वारा विवादों का समाधान न होने पर यह दोषी राष्ट्रों के विरुद्ध कूटनीतिक, आर्थिक व वित्तीय दंड निर्धारित करती है एवं अंतिम उपाय के रूप में सैनिक कारवाई का आदेश भी दे सकती है।
सुरक्षा परिषद में सुधार का प्रश्न - वर्तमान समय में विश्व की बदली हुई राजनैतिक एवं आर्थिक व्यवस्था के अनुरूप सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग लगातार की जा रही हैं। जिससे अफ्रीका, एशिया तथा लैटिन अमेरिकी देशों को उचित प्रतिनिधत्व प्राप्त हो सके । संयुक्त राष्ट्र के अस्तित्व में आने के छह दशकों के दौरान विश्व व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव आ गया है। दूसरे विश्व युद्ध के खलनायक देश जापान और जर्मनी की अर्थ व्यवस्था क्रमशः विश्व की दूसरी और तीसरी बड़ी अर्थ व्यवस्था बन चुकी है। दूसरी ओर भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, व मैक्सिको जैसे देश विश्व की तेजी से बढ़ती हुई अर्थ व्यवस्था वाले देश बनकर उभरे हैं । जहां तक भारत की सुरक्षा परिषद में दावेदारी का प्रश्न है अमेरिका व चीन को छोड़कर अन्य तीन स्थायी सदस्यों ने खुलकर समर्थन किया हैं ( अमेरिका ने अब समर्थन किया हैं ) । जबकि विश्व के अन्य प्रमुख देशों सहित विकासशील देशों ने ऐसी ही मंशा जतायी हैं। हालाँकि सुरक्षा परिषद में सुधार के स्वरूप को लेकर देशों के बीच मतभेद हैं कुछ का मानना है कि सुरक्षा परिषद के नए सदस्यों को वीटो पावर न दिया जाए। जबकि सदस्यता के इच्छुक भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका,जापान व जर्मनी इस शक्ति के बगैर सुरक्षा परिषद की सदस्यता को उचित नहीं मानते।
लेकिन अब अमेरिका ने भारत के दावेदारी को मजबूती प्रदान कर दी हैं। लिहाजा विरोध झेलना है केवल चीन का । इस लिहाज से स्थायी सदस्यता की राह खुलती नजर आ रही हैं। लेकिन अभी राह आसान नहीं हैं । केवल उम्मीद जाग गयी हैं । और उम्मीद पर तो पूरी दुनिया टिकी है। लेकिन जैसे ही ओबामा ने खुल कर समर्थन किया तो दावेदारी के अन्य सदस्यों की भौंहें तन गयी हैं । इस सीट के लिए प्रबल दावेदारों में शुमार किये जा रहे जापान और जर्मनी ने आरोप लगाया है कि उनकी अनदेखी की जा रही है। भारत के धुर विरोधी पाकिस्तान ने तो अमेरिकी राजदूत से मिलकर अपना विरोध औपचारिक रूप से भी दर्ज करा दिया हैं। जब कि तथ्य यही है कि अभी ये तो दूर की कौड़ी हैं। लेकिन अन्य देशों की नीद हराम हो गयी हैं।
ओबामा की नब्ज - ओबामा ने भारत को एक उभर चुका देश कहा हैं। यानी अब हम विकसित देश की कतार में शामिल हो गए। लेकिन ऐसा नहीं हैं। अमेरिका ने अभी स्थायी सदस्यता के लिए जापान का समर्थन किया है। जब कि जी - ४ का विरोध किया है । इस समूह में जापान, जर्मनी , भारत और ब्राजील शामिल हैं। इस तरह ओबामा ने भारत के दावे का समर्थन करके अपना रूख तो स्पष्ट कर दिया है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि जी- ४ मामले में अमेरिका भारत का समर्थन करेगा।
