Monday, March 19, 2012

बजट बनने का मकडजाल

वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने लोकसभा में बजट पेश कर दिया है। इस बार बजट पर मिली-जुली प्रतिक्रिया मिल रही है। पर क्या आप जानते हैं कि बजय कैसे तैयार किया जाता है। आइए जानते हैं-
केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियां तय करने का काम प्रधानमंत्री के नेतृत्व में सरकार का एक कोर ग्रुप करता है। इस कोर ग्रुप में प्रधानमंत्री के अलावा वित्त मंत्री और वित्त मंत्रालय के अधिकारी होते हैं। योजना आयोग के उपाध्यक्ष को भी इस ग्रुप में शामिल किया जाता है।
बजट पर वित्त मंत्रालय की नियमित बैठकों में वित्त सचिव, राजस्व सचिव, व्यय सचिव, बैंकिंग सचिव, संयुक्त सचिव (बजट) के अलावा केन्द्रीय सीमा एवं उत्पाद शुल्क बोर्ड के अध्यक्ष हिस्सा लेते हैं। वित्तमंत्री को बजट पर मिलने वाले योजनाओं और खर्चों के सुझाव वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग को भेज दिए जाते हैं जबकि टैक्स से जुड़े सारे सुझाव वित्त मंत्रालय की टैक्स रिसर्च यूनिट (टीआरयू) को भेजे जाते हैं।
इस यूनिट का प्रमुख एक संयुक्त सचिव स्तर का अधिकारी होता है. प्रस्तावों और सुझावों के अध्ययन के बाद यह यूनिट कोर ग्रुप को अपनी अनुशंसाएँ भेजती है।
पूरी बजट निर्माण प्रक्रिया के समन्वय का काम वित्त मंत्रालय का संयुक्त सचिव स्तर का एक अधिकारी करता है। बजट के निर्माण से लेकर बैठकों के समय तय करने और बजट की छपाई तक सारे कार्य इसी अधिकारी के ज़रिए होते हैं।
कैदखाने में तब्दील हो जाता है मंत्रालय
बजट पेश होने से दो दिन पहले वित्त मंत्रालय को पूरी तरह से सील कर दिया जाता है। बजट निर्माण की प्रक्रिया को इतना गोपनीय रखा जाता है कि संसद में पेश होने तक इसकी किसी को भनक भी न लगे।
वित्त मंत्रालय दो दिन पहले पूरी तरह सील कर दिया जाता है। इस गोपनीयता को सुनिश्चित करने के लिए वित्त मंत्रालय के नार्थ ब्लाक स्थित दफ्तर को बजट पेश होने के कुछ दिनों पहले से एक अघोषित 'क़ैदखाने' में तब्दील कर दिया जाता है।
बजट की छपाई से जुड़े कुछ कर्मचारियों को यहां पुलिस व सुरक्षा एजेंसियो के कड़े पहरे में दिन-रात रहना होता है.
बजट के दो दिन पहले तो नार्थ ब्लाक में वित्त मंत्रालय का हिस्सा तो पूरी तरह सील कर दिया जाता है। यह सब वित्त मंत्री के बजट भाषण के पूरा होने और वित्त विधेयक के रखे जाने के बाद ही समाप्त होता है।
बजट तैयारी के प्रमुख अंग इस प्रकार हैं -
1.वित्त मंत्री का बजट भाषण
संसद में वित्त मंत्री का बजट भाषण अगले वर्ष के लिए सरकार की प्रस्तावित नीतियों का एक विस्तृत ब्यौरा होता है। यह भाषण बजट का दिशा निर्देशक कहा जा सकता है।
2.बजट का सार
लगभग 15 पृष्ठों के इस दस्तावेज़ को केन्द्र सरकार की बैलेंस-शीट कह सकते हैं। इसमें केन्द्र सरकार की आय, प्राप्तियों और खर्च का अनुमान होता है। केन्द्र सरकार का धन कहाँ से आता है और कहाँ जाता है, इसकी रूपरेखा इसी दस्तावेज़ में होती है।
3.केंद्र सरकार की अनुदान माँगें
इस दस्तावेज़ में भारत सरकार की समेकित निधि के द्वारा सभी मंत्रालयों और विभागों के खर्च का ब्यौरा होता है। प्रत्येक मांग में ज़्यादातर एक सेवा के लिए आवश्यक धनराशि दिखाई जाती है। अर्थात इसमें राजस्व खाते का व्यय और उस सेवा के लिए पूंजी खाते का व्यय (ऋण सहित) दिखाए जाते हैं।
4.व्यय बजट
यह केन्द्र सरकार के बजट का व्याख्यात्मक ज्ञापन है। इसके तीन भाग होते हैं। पहला सामान्य भाग, दूसरा आयोजना भिन्न-व्यय और तीसरा आयोजना परिव्यय।
5. प्राप्ति बजट
इस दस्तावेज़ के दो मुख्य भाग होते हैं. राजस्व प्राप्तियां और पूंजी। भाग 'ख' में बाजार ऋण, विदेशी सहायता, अल्प बचतें, सरकारी भविष्य निधियां, विभिन्न जमा खातों की संवृद्धियां तथा रेलवे जैसे विभागों की प्रारक्षित निधियां शामिल हैं। इसी भाग में केन्द्रीय करों और शुल्कों में राज्यों के हिस्से का राज्यवार विवरण दिया जाता है।
6. वित्त विधेयक
बजट के ज़रिए किए जाने वाले वित्तीय बदलावों की संसद से वित्त विधेयक के ज़रिए मंजूरी ली जाती है। इस विधेयक के पारित होने के बाद ही बजट पास माना जाता है। वित्त विधेयक के दूसरे खंड में इसका विस्तृत व्याख्यात्मक विवरण होता है।
7. अन्य दस्तावेज़
बजट के साथ पेश किए जाने वाले अन्य दस्तावेज़ों में पिछले वर्ष के लिए केन्द्र सरकार के सालाना वित्तीय विवरण पर एक संक्षिप्त ज्ञापन पेश किया जाता है। इस विवरण में पिछले वर्ष के बजट अनुमानों और वास्तविक व्यय व प्राप्तियों का ब्यौरा होता है।

