Tuesday, September 24, 2013

महीनों के नाम कैसे पड़े ?

महीने के नामों को तो हम सभी जानते हैं, लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि महीनों के यह नाम कैसे पड़े एवं किसने इनका नामकरण किया। नहीं न! तो जानिए.....

जनवरी : रोमन देवता 'जेनस' के नाम पर वर्ष के पहले महीने जनवरी का नामकरण हुआ। मान्यता है कि जेनस के दो चेहरे हैं। एक से वह आगे तथा दूसरे से पीछे देखता है। इसी तरह जनवरी के भी दो चेहरे हैं। एक से वह बीते हुए वर्ष को देखता है तथा दूसरे से अगले वर्ष को। जेनस को लैटिन में जैनअरिस कहा गया। जेनस जो बाद में जेनुअरी बना जो हिन्दी में जनवरी हो गया।

फरवरी : इस महीने का संबंध लेटिन के फैबरा से है। इसका अर्थ है 'शुद्धि की दावत।' पहले इसी माह में 15 तारीख को लोग शुद्धि की दावत दिया करते थे। कुछ लोग फरवरी नाम का संबंध रोम की एक देवी फेबरुएरिया से भी मानते हैं। जो संतानोत्पत्ति की देवी मानी गई है इसलिए महिलाएं इस महीने इस देवी की पूजा करती थीं ताकि वे प्रसन्न होकर उन्हें संतान होने का आशीर्वाद दें।

मार्च : रोमन देवता 'मार्स' के नाम पर मार्च महीने का नामकरण हुआ। रोमन वर्ष का प्रारंभ इसी महीने से होता था। मार्स मार्टिअस का अपभ्रंश है जो आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। सर्दियां समाप्त होने पर लोग शत्रु देश पर आक्रमण करते थे इसलिए इस महीने को मार्च नाम से पुकारा गया।

अप्रैल : इस महीने की उत्पत्ति लैटिन शब्द 'एस्पेरायर' से हुई। इसका अर्थ है खुलना। रोम में इसी माह कलियां खिलकर फूल बनती थीं अर्थात बसंत का आगमन होता था इसलिए प्रारंभ में इस माह का नाम एप्रिलिस रखा गया। इसके पश्चात वर्ष के केवल दस माह होने के कारण यह बसंत से काफी दूर होता चला गया। वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के सही भ्रमण की जानकारी से दुनिया को अवगत कराया तब वर्ष में दो महीने और जोड़कर एप्रिलिस का नाम पुनः सार्थक किया गया।

मई : रोमन देवता मरकरी की माता 'मइया' के नाम पर मई नामकरण हुआ। मई का तात्पर्य 'बड़े-बुजुर्ग रईस' हैं। मई नाम की उत्पत्ति लैटिन के मेजोरेस से भी मानी जाती है।

जून : इस महीने लोग शादी करके घर बसाते थे। इसलिए परिवार के लिए उपयोग होने वाले लैटिन शब्द जेन्स के आधार पर जून का नामकरण हुआ। एक अन्य मतानुसार जिस प्रकार हमारे यहां इंद्र को देवताओं का स्वामी माना गया है उसी प्रकार रोम में भी सबसे बड़े देवता जीयस हैं एवं उनकी पत्नी का नाम है जूनो। इसी देवी के नाम पर जून का नामकरण हुआ।

जुलाई : राजा जूलियस सीजर का जन्म एवं मृत्यु दोनों जुलाई में हुई। इसलिए इस महीने का नाम जुलाई कर दिया गया।

अगस्त : जूलियस सीजर के भतीजे आगस्टस सीजर ने अपने नाम को अमर बनाने के लिए सेक्सटिलिस का नाम बदलकर अगस्टस कर दिया जो बाद में केवल अगस्त रह गया।

सितंबर : रोम में सितंबर सैप्टेंबर कहा जाता था। सेप्टैंबर में सेप्टै लेटिन शब्द है जिसका अर्थ है सात एवं बर का अर्थ है वां यानी सेप्टैंबर का अर्थ सातवां किन्तु बाद में यह नौवां महीना बन गया।

अक्टूबर : इसे लैटिन 'आक्ट' (आठ) के आधार पर अक्टूबर या आठवां कहते थे किंतु दसवां महीना होने पर भी इसका नाम अक्टूबर ही चलता रहा।

नवंबर : नवंबर को लैटिन में पहले 'नोवेम्बर' यानी नौवां कहा गया। ग्यारहवां महीना बनने पर भी इसका नाम नहीं बदला एवं इसे नोवेम्बर से नवंबर कहा जाने लगा।


दिसंबर : इसी प्रकार लैटिन डेसेम के आधार पर दिसंबर महीने को डेसेंबर कहा गया। वर्ष का 12वां महीना बनने पर भी इसका नाम नहीं बदला।

Monday, September 23, 2013

पांच प्रकार की गृहणियां - बुद्ध

घर की लक्ष्मी कौन?