कौन किसके खिलाफ - सयुंक्त राष्ट्र की स्थायी सदस्यता चाहने वालों में आपस में ही एक दूसरे के विरोधी हैं । जैसे - जापान और भारत की दावेदारी के खिलाफ चीन हैं। ब्राजील को मैक्सिकोऔर अर्जेंटीन का विरोध झेलना पड़ रहा है। अफ्रीका में दक्षिण अफ्रीका सबसे प्रबल दावेदार हैं । लेकिन कुछ और देश अपनी दावेदारी पेश कर सकते हैं। इधर इसके स्थायी सदस्य ज्यादातर यूरोपीय देशों के हैं। और वो चाहते हैं कि विश्व के हर हिस्से के देशों को इसका प्रतिनिधत्व दिया जाए ।
इन सब तमाम पेंच को देखकर लगता हैं कि कहीं स्थायी सदस्यता खैनी पुलाव न साबित हो लेकिन ऐसा नहीं होगा। और ओबामा के जय हिन्द ने भारत को एक नयी ऊर्जा दी हैं और उसी सकारात्मक ऊर्जा के साथ भारत को अपने कदम आगे बढ़ाना होगा।
Thursday, November 4, 2010
झंडा ऊंचा रहे हमारा देश फिरै चाहे मारा - मारा
यह कहानी आजाद भारत की हैं। जहाँ तिरंगा भले ही न लहरा रहा हो , लेकिन तिरंगे की कुंडली मारे बैठे देश के राजनीतिक दलों के झंडे लक्ष्मी जी की ऊर्जा से लहरा रहे हैं। सरकार के पास अनाज सडाने का प्रावधान हैं,उसे पानी में बहाने का प्रावधान हैं लेकिन गरीबों में बांटने का प्रावधान नहीं हैं। राजनीतिक पार्टियां मालामाल हैं। आम आदमी फटे हाल हैं। दिन दो गुना रात चौगुना की रफ़्तार से राजनीतिक पार्टियों का खजाना भर रहा हैं। आज़ाद भारत में दो जून की रोटी के लिए जिन्हें लाले पड़ रहे हैं उनसे पूछो आपको आज़ादी के बाद क्या मिला ? और देश के नेताओं से पूछो कि उन्होंने देश की आज़ादी के बाद क्या हासिल किया ? इसका जवाब यही होगा कि देश के राजनीतिक दल आज़ाद भारत का भविष्य चर रहे हैं।
हाल ही में सूचना के अधिकार के तहत जो जानकारी सामने आई हैं । उसका अंदेशा सबको होगा और वही जानकारी मिली हैं जो राजनीतिक दलों से उम्मीद की जा सकती हैं। देश में कांग्रेस पार्टी सबसे अमीर दल के रूप में उभरकर सामने आई हैं । हालाँकि पिछले एक साल के दौरान खजाने में सबसे ज्यादा बढ़ोत्तरी सर्व धर्म सुखाय सर्व धर्म हिताय का नारा देने वाली बहुजन समाज पार्टी ने किया हैं। आंकड़ों के अनुसार ३१ मार्च २००९ तक छह सालों के दौरान कांग्रेस को सबसे अधिक ४९७ करोड़ रुपये कि कमाई हुयी है। २००२ से २००९ के बीच कांग्रेस की कुल संपत्ति १५१८ करोड़ रुपये की आंकी गयी हैं। वहीँ २००९ से १० के दौरान भाजपा के खजाने में २२० करोड़ रुपये व बसपा के खजाने में १८२ करोड़ रूपये की कमाई दर्ज हैं। पिछले ६ सालों के दौरान कुल आय वृद्धि दर के मामले में बसपा ने सबको पीछे छोड़ दिया। बसपा ने २००२ से ०९ के बीच ५९ फीसदी की दर से अपनी आय बढाई है। जब कि कांग्रेस की आय ४२ फीसदी की दर से बढ़ी है । कांग्रेस की सहयोगी एन.सी.पी.ने अपना खजाना भरने में ५१% की दर से बढ़ोत्तरी की हैं। वहीँ सपा ने ४४% की वृद्धि दर के साथ खजाना भरा है। असोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रेफोर्म्स ( ए.डी.आर.) ने सूचना के अधिकार के तहत सभी राजनीतिक पार्टियों का आयकर और अचल संपत्ति के आधार पर उक्त विश्लेषण किया हैं । केन्द्रीय सूचना आयोग के आदेश के बाद सभी प्रमुख पार्टियों ने अपनी सम्पत्ति और आय का ब्यौरा दिया। वहीँ पिछले एक साल में सीपीआई ने एक करोड़, समाजवादी पार्टी ने ४० करोड़, सीपीएम ने ६३ करोड़ व राजद ने ४ करोड़ का फंड जुटाया।