Tuesday, February 14, 2012

यूरोपीय संघ के नौ देशों की ऋण साख घटी

रेटिंग एजेंसी मूडीज ने इटली, स्पेन और पुर्तगाल की ऋण साख घटा दी है और फ्रास, ब्रिटेन तथा ऑस्ट्रिया को जोखिम पर रखा है।
मूडीज ने कहा कि ये सभी देश यूरो क्षेत्र के ऋण संकट से प्रभावित हो सकते हैं। मूडीज के इस कदम से यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या यूरोपीय नेता क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और वित्तीय क्षेत्र को उबारने के लिए समुचित प्रयास कर रहे हैं। इसके साथ ही मूडीज ने स्लोवेनिया, स्लोवाकिया और माल्टा की रेटिंग भी सोमवार को घटा दी।
रेटिंग एजेंसी ने इसके लिए क्षेत्र की कमजोर आर्थिक संभावनाओ को कारण बताया है। साथ ही कहा है कि क्षेत्र को उबारने के लिए घरेलू स्तर पर मितव्ययता कार्यक्रम और ढाचागत सुधारो को बढ़ाने की जरूरत है, तभी प्रतिस्पर्धा बढ़ सकेगी। मूडीज ने यूरोप द्वारा इस संकट से निपटने के लिए उचित संसाधनो को जुटाने के प्रयासो पर भी सवाल खड़ा किया है। ऑस्ट्रिया, फ्रास और ब्रिटेन की ट्रिपल ए रेटिंग को कायम रखा गया है, पर उसे नकारात्मक परिदृश्य दिया गया है। यह इस बात का संकेत है कि यदि स्थिति और खराब होती है, तो इन देशो की रेटिंग घट सकती है।
इटली की रेटिंग को ए3 से घटाकर ए2 किया गया है, स्पेन की रेटिंग ए3 से ए और पुर्तगाल की बीए3 से बीए2 की गई है। स्लोवाकिया और स्लावेनिया की रेटिंग को एक पायदान घटाकर ए2 किया गया है, वहीं माल्टा की रेटिंग को भी एक कदम खिसकाया गया है।
खास बात यह है कि मूडीज ने यह कदम उस समय उठाया है जब यूनान और यूरोप ने एक बड़ी बाधा पार की है। यूनानी संसद ने एथेंस और अन्य शहरो में दंगों के बावजूद कड़ा मितव्ययता पैकेज पर सहमति जताई है।