एक बार गौतम बुद्ध अनाथपिंडक सेठ के घर पधारे। वे बातचीत कर ही रहे थे कि अंतःपुर में कलह होने की आवाज सुनाई दी। तथागत के उस संबंध में पूछने पर सेठ ने बताया कि वे अपनी बहू सुजाता के कारण बड़े परेशान हैं। वह बड़ी अभिमानिनी है, पति का अनादर करती है और हमारी अवज्ञा। इसी कारण घर में हमेशा कलह रहता है।

तथागत ने सेठ से बहू को भेजने को कहा। उसके आने पर उन्होंने उससे प्रश्न किया- 'बताओ भला, तुम वधिकसमा, चोरसमा, आर्यसमा, मातृसमा तथा भगिनीसमा इन पांच प्रकार की गृहिणियों में से कौन हो?'

सुजाता बोली- 'मैं इनका तात्पर्य समझी नहीं। कृपया स्पष्ट करें।'

तब तथागत बोले-

* 'जो गृहिणी हमेशा क्रोध करती रहती है, जिसका पति पर बिलकुल प्रेम नहीं होता, जो उसका अपमान करती है और परपुरुष पर मुग्ध होती है, वह ठीक एक हत्यारिणी के समान ती है और इसीलिए ऐसी स्त्रियों को 'वधिकसमा' कहा जाता है।

* जो अपने पति की संपत्ति का सदुपयोग नहीं करती, वरन्‌ उसे चुराकर अपने उपभोग में लाती है वह 'चोरसमा' होती है।

* जो आलसी होती है बिलकुल काम नहीं करती, कर्कशा होती है तथा पति के सामने अपना बड़प्पन दिखाती है, वह 'आर्यसमा' होती है।

* जो हमेशा अपने पति का चिंतन करती है, अपने प्राणों से भी अधिक उसकी रक्षा करती है, वह 'मातृसमा' होती है।

* जो बहन के समान पति पर स्नेह करती है तथा लज्जापूर्वक उसका अनुगमन करती है, वह 'भगिनीसमा' होती है। तब बताओ भला, तुम इनमें से कौन हो?'

यह सुनते वह तथागत के चरणों में गिर पड़ी और बोली- 'भगवन्‌ ! मुझे क्षमा करें। इनमें से मैं कौन हूं, यह बताने में मेरी वाणी असमर्थ है, किंतु आपको विश्वास दिलाती हूं कि आज से मैं अपने पति और बड़ों का आदर करूंगी तथा उनका जी नहीं दुखाऊंगी। आज से मैं अपने को घर की दासी मानकर ही जीवनयापन करूंगी।'

Friday, September 13, 2013

हिंदी दिवस

‘हिंदी दिवस’ प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को मनाया जाता है। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि ‘हिन्दी’ ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर सन् 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है।

हिंदी भाषा को देवनागरी लिपि में सन 1950 में अनुच्छेद 343 के अंतर्गत राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया।

हिंदी भाषा प्रेम, मिलन और सौहार्द की भाषा है,इस भाषा की उत्पत्ति ही इस बात का प्रमाण है। हिंदी मुख्यतः आर्यों और पारसियों की देन है। हिंदी के अधिकतम शब्द संस्कृत,अरबी और फारसी भाषा से लिए गये है और यह भाषा अवधी,ब्रज आदि स्थानीय भाषाओँ का परिवर्धन भी है। इसीलिए तो इस भाषा को ‘सम्बन्ध भाषा’ के नाम से भी जाना जाता है। हिंदी (खड़ी बोली) की पहली कविता प्रख्यात कवि ‘अमीर खुसरों’ ने लिखी थी।

स्वतंत्रता संग्राम के समय तो हिंदी का प्रयोग अपने चरम पर था। भारतेंदु हरिश्चंद्र, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, हरिशंकर परसाई, महादेवी वर्मा, हरिवंश राय बच्चन,सुभद्रा कुमारी चौहान जैसे लेखकों और कवियों ने अपने शब्दों से जन मानस के ह्रदय में स्वतंत्रता की अलख जलाकर इस संग्राम में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। महात्मा गांधीजी के स्वदेशी आन्दोलन में तो अंग्रेजी भाषा का पूर्ण रूप से त्याग कर हिंदी भाषा को अपनाया गया।

हिंदी  भाषा का स्वरुप ही अलग है, यह भाषा अत्यंत मीठी और खुले प्रकृति की भाषा है। हिंदी अपने अन्दर हर भाषा को अन्तर्निहित कर लेती है और अपने इसी गुण के कारण ही वर्तमान में विश्व की चौथी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है। यह भाषा केवल एक देश तक सीमित नही है, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन, दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया, सिंगापुर जैसे कई देशों तक इसका विस्तार है। हिंदी का सरल स्वाभाव इसकी लोकप्रियता को बढ़ा रहा है।  कुछ बाधाएं आयी है इसके मार्ग में,पर हमें पूर्ण विश्वास है कि हिंदी हमारे दिल में यूं ही समाकर हमारी भावनाओं को जन-जन तक पहुंचती रहेगी और राष्ट्रभाषा के रूप में हमे गौरान्वित करती रहेगी।