२००२ - २००३ से लेकर २००९-१० के अंतराल में कुल संपत्ति के मामले में भी कांग्रेस सबसे आगे है । इस दौरान कांग्रेस की कुल संपत्ति १५१८ करोड़ रुपये रही। जब कि भाजपा की इस अवधि में ७५४ करोड़ रुपये की कुल संपत्ति के साथ दूसरे स्थान पर है। बसपा की कुल संपत्ति की कीमत ३५८ करोड़ रुपये आंकी गयी है। पिछले छह सालों के दौरान सीपीएम की कुल संपत्ति ३३९ करोड़ रुपये सपा की २६३ करोड़ रुपये रही जब कि राजद की संपत्ति १५ करोड़ और सीपीआई की कुल संपत्ति महज ७ करोड़ आंकी गयी।
यक्ष अब सवाल यहाँ से ये उठता है कि जो भी पार्टी सत्ता में आती है उसका वित्तीय मामले में रोना शुरू हो जता है। अच्छी योजनाओं के लिए फंड में कमी,कानूनी दांव पेंच जैसे मामले की वजह से योजनायें अधर में लटक जाती हैं। जबकि सत्ता का नशा चढ़ते ही पार्टी मालामाल होना शुरू हो जाती हैं। रिकॉर्ड तोड़ कमाई करने वाली मायावती की पार्टी की बात की जाए तो वो नोटों की माला पहनने में ही सम्मान समझती है। और दलील देती हैं कि दलित की बेटी हूँ। मेरे कार्यकर्ताओं ने धन एकत्र करके दिया है, जब आपके कार्यकर्ताओं में इतनी कूवत है तो उन्हें निर्धन, असहाय लोगों की सेवा में क्यों नहीं लगाया जाता है? उल्टे जूं बन कर उन्हीं का खून चूसने निकल पड़ते है॥ आज हर एक राजनीतिक दल का यही हाल है। बड़े नेता जिस भी अमुक जगह में पहुँचते हैं रुपयों की पोटली बाँध कर विदा किया जाता हैं.जबकि उसी जगह कितने लोग जीवन निर्वाह के लिए अपने शरीर की हड्डियों का ढांचा ढोनेके लिए मजबूर होते हैं। मुंबई में लालकृष्ण आडवाणी के आने पर करोड़ों रुपये की धन राशि दी गयी थी । इसको देने वाले और खर्च करने वाले ही आज देश के भस्मासुर है ।
अब ज़रुरत हैं लोकतंत्र के जिस ढाँचे को पीढ़ियों से ढोया जा रहा है उसमें बदलाव करने की। कितना गलत पढ़ाया जा रहा है कि सरकार जनता ने चुना हैं जबकि जनता ने सिर्फ विधायक और सांसद चुने हैं न कि प्रधानमन्त्री और मुख्यमंत्री नहीं। देश का कोई आम नागरिक कह दे कि ,मैंने प्रधानमन्त्री और मुख्यमंत्री का चयन किया हैं। और यहीं से भ्रष्टाचार पनपना शुरू हो जाता हैं। और हकीकत जानना है तो कहते हैं बहमत प्राप्त दल के सदस्य अपना नेता चुनते हैं। कितने सदस्यों ने अपना नेता स्वतंत्र रूप से चुना है। आज देश के नेताओं की शैक्षिक योग्यता निर्धारित होना अनिवार्य हैं तभी कहा जाए कि लोकतंत्र प्रधान देश है। नहीं तो संसद भवन में नोटों की गड्डी लहराना अभी तो एक बानगी हैं। आगे क्या होगा देश के मालामाल नेता और मालामाल राजनीतिक दल जानें। क्योंकि भविष्य निर्माता यही हैं। देश का झंडा इन्हें भाता नहीं हैं इनके कार्यालयों में पार्टी का झंडा लहराएगा। इसी लिए राजनीतिक पार्टियों के तरफ से झंडा ऊंचा रहे हमारा देश फिरै चाहे मारा-मारा ।