Wednesday, November 30, 2011

एसएंडपी ने प्रमुख अमेरिकी बैंकों की रेटिंग घटाई

प्रमुख वैश्विक रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर्स रेटिंग्स सर्विसेज ने कहा कि बैंकों के लिए नए रेटिंग मानदंड लागू करने की प्रक्रिया के एक हिस्से के तौर पर उसने प्रमुख अमेरिकी बैंकों की रेटिंग घटा दी है।रेटिंग एजेंसी ने कहा कि उसने दुनिया के 37 सबसे बड़े बैंकों की फिर से रेटिंग की है। इनमें बैंक ऑफ अमेरिका, सिटीग्रुप, गोल्डमैन सैक्स, वेल्स फार्गो, जेपीमोर्गन चेज और मोर्गन स्टेनले जैसे प्रमुख अमेरिकी बैंक शामिल हैं।एसएंडपी ने एक साल से अधिक समय तक अध्ययन और विश्लेषण करने के बाद पिछले सप्ताह संशोधित रेटिंग मानदंड जारी किए।रेटिंग एजेंसी ने बैंकों के लिए नए मानदंड में निवेश बैंकिंग के साथ जुड़े जोखिम, बैंकों के लिए वित्तीय व्यवस्था और बैंकिंग उद्योग में सरकार और केंद्रीय बैंकों की भूमिका जैसे तत्वों को शामिल किया है।रेटिंग एजेंसी ने बार्कलेज, एचएसबीसी, ल्योड्स और रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड जैसे प्रमुख ब्रिटिश बैंकों की भी रेटिंग घटाई है। लेकिन क्रेडिट सुईस और डॉयश बैंक की रेटिंग में बदलाव नहीं किया गया है।

Monday, May 2, 2011

कांग्रेस की घास कांग्रेस के कीड़े

आज़ाद भारत पर सबसे ज्यादा सालों तक शासन करने का श्रेय कांग्रेस के पास है । घोटालेबाज और महंगाईगीरी में एकाधिकार वर्चस्व स्थापित कर चुकी कांग्रेस के पास एक ऐसी घास है जो पिछले कई दशकों से देश की लक्ष्मी को तो चाट रही है साथ ही भारतीयों को अस्थमा और फोड़े फुंसियां जैसी बीमारियाँ भी बोनस में दे रही है।
दरअसल, आज़ादी के बाद जब देश में गेहूं की कमी हो गयी थी । तब तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने १९५० में अमेरिका से पी.एल - ४८० किस्म के गेहूं का आयात किया गया था । इस गेहूं के साथ अमेरिका ने एक घास भी भेज दिया था। इस घास का वैज्ञानिक नाम - पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस है। भारत में इसे गाजर घास के नाम से जाना जाता है। लेकिन सियासी मैदान में ये घास कांग्रेस घास के नाम से बहुचर्चित है। इस घास को सबसे पहले १९५६ में पुणे में देखा गया था।
कांग्रेस घास पिछले ५५ सालों में देश की करीब ३५० लाख हेक्टेयर भूमि पर फ़ैल चुकी है । इनमें से लगभग २० लाख हेक्टेयर जमीन खेती की है कारगिल से लेकर अंडमान निकोबार और दिल्ली तक इसने अपने पैर पसार लिए हैं।
फसल और इन्सान के लिए खतरनाक - कांग्रेस घास के पौधे की लम्बाई एक मीटर से डेढ़ मीटर तक होती है। एक पौधे में तकरीबन २५-३० हजार बीज पैदा होते हैं। और प्रकीर्णन के माध्यम से दूर - दूर तक पहुँच जाते हैं। जिसका इलाज वैज्ञानिक अभी तक नहीं ढूंढ पाए हैं। इसके कारण त्वचा काली पड़ जाती है। और उस पर फुन्सिया निकल आती हैं। इस घास के बीजों के संपर्क मेंआने से अस्थमा भी हो सकता है । जानवरों के लिए ये घास बेहद खतरनाक है। गाय और बकरी जैसे पशुओं की त्वचा में ये बुरा प्रभाव डालती हैं। दुधारू पशु जब इस घास को खाते हैं तो उनके दूध का स्वाद कसैला महसूस होता हैं। और लम्बे समय तक अगर ऐसे दूध का सेवन किया जाए तो मौत भी हो सकती है। कांग्रेस घास हर तरह की भूमि और जलवायु में उग सकती है। तकरीबन २५-३० डिग्री सेल्सियस तापमान पर इसका अंकुरण हो सकता है। इस घास का प्रसार अनाज उत्पादन में कमी के लिए भी जिम्मेदार है । यह एक ऐसी खरपतवार है जो फसलों और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है।
घास चरने की तैयारी - अब वैज्ञानिकों ने इसका नामो निशान मिटाने के लिए मक्सिको से जायागोग्रेम्मा बाइको लोराटा नाम के कीट के आयात का फैसला किया गया है। यह कीट कांग्रेस घास को चट कर जाता है। इसके ट्रायल के नतीजे अच्छे खासे रहे हैं। केमिकल्स की मदद से भी इसे ख़त्म करने की कोशिशें की जा रही हैं। लोगों को इस घास और इसके दुष्प्रभावों के बारे में बताया जा रहा है । इस कांग्रेस घास ने सरकारी खजाने को भी कायदे से साफ़ किया हैं। अब तक सरकारी खजाने से इस घास ने डेढ़ लाख करोड़ रुपये चाट चुकी है। जानकारों की मानें तो अभी इस घास से मुक्ति पाने के लिए भारी भरकम रकम खर्च करने की ज़रुरत है। जिसमें मजदूरों पर तकरीबन १६,८०० और रासायनों पर ११,900 करोड़ रुपये का मोटा खर्च होने की उम्मीद है।
अब महंगाई के इस सर्पदंश से खेल रहे देश के आम नागरिकों के साथ कांग्रेस की घास औरकांग्रेस के कीड़े क्या नया शिगूफा रचेंगे ये भी देखना दिलचस्प रहेगा।