संस्कृत और हिंदी देश के दो भाषा रूपी स्तंभ हैं जो देश की संस्कृति, परंपरा और सभ्यता को विश्व के मंच पर बखूबी प्रस्तुत करते हैं। आज विश्व के कोने-कोने से विद्यार्थी हमारी भाषा और संस्कृति को जानने के लिए हमारे देश का रुख कर रहे हैं।

हिंदी भाषा को हम राष्ट्र भाषा के रूप में पहचानते हैं। हिंदी भाषा विश्व में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली तीसरी भाषा है।

देश के गुलामी के दिनों में यहाँ अँग्रेज़ी शासनकाल होने की वजह से, अंग्रेजी का प्रचलन बढ़ गया था। लेकिन स्वतंत्रता के पश्चात देश के कई हिस्सों को एकजुट करने के लिए एक ऐसी भाषा की जरुरत थी जो सर्वाधिक बोली जाती है, जिसे सीखना और समझना दोनों ही आसान हों।

इसके साथ ही एक ऐसी भाषा की तलाश थी जो सरकारी कार्यों, धार्मिक क्रियाओं और राजनीतिक कामों में आसानी से प्रयोग में लाई जा सके। हिंदी भाषा ही तब एक ऐसी भाषा थी जो सबसे ज्‍यादा लोकप्रिय थी।

धीरे-धीरे हिंदी भाषा का प्रचलन बढ़ा और इस भाषा ने राष्ट्रभाषा का रूप ले लिया। अब हमारी राष्ट्रभाषा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बहुत पसंद की जाती है। इसका एक कारण यह है कि हमारी भाषा हमारे देश की संस्कृति और संस्कारों का प्रतिबिंब है।

हिंदी भाषा से जुड़े कुछ रोचक तथ्य :

- आपको यह जानकर भी आश्चर्य होगा कि हिंदी भाषा के इतिहास पर पहले साहित्य की रचना भी ग्रासिन द तैसी, एक फ्रांसीसी लेखक ने की थी।

- हिंदी और दूसरी भाषाओं पर पहला विस्तृत सर्वेक्षण सर जॉर्ज अब्राहम ग्रीयर्सन (जो कि एक अंग्रेज हैं) ने किया।

- हिंदी भाषा पर पहला शोध कार्य ‘द थिओलॉजी ऑफ तुलसीदास’ को लंदन  विश्वविद्यालय में पहली बार एक अंग्रेज विद्वान जे.आर.कार्पेंटर ने प्रस्तुत किया था।

Wednesday, September 11, 2013

विवेकानंद का ऐतिहासिक भाषण

स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका के शिकागो में 11 सितंबर, 1893 को आयोजित विश्व धर्म संसद में जो भाषण दिया था उसकी प्रतिध्वनि युगों-युगों तक सुनाई देती रहेगी। आज स्वामीजी के भाषण को 120 साल पूरे हो रहे हैं। शिकागो में दिए भाषण के मुख्य अंश

मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों!

आपने जिस सौहार्द और स्नेह के साथ हम लोगों का स्वागत किया है उसके प्रति आभार प्रकट करने के निमित्त खड़े होते समय मेरा हृदय अवर्णनीय हर्ष से पूर्ण हो रहा है। संसार में संन्यासियों की सबसे प्राचीन परंपरा की ओर से मैं आपको धन्यवाद देता हूं। धर्मों की माता की ओर से धन्यवाद देता हूं और सभी संप्रदायों एवं मतों के कोटि-कोटि हिन्दुओं की ओर से भी धन्यवाद देता हूं।
मैं इस मंच पर से बोलने वाले उन कतिपय वक्ताओं के प्रति भी धन्यवाद ज्ञापित करता हूं जिन्होंने आपको यह बतलाया है कि सुदूर देशों के ये लोग सहिष्णुता का भाव विविध देशों में प्रचारित करने के गौरव का दावा कर सकते हैं।
मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूं जिसने संसार को सहिष्णुता तथा सार्वभौम स्वीकृत दोनों की ही शिक्षा दी है। हम लोग सब धर्मों के प्रति केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरन समस्त धर्मों को सच्चा मानकर स्वीकार करते हैं।
मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। 
मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता है कि हमने अपने वक्ष में उन यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था जिन्होंने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी जिस वर्ष उनका पवित्र मंदिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था।
ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व का अनुभव करता हूं जिसने महान जरथुष्ट्र जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह अब तक कर रहा है।
भाइयों, मैं आप लोगों को एक स्तोत्र की कुछ पंक्तियां सुनाता हूं जिसकी आवृत्ति मैं बचपन से कर रहा हूं और जिसकी आवृत्ति प्रतिदिन लाखों मनुष्य किया करते हैं :
।।रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम। नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।।
अर्थात् जैसे विभिन्न नदियां भिन्न-भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न-भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े अथवा सीधे रास्ते से जाने वाले लोग अंत में तुझमें ही आकर मिल जाते हैं।
यह सभा, जो अभी तक आयोजित सर्वश्रेष्ठ पवित्र सम्मेलनों में से एक है स्वत: ही गीता के इस अद्भुत उपदेश का प्रतिपादन एवं जगत के प्रति उसकी घोषणा करती है :
।।ये यथा मा प्रपद्यंते तांस्तथैव भजाम्यहम। मम वत्मार्नुर्वतते मनुष्या: पार्थ सर्वश:।।
अर्थात् जो कोई मेरी ओर आता है- चाहे किसी प्रकार से हो, मैं उसको प्राप्त होता हूं। लोग भिन्न मार्ग द्वारा प्रयत्न करते हुए अंत में मेरी ही ओर आते हैं।
सांप्रदायिकता, हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मांधता इस सुंदर पृथ्वी पर बहुत समय तक राज्य कर चुकी हैं। वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही हैं व उसको बारंबार मानवता के रक्त से नहलाती रही हैं, सभ्यताओं को ध्वस्त करती हुई पूरे के पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं।
यदि ये वीभत्स दानवी शक्तियां न होतीं तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता। पर अब उनका समय आ गया है और मैं आंतरिक रूप से आशा करता हूं कि आज सुबह इस सभा के सम्मान में जो घंटाध्वनि हुई है वह समस्त धर्मांधता का, तलवार या लेखनी के द्वारा होने वाले सभी उत्पीड़नों का तथा एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होने वाले मानवों की पारस्परिक कटुता का मृत्यु निनाद सिद्ध हो।