हाल ही में सूचना के अधिकार के तहत जो जानकारी सामने आई हैं । उसका अंदेशा सबको होगा और वही जानकारी मिली हैं जो राजनीतिक दलों से उम्मीद की जा सकती हैं। देश में कांग्रेस पार्टी सबसे अमीर दल के रूप में उभरकर सामने आई हैं । हालाँकि पिछले एक साल के दौरान खजाने में सबसे ज्यादा बढ़ोत्तरी सर्व धर्म सुखाय सर्व धर्म हिताय का नारा देने वाली बहुजन समाज पार्टी ने किया हैं। आंकड़ों के अनुसार ३१ मार्च २००९ तक छह सालों के दौरान कांग्रेस को सबसे अधिक ४९७ करोड़ रुपये कि कमाई हुयी है। २००२ से २००९ के बीच कांग्रेस की कुल संपत्ति १५१८ करोड़ रुपये की आंकी गयी हैं। वहीँ २००९ से १० के दौरान भाजपा के खजाने में २२० करोड़ रुपये व बसपा के खजाने में १८२ करोड़ रूपये की कमाई दर्ज हैं। पिछले ६ सालों के दौरान कुल आय वृद्धि दर के मामले में बसपा ने सबको पीछे छोड़ दिया। बसपा ने २००२ से ०९ के बीच ५९ फीसदी की दर से अपनी आय बढाई है। जब कि कांग्रेस की आय ४२ फीसदी की दर से बढ़ी है । कांग्रेस की सहयोगी एन.सी.पी.ने अपना खजाना भरने में ५१% की दर से बढ़ोत्तरी की हैं। वहीँ सपा ने ४४% की वृद्धि दर के साथ खजाना भरा है। असोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रेफोर्म्स ( ए.डी.आर.) ने सूचना के अधिकार के तहत सभी राजनीतिक पार्टियों का आयकर और अचल संपत्ति के आधार पर उक्त विश्लेषण किया हैं । केन्द्रीय सूचना आयोग के आदेश के बाद सभी प्रमुख पार्टियों ने अपनी सम्पत्ति और आय का ब्यौरा दिया। वहीँ पिछले एक साल में सीपीआई ने एक करोड़, समाजवादी पार्टी ने ४० करोड़, सीपीएम ने ६३ करोड़ व राजद ने ४ करोड़ का फंड जुटाया।
२००२ - २००३ से लेकर २००९-१० के अंतराल में कुल संपत्ति के मामले में भी कांग्रेस सबसे आगे है । इस दौरान कांग्रेस की कुल संपत्ति १५१८ करोड़ रुपये रही। जब कि भाजपा की इस अवधि में ७५४ करोड़ रुपये की कुल संपत्ति के साथ दूसरे स्थान पर है। बसपा की कुल संपत्ति की कीमत ३५८ करोड़ रुपये आंकी गयी है। पिछले छह सालों के दौरान सीपीएम की कुल संपत्ति ३३९ करोड़ रुपये सपा की २६३ करोड़ रुपये रही जब कि राजद की संपत्ति १५ करोड़ और सीपीआई की कुल संपत्ति महज ७ करोड़ आंकी गयी।
यक्ष अब सवाल यहाँ से ये उठता है कि जो भी पार्टी सत्ता में आती है उसका वित्तीय मामले में रोना शुरू हो जता है। अच्छी योजनाओं के लिए फंड में कमी,कानूनी दांव पेंच जैसे मामले की वजह से योजनायें अधर में लटक जाती हैं। जबकि सत्ता का नशा चढ़ते ही पार्टी मालामाल होना शुरू हो जाती हैं। रिकॉर्ड तोड़ कमाई करने वाली मायावती की पार्टी की बात की जाए तो वो नोटों की माला पहनने में ही सम्मान समझती है। और दलील देती हैं कि दलित की बेटी हूँ। मेरे कार्यकर्ताओं ने धन एकत्र करके दिया है, जब आपके कार्यकर्ताओं में इतनी कूवत है तो उन्हें निर्धन, असहाय लोगों की सेवा में क्यों नहीं लगाया जाता है? उल्टे जूं बन कर उन्हीं का खून चूसने निकल पड़ते है॥ आज हर एक राजनीतिक दल का यही हाल है। बड़े नेता जिस भी अमुक जगह में पहुँचते हैं रुपयों की पोटली बाँध कर विदा किया जाता हैं.जबकि उसी जगह कितने लोग जीवन निर्वाह के लिए अपने शरीर की हड्डियों का ढांचा ढोनेके लिए मजबूर होते हैं। मुंबई में लालकृष्ण आडवाणी के आने पर करोड़ों रुपये की धन राशि दी गयी थी । इसको देने वाले और खर्च करने वाले ही आज देश के भस्मासुर है ।
अब ज़रुरत हैं लोकतंत्र के जिस ढाँचे को पीढ़ियों से ढोया जा रहा है उसमें बदलाव करने की। कितना गलत पढ़ाया जा रहा है कि सरकार जनता ने चुना हैं जबकि जनता ने सिर्फ विधायक और सांसद चुने हैं न कि प्रधानमन्त्री और मुख्यमंत्री नहीं। देश का कोई आम नागरिक कह दे कि ,मैंने प्रधानमन्त्री और मुख्यमंत्री का चयन किया हैं। और यहीं से भ्रष्टाचार पनपना शुरू हो जाता हैं। और हकीकत जानना है तो कहते हैं बहमत प्राप्त दल के सदस्य अपना नेता चुनते हैं। कितने सदस्यों ने अपना नेता स्वतंत्र रूप से चुना है। आज देश के नेताओं की शैक्षिक योग्यता निर्धारित होना अनिवार्य हैं तभी कहा जाए कि लोकतंत्र प्रधान देश है। नहीं तो संसद भवन में नोटों की गड्डी लहराना अभी तो एक बानगी हैं। आगे क्या होगा देश के मालामाल नेता और मालामाल राजनीतिक दल जानें। क्योंकि भविष्य निर्माता यही हैं। देश का झंडा इन्हें भाता नहीं हैं इनके कार्यालयों में पार्टी का झंडा लहराएगा। इसी लिए राजनीतिक पार्टियों के तरफ से झंडा ऊंचा रहे हमारा देश फिरै चाहे मारा-मारा ।
Saturday, October 30, 2010
हीरो की ज़रुरत है नीरो की नहीं
हिंदुस्तान के जिस राज्य को विशेषाधिकार प्राप्त राज्य घोषित किया गया है जहां जीवनावश्यक वस्तुएं सस्ते दामों पर मुहैया कराई जाती हैं आज उस राज्य में आग के गोले बरस रहे हैं । जम्मू का जमूरा आज सत्ताधारी दल के पास नहीं है । मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला हों या प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह कश्मीर के नीरो बने हुए हैं। आज कश्मीर को नीरो कि नहीं हीरो कि ज़रुरत है। जो वहां दहकते शोलों को बुझाकर रहनुमाई दे सके । अब अगर कश्मीर के baare में ज्यादा जानकारी चाहिए, तो उसके अतीत को जानना ज़रूरी होगा। तभी कश्मीर क्यों जल रहा है का सटीक विश्लेषण हो सकेगा ।
राजतरंगिणी ( कल्हण ) तथा नीलमत पुराण के अनुसार , कश्मीर की घाटी पहले बहुत बड़ी झील थी । भू गर्भ शास्त्रियों के मतानुसार , भूगर्भीय परिवर्तों के कारण खादियानुसार , बारामुला में पहाड़ों के घर्षण से झील का पानी बहार निकल गया। फलतः घटी का निर्माण हो गया। पौराणिक आख्यान के अनुसार, कश्यप मुनि के नाम पर कश्मीर का naam प्रचलित हुआ।