Tuesday, January 25, 2011

लहराते तिरंगे का सफ़र

देश की आन बान शान लहराता तिरंगा झंडा ने आज 66 साल का सफ़र पूरा कर लिया हैं। देश में तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज का दर्जा 22 जुलाई 1947 को मिला। इससे पहले इसे "स्वराज फ्लैग " के नाम से जाना जाता था। और इसका उपयोग कांग्रेस पार्टी किया करती थी।
महात्मा गाँधी ने कांग्रेस के समक्ष पहली बार 1921 में ध्वज का प्रस्ताव रखा। इस ध्वज की डिजाइन कृषि वैज्ञानिक पिंगाली वेंकैया ने तैयार किया था। थोड़ा सा बदलाव करके इस ध्वज को "स्वराज फ्लैग " नाम से 1931 में कांग्रेस ने अपना आधिकारिक ध्वज घोषित कर दिया। स्वराज फ्लैग में तीन रंग केसरिया, सफ़ेद और हरा रंग था और बीच में चरखा बना हुआ था। जब आज़ादी का समय आया तो डॉ राजेंद्र प्रसाद कि अध्यक्षता में एक कमेटी बनायीं गयी। इस कमेटी ने 14 जुलाई 1947 को कांग्रेस पार्टी के स्वराज फ्लैग को राष्ट्रीय ध्वज बनाने का सुझाव दिया गया। और इसके बाद स्वराज फ्लैग से चरखा हटाकर "अशोक चक्र" अंकित किया गया और 22 जुलाई  1947 को राष्ट्रीय ध्वज का दर्जा दिया गया। राष्ट्रीय ध्वज के निर्धारण में इस बात का ख़याल रखा गया कि सभी पार्टियों और धार्मिक समुदायों को स्वीकार्य हो। पूर्व उप राष्ट्रपति ने सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने इसे परिभाषित किया - जिसमें केसरिया रंग त्याग और सहस, श्वेत रंग शांति और सत्य एवं हरा रंग विश्वास और हरियाली का प्रतीक हैं। इसके अलावा ध्वज के मध्य अशोक चक्र देश कि गतिशीलता व धर्म को दर्शाता हैं। राष्ट्र ध्वज का इस्तेमाल और प्रदर्शन फ्लैग कोड ऑफ इंडिया द्वारा संचालित होता हैं।
क़ानून के तहत अगर कोई व्यक्ति या संस्थान राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करता पाया जाता हैं तो उसे तीन साल की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं । सन 2009 के पहले किसी को भी स्वतंत्रता दिवस या फिर गणतन्त्र दिवस के अलावा अन्य अवसरों पर राष्ट्रीय ध्वज अपने घर या कार्यालय पर फहराने कि इजाज़त नहीं थी। लेकिन 26 जनवरी 2002 से सरकार ने फ्लैग कोड ऑफ इंडिया में संसोधन करके इसकी इजाज़त प्रदान की। इसी तरह राष्ट्रीय ध्वज को रात्रि में फहराने की इजाज़त नहीं थी । मगर 2009 में एक जनहित याचिका की सुनवाई पर सरकार ने विशेष शर्तों के साथ इसे फहराने की अनुमति दे दी।
तिरंगे का इतिहास - पहली बार तिरंगा झंडा 7 अगस्त 1906 में सचिन्द्र बोस ने बंगाल विभाजन के विरोध में बनाया था। इसे " कलकत्ता फ्लैग " का नाम दिया गया . इस ध्वज में केसरिया,पीला और हरा रंग उपयोग में लाया गया। और झंडे के बीच में हिंदी में वन्दे मातरम लिखा हुआ था।
--- इसके बाद होम रूल आन्दोलन के दौरान बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट ने 1917 में नया ध्वज बनाया । इस ध्वज पर पांच लाल और चार हरी तिरक्षी पट्टियाँ बनीं थी। सात तारों को भी इस पर अंकित किया गया था। यह ध्वज लोगों के बीच ज्यादा प्रसिद्द नहीं हुआ।
इस तरह से तिरंगे ने इतना लंबा सफ़र तय करने के बाद आज भी देश में तिरंगे की हालत बाद से बदतर हैं। प्लास्टिक के झंडे ज्यादा बाज़ार में आ गए हैं। ये नष्ट नहीं होते जिसकी वजह से लोगों के पैरों तले और नालियों में पड़े रहते हैं। अब तो तिरंगे में भी चीन घुस गया है... इन दिनों बाज़ार में सबसे ज्यादा चीनी तिरंगे बिक रहे हैं... धन्य है देश जो आन बान शान में भी चीन...   आज एक बार फिर सभी को देश के प्रति जागरूक होने की ज़रुरत हैं।