Wednesday, September 4, 2013

आधुनिक कचरा यानी ई-वेस्ट

आधुनिक कचरा

सोफे पर बैठे-बैठे हम खबरों की दुनिया से निकलकर फिल्मी दुनिया में घूमने लगते हैं। रिमोट के बटन के आसरे चैनल बदलने का सिलसिला शुरू हो जाता है। कंप्यूटर पर उंगलियों के आसरे हम दुनियाभर में होने वाली गतिविधियों को महसूस कर सकते हैं। दो दशक पहले तक जिंदगी इतनी आसान नही थी। लेकिन अब वक्त बदल गया है क्योंकि अब हमारे पास इलेक्ट्रॉनिक साधनों की भरमार है। जहाँ इनइलेक्ट्रॉनिक साधनों के आसरे लोगों की जिंदगी कठिनाईयों और लेटलतीफी से बाहर निकली, वहीं इनके बढ़ते इस्तेमाल ने लोगों के लिए एक बहुत बड़ा ख़तरा भी पैदा कर दिया। और ये खतरा है ई-वेस्ट
आखिर क्या है ये ई-वेस्ट, क्यों आज इस विषय पर चर्चा हो रही है और क्या जरूरत पड़ी सरकार को ई-कचरा (प्रबंधन एवं संचालन) अधिनियम 2011 को लागू करने की।
इलेक्ट्रॉनिक साधनों के बिना जिंदगी गुजारना किसी भयावह सपने से कम नही है। बिना कंप्यूटर के ऑफिसो में काम नामुमकिन होता जा रहा है, घरों में बच्चे वीडियोगेम खेलने के लिए कंप्यूटरों का इस्तेमाल करने लगे हैं, स्कूली पाठ्यक्रमों में कम्प्यूटर जरूरी हो गया है। तेजी से बढ़ते कंप्यूटरमेनिया  से ई-वेस्ट में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। जहाँ पहले एक कंप्यूटर की उम्र 7 से 8 साल हुआ करती थी वहीं वो घटकर 3से 4 साल हो गई है। देश में अभी करीब 8 करोड़ कंप्यूटर हैं और आप जानकर चौंक जाएंगे कि अगले पाँच साल में इसकी संख्या बढ़कर दोगुनी से भी ज्यादा हो जाएगी। लोगों के घरों में मनोरंजन के साधन टेलीविजन की आबादी भी 2015 तक बढ़कर 24 करोड़ के आसपास पहुँच जाएगी। वहीं बात की जाए मोबाइल्स की तो भारत में इसके यूजर भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारत में लगभग 70 करोड़ मोबाइल इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ई-वेस्ट का प्रबंधन करने वाली कंपनियों का मानना है  कि किसी मोबाइल फोन को 98 फीसदी तक रिसाइकिल किया जा सकता है, उसी तरह कंप्यूटर की रिसाइकिलिंग भी कई तरह के नए उत्पादों को जन्म दे सकती है। मेमोरी डिवाइस, एमपी3 प्लेयर और आईपॉड, ई-वेस्ट में निश्चित तौर पर इज़ाफा करते हैं।
ई-वेस्ट के बढ़ते इस्तेमाल ने बाजार को एक नया कारोबार खोलने के लिए भी प्रेरित किया है। इलैक्ट्रोनिक साधनों के बढ़ते इस्तेमाल और उसके बाद उससे  होने वाले खतरों को देखते हुए विशेषज्ञों ने वेस्ट मैनेजमेंट का रास्ता सबके सामने रखा। इलैक्ट्रोनिक कचरे को फिर से इस्तेमाल करने का तरीका है वेस्ट मैनेजमेंट। इसमें कचरे को नष्ट करने की बजाए उसे रिसाइकिल किया जाता है। इलैक्ट्रोनिक कचरा पैदा करने के मामले में अव्वल देश होने के नाते ये जरूरी होता है कि भारत सरकार इसे लेकर कुछ प्रयास करे। इसी कड़ी में मंगलवार को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की अधिसूचना प्रभावी हो गई। मंगलवार से प्रभावी हुए ई-कचरा (प्रबंधन एवं संचालन)अधिनियम 2011 के प्रावधान के मुताबिक जो कंपनियां इलेक्ट्रोनिक उत्पाद बनाती हैं उसे सही ढंग से रिसाइकल करने की जिम्मेदारी उन्हीं की होगी। इसके लिए कंपनियों को जगह- जगह कुछ ऐसे सेंटर खोलने होंगे जहाँ इन उत्पादों की कलेक्शन हो सके। इतना ही नही इन रिसाइकल केंद्रों के प्रति लोगो को जागरूक करने का काम भी निर्माता कंपनियों को ही करना होगा। अहम बात ये है कि यह कानून एक साल पहले ही बन गया था लेकिन कंपनियों ने अब तक रिसाइकिलिंग सेंटर्स के बारे में जागरूकता संबंधी कार्यक्रम चलाए हों ऐसा प्रतीत नही होता। दिलचस्प बात तो ये है कि कंपनियाँ अभी तक ये भी सुनिश्चित नही कर पाई है कि जो लोग ई-कचरा कंपनियों को लौटाएंगे उसके एवज उन्हें कितनी कीमत दी जाएगी। कंपनियाँ इस सामान को मुफ्त में लेना चाहती हैं लेकिन गौरतलब है कि जब कबाड़ी भी हमसे ई-कचरा ले जाता है तो वो भी उसकी कुछ कीमत अदा करता है तो बड़ा सवाल ये है कि कंपनियाँ इससे क्यों इंकार कर रही हैं
हालांकि इस मामले में कंपनियां कहती हैं कि उन्हें ई-वेस्ट को रिसाइकिल करने में खर्चा करना पड़ेगा। अगर सरकारी पक्ष पर ध्यान दें तो पाएंगे कि सरकार  भी इस मामले में लोगों को जागरूक करने में विफल ही रही है। लोग अभी भी ई-कचरे के निपटान को लेकर जागरूक नही है। एक अनुमान के मुताबिक करीब 3.5 लाख टन ई-कचरा सालान दिल्ली में इकट्ठा होता है और उस कचरे का अवैज्ञानिक ढंग से निपटारा किया जा रहा है।  दरअसल कचरे के अवैज्ञानिक ढंग से निपटान करने की वजह से पर्यावरण और लोगों को काफी नुकसान हो रहा है। गौर करने की बात ये है ई-कचरे के अवैज्ञानिक तरीके से निपटारा होने के एवज में पर्यावरण एवं संरक्षण अधिनियम के तहत कार्रवाई तक का प्रावधान है। दोषी पाए जाने पर 5 साल तक की सज़ा और 1 लाख रूपये के जुर्माने तक का प्रावधान है। लेकिन दुर्भाग्य है कि ई-कचरे के निपटारा एक गोरखधंधा बन गया है और कई जिंदगियों को नाश करने पर तुला हुआ है।