ईसा पूर्व तीसरी सदी में सम्राट अशोक ने कश्मीर में बौद्धधर्म का प्रचार किया । छठी शताब्दी के आरम्भ में कश्मीर पर हूणों का अधिकार हो गया। इसके बाद यहाँ पर कार्कोट, उत्पल और लोहार वंशीय राजाओं ने शाशन किया। हिन्दू राजाओं में ललितादित्य मुक्तापीद ( सन 697 से 738 ) सबसे प्रसिद्ध राजा हुए । कश्मीर में इस्लाम का आगमन 13 वीं शताब्दी और 14वीं शताब्दी में हुआ। यहाँ के मुश्लिम शाशकों में जैन-उल आबदीन (१४२०-७०) ससबसे प्रसिद्ध शासक हुआ। सन १८५७ में कश्मीर मुग़ल शासकों के हाथ से निकलकर अहमद शाह अब्ब्दाली के पास चला गया । पठानों ने ६७ वर्ष तक कश्मीर पर शासन किया।
सन १७३३ से १७५२ तक राजा रणजीत सिंह ने जम्मू पर शासन किया। बाद में उन्होंने इसे पंजाब में मिलकर डोगरा शाही परिवार के एक व्यक्ति गुलाब सिंह को जम्मो सौंप दिया। गुलाब सिंह रणजीत सिंह के गवर्नरों में सबसे शक्तिशाली बन गया। सन १९४७ तक जम्मो पर डोगरा शासकों का आधिपत्य रहा। भारत द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद महाराजा हरि सिंह ने १९४७ में कश्मीर राज्य ko भारत में विलय के समझौते पर हस्ताक्षर किये।
महाराजा के पुत्र कर्ण सिंह १९५० में रेजिडेंट बने और आनुवंशिकी शासन की समाप्ति (१७ अक्टूबर १९५२) पर उन्हें सद्र - ए - रियासत पद की शपथ दिलाई गयी । भारत के संविधान में उल्लेखित धारा ३७० के अंतर्गत यह एक विशेषाधिकार प्राप्त राज्य है। जम्मू कश्मीर राज्य का संविधान २६ जनवरी १९५७ से लागू हुआ।
अब आज जम्मू के क्या हालत हैं ये सभी जान रहे हैं। क्या कहा जाए की १९५७ से अब तक नाटक चल रहा हैं और आगे भी चलता रहेगा। जब जम्मू में आग दहकने लगी तो केंद्र सरकार ने ताजा स्थिति का जायजा लेने के लिए सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल भेजने का फैसला किया। ताज्जुब इस बात का रहा की किसी ने भी उमर अब्ब्दुल्ला सरकार को बर्खास्त करने की मांग तक नहीं की । इस पूरे बैठक में नेताओं के दिमाग में कितना दीवालियापन है ये भी साबित हो गया । माकपा, भाकपा, जदयू, राजद , लोजपा जैसी वामपंथी और समाजवादी विचार धारा चरने चरने वाली पार्टियों ने कश्मीर से सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून तथा जनसुरक्षा क़ानून पूरी तरह वापस लेने की मांग की हैं। यक्ष सवाल यहाँ पर ये उठता है कि देश के इन नेताओं को कितना ज्ञान है। कश्मीर में सुर्क्षों बालों को मिले जिन विशेषाधिकारों पर हो हल्ला मचा हुआ है। वे पहले ही ख़त्म हो चुके हैं। १९९८ में राज्य की नेशनल कांफ्रेस सरकार ने इसे अपने आप ही समाप्त हो जाने दिया था । और इसकी अवधिको आगे नहीं बढ़ाया था। मौजूदा समय में सरकारी रिकार्ड के मुताबिक़ जम्मू कश्मीर में सुरक्षा बालों को विशेषाधिकार प्राप्त नहीं हैं। अब जिन लोगों को दोबारा भेजा हैं उन लोगों ने तो अलग ही राग अलापना शुरू कर दिया । उन्हें पाकिस्तान पापा नजर आ रहा हैं। जिसे राजा हरि सिंह ने कभी घास नहीं डाला उसे हमारे देश के बुद्धजीवी तत्व सब अमृत मान रहे हैं। लेखिका अरुंधती ने अपनी लेखनी के जरिये एक अलग ही शिगूफा रच दिया हैं। अरुंधति रॉय को वर्ष १९९७ के मैं बुकर पुरस्कार की विजेता हैं। अब उनको भारत की राज्य प्रणाली