Tuesday, November 30, 2010

हमारे समाज का महारोग एड्स

एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशिएंसी सिंड्रोम अथवा एड्स पूरी दुनिया में तेजी से पाँव पसार रहा हैं। एचआईवी पाजटिव होने का मतलब आम तौर पर ज़िन्दगी का अंत मान लिया जाता हैं लेकिन यह अधूरा सच हैं और डाक्टरों के मुताबिक एच आई वी पॉजीटिव लोग भी सामान्य आदमी की तरह लम्बे समय तक जीवन जी सकते हैं। न्यूयॉर्क में एड्स की पहचान १९८१ में समलिंगी वयस्क पुरुषों में प्रतिरक्षण क्षमता में कमी एवं उच्च मृत्यु दर के लक्षणों के साथ की गयी। और इसका नाम एड्स रखा गया।
ए- मतलब एक्वायर्ड यानी यह रोग किसी दूसरे व्यक्ति से लगता है।
आई डी-- मतलब इम्यूनो डिफीशिएंसी यानी यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को खत्म कर देता हैं।
एस -मतलब सिंड्रोम यानी कई तरह के लक्षणों से पहचानी जाती हैं।
वास्तव में एड्स वर्तमान समाज में मानव सभ्यता की समझ सबसे बड़ी चुनौती बनकर खडा है। इस बीमारी का लाइलाज होना ही इससे भयाक्रांत होने का सबसे प्रमुख कारण हैं। पूरी दुनिया में अब तक तकरीबन ढाई करोड़ लोग एड्स के गाल में समा चुके हैं और करोड़ों लोग अभी इसके प्रभाव में हैं। एड्स रोगियों में अफ्रीका पहले नंबर में हैं जबकि भारत दूसरे नंबर में हैं। भारत में पहला एड्स मरीज मद्रास में पाया गया था। अमेरिका में ये रोग समलैंगिकता के कारण तेजी से फैला जबकि भारत में असुरक्षित यौन सम्बन्धों के कारण दिनों दिन अपने पैर जमा रहा हैं।
जुलाई २००५ में ब्राजील की राजधानी रियो-डी - जेनेरिया में १२५ देशों के लगभग ५०० विशेषज्ञों ने मिलकर एक सेमिनार का आयोजन किया था। और उसमें २६० शोध पत्र पेश किये गए थे। बीमारी से लड़ने हेतु तमाम सुझाव भी दिए गए थे। शोध के मुताबिक पूरी दुनिया में १४००० लोग हर दिन एड्स की चपेट में आते हैं। ९५ फ़ीसदी लोग मध्यम और कम आय वाले देशों के होते हैं । २००५ में ६.५ मिलियन एड्स से पीड़ित लोगों को उपचार की ज़रुरत थी लेकिन एक मिलियन का ही उपचार हो सका ।
भारत में एड्स के हालत -
यूनिसेफ,यूएन एड्स और विश्व स्वस्थ्य संगठन के ताजे सर्वेक्षण
माता से बच्चों में एचआईवी संक्रमण की रोक -
--- एचआईवी पॉजीटिव गर्भाधारित महिलाओं की संख्या - ६४,०००
-- एचआईवी पॉजीटिव के साथ उत्पन्न बच्चों की संख्या और प्रतिशत - १२,00 {२%}
-- १५ - २४ साल के लोगों में एचआईवी पुरुषों में - ०.३% और महिला ०.३%
-- १५-२४ साल के लोगों में जो पिछले एक वर्ष में एक से अधिक जीवन साथी के साथ लैंगिक सम्बन्ध बनाये उनका प्रतिशत पुरुष - १.६%, महिला ०.१%
-- एचआईवी से ग्रसित अनाथ बच्चों की संख्या २५,०००,०००