जनसंख्या का लगातार बढ़ना और  आर्थिक विकास की राह पर दौड़ते भारत के सामने इस कचरे का अंबार लगातार बढ़ता जा रहा है। कार्बनिक उत्पाद, गंदगी और धूल लगभग 80 फीसदी कचरे को पैदा करते है। बढ़ती जनसंख्या की वजह से इस कचरे को पैदा होने से रोका तो नही जा सकता लेकिन इसका मैनेजमेंट करके इसका सही इस्तेमाल जरूर किया जा सकता है। एक्सर्ट्स के अनुसार तीन तरीकों से इलैक्ट्रोनिक कचरे को मैनेज किया जा सकता है। पहला तरीका है जमीन में गड्ढा खोदकर कचरा गाडना, दूसरा है कचरे को इकट्ठा करके उसे जलाना और तीसरा और सबसे कारगर तरीका है कचरे को रिसाइकिल करके फिर से इस्तेमाल करना। विशेषज्ञ इस तरीके को सबसे कारगर समझते हैं।  देश में सन् 2000 से पहले कचरे को रिसाइकिल करने की नीति नही थी। लेकिन उसी साल सरकार ने इस पर सोचना शुरू किया।
वेस्ट मैनेजमेंट की नीतियाँ समाज के हर तबके के हिसाब से अलग-अलग बनाई गई। ये नीतियाँ विकसित और विकासशील देशों के लिए अलग है और शहरी और ग्रामीण इलाकों के लिए अलग। औद्योगिक क्षेत्रों के लिए भी अलग से नीतियाँ बनाई गई, इन नीतियों पर कुछ देशों में तो काम हो रहा है लेकिन भारत में  इस ओर न के बराबर ध्यान दिया जा रहा है। ऑस्ट्रेलिया में कचरा इकट्ठा करने के लिए म्युनिसिपैलिटी हर एक मकान मालिक को तीन तरह के डस्टबिन देती है, जिनमें रिसाइकिल होने वाला कचरा, साधारण कचरा और बगीचे का कचरा अलग-अलग डाला जाता है। वहीं कनाडा में सारे शहर का कूड़ा इकट्ठा कर उसे रिसाइकिल किया जाता है। कनाडा में गाँवों में ट्रांसफर स्टेशन बनाकर कचरा रिसाइकिल केंद्रों को भेजा जाता है।  दरअसल भारत में इस तरह के प्रयोगों की तरफ ज्यादा ध्यान नही दिया जाता। कुछ एनजीओ भी इस विषय पर काम कर रहे हैं लेकिन भारत में इस प्रयास को जागरूकता के अभाव में वो कामयाबी नही मिल पा रही जो विदेशों में मिल रही है.। ई-वेस्ट मैनेजमेंट को कारोबार के तौर पर भी कई कंपनियाँ अपना रही है और देश में जिस तरह से इलैक्ट्रोनिक साधनों का प्रयोग बढ़ रहा है  उससे इन कंपनियों के सुनहरे भविष्य को लेकर कोई आशंका नज़र नही आती।
चिंता कि बात तो ये है कि इलैक्ट्रोनिक कचरे ने लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी बड़ा खतरा पैदा कर दिया है। इलैक्ट्रोनिक कचरा कई तरह की बीमारियों को पैदा करता है, जिनमें सांस से संबंधित बीमारियों के अलावा,स्किन से संबंधित बीमारियाँ, हैपेटाइटिस-बी शामिल है। आपको जानकर हैरानी होगी कि ई-वेस्ट कैंसर तक का खतरा पैदा करने का माद्दा रखता है। इसके अलावा कई तरह की संक्रमित बीमारियों को जन्म देता है ई-वेस्ट। ई-वेस्ट के खतरे को रोकने के लिए कई तरह के प्रोग्राम भी चलाए जा रहे हैं जिनमें स्वास्थ्य कर्मियों, कार्यकर्ताओं और गैरसरकारी संगठनों को शिक्षित किया जा रहा है। इस समस्या का सामना करने के लिए इग्नू ने वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाईजेशन के साथ हाथ मिलाकर कई तरह के कार्यक्रमों की शुरूआत भी की है। हालांकि जैसे-जैसे लोगों में जागरूकता आएगी इस ओर सुधार आएगा, लेकिन ये भी सच्चाई है कि जागरूकता का स्तर जिस गति से बढ़ेगा उस गति से इलैक्ट्रोनिक साधनों के प्रयोग में भी इज़ाफा होगा और ये निश्चित तौर पर गंभीर समस्या को ही जन्म देगा।
ई-वेस्ट के तौर पर ज्यादा चर्चा हमारे देश में नही होती बल्कि भारत ई-वेस्ट उत्पादन के मामले में अव्वल देशों में गिना जाता है। दुनियाभर में 80 प्रतिशत ई-वेस्ट चीन,पाकिस्तान और भारत में पैदा होता है और दुर्भाग्य है कि ई-वेस्ट को मैनेज करने के बारे में सबसे कम जागरूकता इन्हीं देशों मे देखने को मिलती है। ई-वेस्ट निश्चित तौर पर कई बीमारियों को तो जन्म देता ही है उसके साथ पर्यावरण के लिए भी भयानक खतरा पैदा करता है और ये खतरा भारतीयों की बढ़ती तादात के बाद और भी भयानक रूप में सामने आने की कगार पर है। किसी वस्तु को कई बार इस्तेमाल करना भारतीय मानसिकता का पॉजिटिव पहलू है। भारतीय घरों में इलैक्ट्रोनिक साधनों की चिपों में से तांबा और मेटल निकालने का काम जोरों पर होता है और यही मेटल और तांबा मल्टीनेशनल कंपनियों में दोबारा इस्तेमाल के लिए पहुँचता है। दरअसल रिसाइकिलिंग का काम भारत में निचले स्तर पर तो हो रहा है लेकिन इसे ऑर्गेनाइज्ड तौर से करना उतना ही जरूरी है जितना अस्पतालों में दवाइयों का वितरण और बात अस्पताल की आ ही गई है तो हम आपको बता दें कि अस्पतालों से भी बहुत बड़ी मात्रा में ई-कचरा पैदा होता है। मल्टीनेशनल कंपनियाँ अपने फायदे के लिए भारत के गरीब क्षेत्रों में छोटे स्तर पर इलैक्ट्रोनिक पार्टस की रिसाइकिलिंग करवा रही है जिससे लोगों के स्वास्थ्य को भयंकर खतरा है।