ही बुरी दिख रही हैं। माओवादियों की चिंता सताने के बाद अब जम्मू कश्मीर पर भी कलम फेर दिया हैं। जिन लोगों को सरकार ने जम्मू में दौरा करने के लिए भेजा हैं और जान रेपर्ट देने के लिए कहा हैं वही कह रहे हैं की जम्मू को पाकिस्तानी चश्में से देख रहे हैं। इस बंटवारे की वकालत करने वालों को एक बात बहुत बारीकी से समझना होगा दुनिया के जितने भी देस्शों का बंटवारा हुआ हैं सभी जनसंख्या या भू भाग के अधर पर हुआ हैं लेकिन इसे धर्म के नाम पर बाँट रहे हैं। और ये धर्म के नाम पर बांटने वाले सिर्फ अपना व्यक्तिगत उल्लू ही सीधा करेंगे। पाकिस्तान ने पाक अधिकृत कश्मीर में कितना विकास किया हैं और भारत के कश्मीर में कितना विकास हुआ हैं ये पहले देख लो। अलगाववादी क्यों पैदा हुए और किसने पैदा किया ? सरकार कश्मीर का इलाज ढूँढने के बजाय इसे लाइलाज छोड़ना चाहती हैं । देश के नेताओं ke दिमाग mein भरा हुआ hai की जब 63 साल से चल रहा hain तो आगे bhi चलता रहेगा। आज ज़रुरत हैं कश्मीर के हालत को ठीक अकरने के लिए। लेकिन सभी वहाँ जाकर नीरो बन कर काम कर रहे हैं। ज़रुरत हैं सही दिशा में काम करने की ।
राजतरंगिणी ( कल्हण ) तथा नीलमत पुराण के अनुसार , कश्मीर की घाटी पहले बहुत बड़ी झील थी । भू गर्भ शास्त्रियों के मतानुसार , भूगर्भीय परिवर्तों के कारण खादियानुसार , बारामुला में पहाड़ों के घर्षण से झील का पानी बहार निकल गया। फलतः घटी का निर्माण हो गया। पौराणिक आख्यान के अनुसार, कश्यप मुनि के नाम पर कश्मीर का naam प्रचलित हुआ।
ईसा पूर्व तीसरी सदी में सम्राट अशोक ने कश्मीर में बौद्धधर्म का प्रचार किया । छठी शताब्दी के आरम्भ में कश्मीर पर हूणों का अधिकार हो गया। इसके बाद यहाँ पर कार्कोट, उत्पल और लोहार वंशीय राजाओं ने शाशन किया। हिन्दू राजाओं में ललितादित्य मुक्तापीद ( सन 697 से 738 ) सबसे प्रसिद्ध राजा हुए । कश्मीर में इस्लाम का आगमन 13 वीं शताब्दी और 14वीं शताब्दी में हुआ। यहाँ के मुश्लिम शाशकों में जैन-उल आबदीन (१४२०-७०) ससबसे प्रसिद्ध शासक हुआ। सन १८५७ में कश्मीर मुग़ल शासकों के हाथ से निकलकर अहमद शाह अब्ब्दाली के पास चला गया । पठानों ने ६७ वर्ष तक कश्मीर पर शासन किया।
सन १७३३ से १७५२ तक राजा रणजीत सिंह ने जम्मू पर शासन किया। बाद में उन्होंने इसे पंजाब में मिलकर डोगरा शाही परिवार के एक व्यक्ति गुलाब सिंह को जम्मो सौंप दिया। गुलाब सिंह रणजीत सिंह के गवर्नरों में सबसे शक्तिशाली बन गया। सन १९४७ तक जम्मो पर डोगरा शासकों का आधिपत्य रहा। भारत द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद महाराजा हरि सिंह ने १९४७ में कश्मीर राज्य ko भारत में विलय के समझौते पर हस्ताक्षर किये।
महाराजा के पुत्र कर्ण सिंह १९५० में रेजिडेंट बने और आनुवंशिकी शासन की समाप्ति (१७ अक्टूबर १९५२) पर उन्हें सद्र - ए - रियासत पद की शपथ दिलाई गयी । भारत के संविधान में उल्लेखित धारा ३७० के अंतर्गत यह एक विशेषाधिकार प्राप्त राज्य है। जम्मू कश्मीर राज्य का संविधान २६ जनवरी १९५७ से लागू हुआ।