इस सच्चाई को जानने के बाद यही कहा जा सकता हैं की एड्स एक बड़ी बीमारी हैं - बेहद खतरनाक भी, लेकिन कोई समाज जितना बीमारियों से नहीं मरता उतना अपने रवैये से नष्ट होता हैं। एड्स का हम मुकाबला कर सकते हैं लेकिन उस डर, उस नासमझ का सामना कैसे करें जो अमानवीय ढंग से हमें अपने ही समाज के कुछ असहाय लोगों से काट डालती हैं । उन्हें अछूत बना डालती हैं। भारत सिर्फ एड्स का नहीं बल्कि कई बीमारियों का घर है। उन्नीसवीं सदी की बीमारियाँ इस इक्कीसवी सदी में पलट कर हमला कर रही हैं। हम प्लेग और पोलियो से भी लड़ रहे हैं। कैंसर एड्स की ही तरह रहस्यमय और जानलेवा बीमारी बना हुआ हैं। डायबिटीज को खामोश महामारी कहा जाता हैं। लेकिन और भी कई खामोश महामारियां से इस समाज को बीमार बनाने में लगी हैं। हमने एक चमकता हुआ भारत बनाया लेकिन इस भारत में कई हाँफते,कराहते,खांसते भारत भी शामिल हैं। वो बेदखल भारत शामिल हैं जो अपने घर परिवार से सैकड़ों मील दूर ज़िन्दगी और रोजगार की जद्दोजहद में रोज खुद को गला रहे हैं। छोटे-छोटे शहरों से देश के महानगरों तक ज़िन्दगी की तलाश में पहुंचे ये लोग अपने जिस्म में मौत के कीड़े लेकर लौटते हैं। और उनके घर वाले जान तक नहीं पाते कि आखिर उन्हें बीमारी है क्या ? ये वो एड्स हैं जो शरीर को नहीं बल्कि समाज को खा रहा हैं। फिर कहना होगा कि एड्स का इलाज सिर्फ एंटी रेट्रो वायरल थेरपी से नहीं हो सकता। इसके लिए पूरे समाज की धमानिया साफ़ करनी होगी उसका रक्त बदलना होगा। ये काम आसान नहीं है इसके बिना हम एड्स और कैंसर के इलाज खोज भी लें तो भी अपने समाज को नहीं बचा पायेंगे। क्यों कि हम इस लिए नहीं मर रहे हैं कि दवाएं नहीं हैं बल्कि इस लिए मर रहे हैं कि उनके पास दवाओं तक पहुंचने का साधन नहीं हैं ।