दुर्भाग्य है कि इन गैरसंगठित मजदूरों के लिए सरकार के पास किसी भी तरह का कोई ब्लू प्रिंट नही है।  दिल्ली का सीलमपुर ,मुंडका और नेहरू प्लेस, सैकेंड हैंड इलैक्ट्रोनिक पार्टस के एक बहुत बड़े बाजार के रूप में उभर रहे हैं। उसी तरह मुंबई का धारावी इलाका भी गैरसंगठित मजदूरों की फैक्ट्री बन गया है, जहाँ मल्टीनेशनल कंपनियों के सैकड़ों एजेंट अपने ही लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। कोड़ी के भाव के खराब हो चुके पार्टस रिसाइकिल होने के बाद हजारों की कीमत का भाव रखते हैं। नदियों की अविरल बहती धारा में बड़े पैमाने पर इन पार्टस का गंदा पानी जहर के रूप में घोला रहा है। सरकार से सवाल है कि क्या ये जनता के अधिकारों का हनन नही है? उनके स्वास्थ्य से खिलवाड़ का हक आखिर इस धंधे में लगे लोगों को किसने दिया? ई-कचरे को जमीन में दबाना या जलाना एक वैकल्पिक उपाय तो हो सकता है लेकिन उस कचरे की रिसाइकिलिंग निश्चित तौर पर एक बेहतर उपाय होगी, लेकिन इसके लिए जरूरत है एक राष्ट्रीय सोच की और सबसे अधिक जागरूकता की। सरकार की पहल, इंतजार ही बढाएगी इसलिए जागरूकता का प्रसार अपने स्तर पर शुरू हो जाना चाहिए। ई-वेस्ट बहुत बड़ा खतरा है, जब तक उसे मैनेज न किया जाए। मैनेज करने के बाद वो निश्चित तौर पर किफायती ही साबित होगा।