अब आज जम्मू के क्या हालत हैं ये सभी जान रहे हैं। क्या कहा जाए की १९५७ से अब तक नाटक चल रहा हैं और आगे भी चलता रहेगा। जब जम्मू में आग दहकने लगी तो केंद्र सरकार ने ताजा स्थिति का जायजा लेने के लिए सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल भेजने का फैसला किया। ताज्जुब इस बात का रहा की किसी ने भी उमर अब्ब्दुल्ला सरकार को बर्खास्त करने की मांग तक नहीं की । इस पूरे बैठक में नेताओं के दिमाग में कितना दीवालियापन है ये भी साबित हो गया । माकपा, भाकपा, जदयू, राजद , लोजपा जैसी वामपंथी और समाजवादी विचार धारा चरने चरने वाली पार्टियों ने कश्मीर से सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून तथा जनसुरक्षा क़ानून पूरी तरह वापस लेने की मांग की हैं। यक्ष सवाल यहाँ पर ये उठता है कि देश के इन नेताओं को कितना ज्ञान है। कश्मीर में सुर्क्षों बालों को मिले जिन विशेषाधिकारों पर हो हल्ला मचा हुआ है। वे पहले ही ख़त्म हो चुके हैं। १९९८ में राज्य की नेशनल कांफ्रेस सरकार ने इसे अपने आप ही समाप्त हो जाने दिया था । और इसकी अवधिको आगे नहीं बढ़ाया था। मौजूदा समय में सरकारी रिकार्ड के मुताबिक़ जम्मू कश्मीर में सुरक्षा बालों को विशेषाधिकार प्राप्त नहीं हैं। अब जिन लोगों को दोबारा भेजा हैं उन लोगों ने तो अलग ही राग अलापना शुरू कर दिया । उन्हें पाकिस्तान पापा नजर आ रहा हैं। जिसे राजा हरि सिंह ने कभी घास नहीं डाला उसे हमारे देश के बुद्धजीवी तत्व सब अमृत मान रहे हैं। लेखिका अरुंधती ने अपनी लेखनी के जरिये एक अलग ही शिगूफा रच दिया हैं। अरुंधति रॉय को वर्ष १९९७ के मैं बुकर पुरस्कार की विजेता हैं। अब उनको भारत की राज्य प्रणाली ही बुरी दिख रही हैं। माओवादियों की चिंता सताने के बाद अब जम्मू कश्मीर पर भी कलम फेर दिया हैं। जिन लोगों को सरकार ने जम्मू में दौरा करने के लिए भेजा हैं और जान रेपर्ट देने के लिए कहा हैं वही कह रहे हैं की जम्मू को पाकिस्तानी चश्में से देख रहे हैं। इस बंटवारे की वकालत करने वालों को एक बात बहुत बारीकी से समझना होगा दुनिया के जितने भी देस्शों का बंटवारा हुआ हैं सभी जनसंख्या या भू भाग के अधर पर हुआ हैं लेकिन इसे धर्म के नाम पर बाँट रहे हैं। और ये धर्म के नाम पर बांटने वाले सिर्फ अपना व्यक्तिगत उल्लू ही सीधा करेंगे। पाकिस्तान ने पाक अधिकृत कश्मीर में कितना विकास किया हैं और भारत के कश्मीर में कितना विकास हुआ हैं ये पहले देख लो। अलगाववादी क्यों पैदा हुए और किसने पैदा किया ? सरकार कश्मीर का इलाज ढूँढने के बजाय इसे लाइलाज छोड़ना चाहती हैं । देश के नेताओं ke दिमाग mein भरा हुआ hai की जब 63 साल से चल रहा hain तो आगे bhi चलता रहेगा। आज ज़रुरत हैं कश्मीर के हालत को ठीक अकरने के लिए। लेकिन सभी वहाँ जाकर नीरो बन कर काम कर रहे हैं। ज़रुरत हैं सही दिशा में काम करने की ।
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