Wednesday, November 10, 2010

जय हिन्द बराक ओबामा

आखिर ऊँट पहाड़ के नीचे आ ही गया। यानी दुनिया का तानाशाह औकात पर आ गया। कल तक जो भारत की तरफ आँखें तरेरता था अब उसकी आँखों में पानी भर आया हैं। और आँखों में पानी भरने कि वजह भी साफ़ हैं । जब राजा के यहाँ बेरोजगारी मुह फैलाकर खड़ी होने लगी तो भारत कि तरफ आस जागी। और इसी आस के साथ इस व्यापारी ने भारत से कारोबार करके अब अमेरिकी बाज़ार को गुलजार करेगा। " जय हिन्द, बहुत धन्यवाद,नमस्ते" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके और लच्छीदार भाषण पिलाकर भारत से जो उसे चाहिए था वो ले लिया। और भारत भी उसके इस भाषण से लट्टू हो गया। और भारत को जिस तरह कि उम्मीद थी वो मिल गयी। ओबामा ने आज भारत को विश्व पटल में एक नया आयाम दिया हैं। और इसकी बानगी यही हैं कि भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थाई सदस्यता के लिए ओबामा ने वकालत भी कर दी। यानी सुरक्षा परिषदमें भारत कि दावेदारी पर मोहर लगा दी हैं। सुरक्षा परिषद के क्या दाँव पेंच हैं इसे समझने के लिए सबसे पहले सुरक्षा परिषद के बारे में जाना जरूरी होगा।
संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रमुख अंग
सयुंक्त राष्ट्र संघ के संविधान में इसके छह प्रमुख अंगों का वर्णन किया गया हैं ।
१ - महासभा
२ - सुरक्षा परिषद
३- आर्थिक व सामाजिक परिषद
४- न्याशी परिषद
५- अंतरर्राष्ट्रीय न्यायलय
६- सचिवालय

सुरक्षा परिषद
सुरक्षा परिषद विश्व शांति एवं सुरक्षा से सम्बन्धित संयुक्त राष्ट्र संघ के दायित्वों को पूरा करने वाला आदेशात्मक संस्था है। इसके १५ सदस्य हैं। जिनमें पांच स्थायी सदस्य हैं- अमेरिका, ब्रिटेन, साम्यवादी चीन, फ़्रांस और रूस । अस्थायी सदस्यों को सयुंक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा दो वर्षों के लिए चुना जाता है। अस्थायी सदस्यों में सामान्यतः पांच अफ्रीकी एशियाई देशों से, दो लैटिन अमेरिका, दो पश्चिमी यूरोप तथा एक पूर्वी यूरोप से चुने जाते हैं। अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षरों के क्रम से सभी देश एक-एक मास के लिए सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता करते हैं। सुरक्षा परिषद के अंतर्गत प्रक्रिया संबंधी सामान्य विषयों पर किन्ही ९ सदस्यों के समर्थन से कोई प्रस्ताव पारित किया जा सकता है। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा से सम्बंधित किसी विषय पर उन नौ सदस्यों में पांचो स्थायी सदस्यों का समर्थन हासिल होना आवश्यक हैं। यदि स्थायी सदस्यों में से किसी ने प्रस्ताव के खिलाफ समर्थन कर दिया तो प्रस्ताव पारित नहीं माना जाएगा। इस प्रकार स्थायी सदस्यों को वीटो शक्ति का निषेधाधिकार दिया गया हैं। जिसका प्रयोग करके वो किसी मुद्दे पर प्रस्ताव पारित करने या किसी कारवाई को रोक देते हैं।
अपने दायित्वों को पूरा करने के क्रम में सुरक्षा परिषद सर्वप्रथम शांतिपूर्ण उपायों से विवादों के समाधान का प्रयास करती हैं। जिनमें विचार विमर्श, मध्यस्थता आदि शामिल हैं। यह क्षेत्रीय संगठनों को भी विवादों के समाधान हेतु प्रोत्साहित करती है। शांतिपूर्ण उपायों द्वारा विवादों का समाधान न होने पर यह दोषी राष्ट्रों के विरुद्ध कूटनीतिक, आर्थिक व वित्तीय दंड निर्धारित करती है एवं अंतिम उपाय के रूप में सैनिक कारवाई का आदेश भी दे सकती है।
सुरक्षा परिषद में सुधार का प्रश्न - वर्तमान समय में विश्व की बदली हुई राजनैतिक एवं आर्थिक व्यवस्था के अनुरूप सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग लगातार की जा रही हैं। जिससे अफ्रीका, एशिया तथा लैटिन अमेरिकी देशों को उचित प्रतिनिधत्व प्राप्त हो सके । संयुक्त राष्ट्र के अस्तित्व में आने के छह दशकों के दौरान विश्व व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव आ गया है। दूसरे विश्व युद्ध के खलनायक देश जापान और जर्मनी की अर्थ व्यवस्था क्रमशः विश्व की दूसरी और तीसरी बड़ी अर्थ व्यवस्था बन चुकी है। दूसरी ओर भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, व मैक्सिको जैसे देश विश्व की तेजी से बढ़ती हुई अर्थ व्यवस्था वाले देश बनकर उभरे हैं । जहां तक भारत की सुरक्षा परिषद में दावेदारी का प्रश्न है अमेरिका व चीन को छोड़कर अन्य तीन स्थायी सदस्यों ने खुलकर समर्थन किया हैं ( अमेरिका ने अब समर्थन किया हैं ) । जबकि विश्व के अन्य प्रमुख देशों सहित विकासशील देशों ने ऐसी ही मंशा जतायी हैं। हालाँकि सुरक्षा परिषद में सुधार के स्वरूप को लेकर देशों के बीच मतभेद हैं कुछ का मानना है कि सुरक्षा परिषद के नए सदस्यों को वीटो पावर न दिया जाए। जबकि सदस्यता के इच्छुक भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका,जापान व जर्मनी इस शक्ति के बगैर सुरक्षा परिषद की सदस्यता को उचित नहीं मानते।
लेकिन अब अमेरिका ने भारत के दावेदारी को मजबूती प्रदान कर दी हैं। लिहाजा विरोध झेलना है केवल चीन का । इस लिहाज से स्थायी सदस्यता की राह खुलती नजर आ रही हैं। लेकिन अभी राह आसान नहीं हैं । केवल उम्मीद जाग गयी हैं । और उम्मीद पर तो पूरी दुनिया टिकी है। लेकिन जैसे ही ओबामा ने खुल कर समर्थन किया तो दावेदारी के अन्य सदस्यों की भौंहें तन गयी हैं । इस सीट के लिए प्रबल दावेदारों में शुमार किये जा रहे जापान और जर्मनी ने आरोप लगाया है कि उनकी अनदेखी की जा रही है। भारत के धुर विरोधी पाकिस्तान ने तो अमेरिकी राजदूत से मिलकर अपना विरोध औपचारिक रूप से भी दर्ज करा दिया हैं। जब कि तथ्य यही है कि अभी ये तो दूर की कौड़ी हैं। लेकिन अन्य देशों की नीद हराम हो गयी हैं।