Monday, September 2, 2013

'नमस्कार' क्यों जरूरी और नमस्कार के लाभ

'नम:' धातु से बना है 'नमस्कार'। नम: का अर्थ है नमन करना या झुकना। नमस्कार का मतलब पैर छूना नहीं होता। नमस्कार शब्द हिन्दी, गुजराती, मराठी, तमिल, बंगाली आदि वर्तमान में प्रचलित भाषाओं का शब्द नहीं है। यह हिन्दू धर्म की भाषा संस्कृत का शब्द है। संस्कृत से ही सभी भाषाओं का जन्म हुआ।
हिन्दू और भारतीय संस्कृति के अनुसार मंदिर में दर्शन करते समय या किसी सम्माननीय व्यक्ति से मिलने पर हमारे हाथ स्वत: ही नमस्कार मुद्रा में जुड़ जाते हैं। नमस्कार करते समय व्यक्ति क्या करें और क्या न करें इसके भी शास्त्रों में नियम हैं। नियम से ही समाज चलता है।

नमस्कार के मुख्यत: तीन प्रकार हैं:- सामान्य नमस्कार, पद नमस्कार और साष्टांग नमस्कार।
सामान्य नमस्कार : किसी से मिलते वक्त सामान्य तौर पर दोनों हाथों की हथेलियों को जोड़कर नमस्कार किया जाता है। प्रतिदिन हमसे कोई न कोई मिलता ही है, जो हमें नमस्कार करता है या हम उसे नमस्कार करते हैं।
पद नमस्कार : इस नमस्कार के अंतर्गत हम अपने परिवार और कुटुम्ब के बुजुर्गों, माता-पिता आदि के पैर छूकर नमस्कार करते हैं। परिवार के अलावा हम अपने गुरु और आध्यात्मिक ज्ञान से संपन्न व्यक्ति के पैर छूते हैं।
साष्टांग नमस्कार : यह नमस्कार सिर्फ मंदिर में ही किया जाता है। षड्रिपु, मन और बुद्धि, इन आठों अंगों से ईश्वर की शरण में जाना अर्थात साष्टांग नमन करना ही साष्टांग नमस्कार है।
सामान्य नमस्कार :
1.कभी भी एक हाथ से नमस्कार न करें और न ही गर्दन हिलाकर नमस्कार करें। दोनों हाथों को जोड़कर ही नमस्कार करें। इससे सामने वाले के मन में आपके प्रति अच्छी भावना का विकास होगा और आप में भी। इसे मात्र औपचारिक अभिवादन न समझें।
2.नमस्कार करते समय मात्र 2 सेकंड के लिए नेत्रों को बंद कर देना चाहिए। इससे आंखें और मन रिफ्रेश हो जाएंगे।
3.नमस्कार करते समय हाथों में कोई वस्तु नहीं होनी चाहिए।  
पाद नमस्कार : 
1. ऐसे किसी व्यक्ति के पैर नहीं छूना चाहिए जिसे आप अच्छी तरह जानते नहीं हों या जो आध्यात्मिक संपन्न व्यक्ति नहीं है। बहुत से लोग आजकल चापलूसी या पद-लालसा के चलते राजनीतिज्ञों के पैर छूते रहते हैं, जो कि गलत है। 