ओबामा की नब्ज - ओबामा ने भारत को एक उभर चुका देश कहा हैं। यानी अब हम विकसित देश की कतार में शामिल हो गए। लेकिन ऐसा नहीं हैं। अमेरिका ने अभी स्थायी सदस्यता के लिए जापान का समर्थन किया है। जब कि जी - ४ का विरोध किया है । इस समूह में जापान, जर्मनी , भारत और ब्राजील शामिल हैं। इस तरह ओबामा ने भारत के दावे का समर्थन करके अपना रूख तो स्पष्ट कर दिया है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि जी- ४ मामले में अमेरिका भारत का समर्थन करेगा।
कौन किसके खिलाफ - सयुंक्त राष्ट्र की स्थायी सदस्यता चाहने वालों में आपस में ही एक दूसरे के विरोधी हैं । जैसे - जापान और भारत की दावेदारी के खिलाफ चीन हैं। ब्राजील को मैक्सिकोऔर अर्जेंटीन का विरोध झेलना पड़ रहा है। अफ्रीका में दक्षिण अफ्रीका सबसे प्रबल दावेदार हैं । लेकिन कुछ और देश अपनी दावेदारी पेश कर सकते हैं। इधर इसके स्थायी सदस्य ज्यादातर यूरोपीय देशों के हैं। और वो चाहते हैं कि विश्व के हर हिस्से के देशों को इसका प्रतिनिधत्व दिया जाए ।
इन सब तमाम पेंच को देखकर लगता हैं कि कहीं स्थायी सदस्यता खैनी पुलाव न साबित हो लेकिन ऐसा नहीं होगा। और ओबामा के जय हिन्द ने भारत को एक नयी ऊर्जा दी हैं और उसी सकारात्मक ऊर्जा के साथ भारत को अपने कदम आगे बढ़ाना होगा।