साष्टांग नमस्कार : इसे दंडवत प्रणाम भी कहते हैं।
1. मंदिर में नमस्कार करते समय या साष्टांग नमस्कार करते वक्त पैरों में चप्पल या जूते न हों।
2. मंदिर में नमस्कार करते समय पुरुष सिर न ढंकें और स्त्रियों को सिर ढंकना चाहिए। हनुमान मंदिर और कालिका के मंदिर में सभी को सिर ढंकना चाहिए।
3. हाथों को जोड़ते समय अंगुलियां ढीली रखें। अंगुलियों के बीच अंतर न रखें। हाथों की अंगुलियों को अंगूठे से दूर रखें। हथेलियों को एक-दूसरे से न सटाएं, उनके बीच रिक्त स्थान छोड़ें।
4. मंदिर में देवता को नमन करते समय सर्वप्रथम दोनों हथेलियों को छाती के समक्ष एक-दूसरे से जोड़ें। हाथ जोड़ने के उपरांत पीठ को आगे की ओर थोड़ा झुकाएं।
5. फिर सिर को कुछ झुकाकर भ्रूमध्य (भौहों के मध्यभाग) को दोनों हाथों के अंगूठों से स्पर्श कर, मन को देवता के चरणों में एकाग्र करने का प्रयास करें।
6. इसके बाद हाथ सीधे नीचे न लाकर, नम्रतापूर्वक छाती के मध्यभाग को कलाइयों से कुछ क्षण स्पर्श कर, फिर हाथ नीचे लाएं।

नमस्कार के लाभ : अच्छी भावना और तरीके से किए गए नमस्कार का प्रथम लाभ यह है कि इससे मन में निर्मलता बढ़ती है। निर्मलता से सकारात्मकता का विकास होता है। अच्छे से नमस्कार करने से दूसरे के मन में आपके प्रति अच्छे भावों का विकास होता है।
इस तरह नस्कार का आध्यात्मिक और व्यावहारिक दोनों ही तरह का लाभ मिलता है। इससे जहां दूसरों के प्रति मन में नम्रता बढ़ती है वहीं मंदिर में नमस्कार करने से व्यक्ति के भीतर शरणागत और कृतज्ञता के भाव का विकास होता है। इससे मन और मस्तिष्क शांत होता है और शीघ्र ही आध्यात्मिक सफलता मिलती है।

Wednesday, August 28, 2013

जीमेल पर गलत ईमेल भेज दिया? ऐसे रोकिए

कितनी ही बार हम ईमेल भेज देते हैं और उसके बाद जाकर याद आता है कि उसमें कुछ गड़बड़ हो गई या किसी की जगह किसी और को ईमेल भेज दिया। ऐसे वक्त ख्याल आता है कि काश ऐसा हो सकता कि हम गलत ईमेल को रोक सकते।

 जीमेल में आप ऐसा कर सकते हैं। हालांकि, बहुत लोगों को इसकी जानकारी नहीं है। जीमेल यूजर्स ईमेल भेजने के कुछ समय तक अपने मेल को रोक सकते हैं। बस सेटिंग्स में जाकर इस फीचर को ऐक्टिवेट करने की जरूरत है। आगे बताए गए स्टेप्स को फॉलो करें और गलत मेल भेजे जाने से रोकें...
जीमेल खोलिए। अपनी स्क्रीन में दाईं तरफ ऊपर बने गियर बटन को क्लिक करें। यह गियर बटन आपकी गूगल प्लस प्रोफाइल इमेज के ठीक नीचे दिखाई देता है। इसके ड्रॉपडाउन मेन्यू में से सेटिंग्स चुनिए।
अब आपके सामने कई सारे टैब्ड ऑप्शन होंगे। इनमें से 'Labs' को चुनें और नीचे तक स्क्रॉल करें।
नीचे से तीसरे नंबर पर आपके पास 'Undo Send' का ऑप्शन आएगा। इसे इनेबल कर लें।
दाईं तरफ से स्क्रीन नीचे की ओर स्क्रॉल करें और सेव चेंजेस बटन पर क्लिक करें। लेकिन प्रक्रिया अभी खत्म नहीं हुई है, बाकी है...
सेव चेंजेस पर क्लिक करने के बाद, आप इनबॉक्स पर फिर से पहुंच जाएंगे। पहला स्टेप दोहराएं और सेटिंग्स के ऑप्शन पर जाएं।
आपके सामने डिफॉल्ट 'जनरल' टैब खुलेगा। टैब में नीचे स्क्रॉल करें और लगभग बीच में आपको 'Undo Send' का ऑप्शन मिलेगा। इसपर टिक मार्क लगा होगा जिससे पता चलता है कि आपका पहला ऑप्शन सेव है। इस टिक मार्क के ठीक नीचे आप खुद चुन सकते हैं कि एक भेजे गए मेल को रोकने के लिए 5 सेकंड से लेकर 30 मिनट तक कितना समय चाहिए।
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एक बार आपने अपना समय चुन लिया हो, तो नीचे की तरफ स्क्रॉल करें और 'सेव चेंजेस' क्लिक करें। अब आप ऊपर तय किए गए समय तक अपना मेल रोक सकते हैं।