Friday, May 2, 2014

दिल के रोगियों के लिए घरेलू नुस्खे

पीपल के 15 पत्ते लें जो कोमल गुलाबी कोंपलें न हों, बल्कि पत्ते हरे, कोमल व भली प्रकार विकसित हों। प्रत्येक का ऊपर व नीचे का कुछ भाग कैंची से काटकर अलग कर दें। पत्ते का बीच का भाग पानी से साफ कर लें। इन्हें एक गिलास पानी में धीमी आँच पर पकने दें। जब पानी उबलकर एक तिहाई रह जाए तब ठंडा होने पर साफ कपड़े से छान लें और उसे ठंडे स्थान पर रख दें, दवा तैयार।
इस काढ़े की तीन खुराकें बनाकर प्रत्येक तीन घंटे बाद प्रातः लें। हार्ट अटैक के बाद कुछ समय हो जाने के पश्चात लगातार पंद्रह दिन तक इसे लेने से हृदय पुनः स्वस्थ हो जाता है और फिर दिल का दौरा पड़ने की संभावना नहीं रहती। दिल के रोगी इस नुस्खे का एक बार प्रयोग अवश्य करें।

* पीपल के पत्ते में दिल को बल और शांति देने की अद्भुत क्षमता है।
* इस पीपल के काढ़े की तीन खुराकें सवेरे 8 बजे, 11 बजे व 2 बजे ली जा सकती हैं।
* खुराक लेने से पहले पेट एक दम खाली नहीं होना चाहिए, बल्कि सुपाच्य व हल्का नाश्ता करने के बाद ही लें।
* प्रयोगकाल में तली चीजें, चावल आदि न लें। मांस, मछली, अंडे, शराब, धूम्रपान का प्रयोग बंद कर दें। नमक, चिकनाई का प्रयोग बंद कर दें।
* अनार, पपीता, आंवला, बथुआ, लहसुन, मैथी दाना, सेब का मुरब्बा, मौसंबी, रात में भिगोए काले चने, किशमिश, गुग्गुल, दही, छाछ आदि लें।

Tuesday, April 8, 2014

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यूं तो कभी विवादों से मुक्त नहीं रही लेकिन भारत के चुनाव आयोग ने हमेशा इसे सुरक्षित और सही माना। भारत की जनता भी चुनाव आयोग से सहमत है। यदा-कदा राजनेता चुनावों में ईवीएम के खिलाफ बोलते रहे हैं लेकिन किसी बड़ी राष्ट्रीय पार्टी ने इसके खिलाफ कोई बड़ा कदम नहीं उठाया है।

हर ईवीएम के दो हिस्से होते हैं। एक हिस्सा होता है बैलेटिंग यूनिट जो कि जो मतदाताओं के लिए होता है। दूसरा होता है कंट्रोल यूनिट जो कि पोलिंग अफसरों के लिए होता है। ईवीएम के दोंनो हिस्से एक पांच मीटर लंबे तार से जुड़े रहते हैं। बैलेट यूनिट ऐसी जगह रखी होती जहां कोई वोटर को वोट डालते समय देख ना सके।

इसके अलावा संवेदनशील पोलिंग बूथ पर वोटिंग का सीधा प्रसारण होता है जो कि कहीं से भी देखा जा सकता है। ईवीएम पर अधिकतम 64 प्रत्याशी तक दर्शाए जा सकते हैं। किसी लोकसभा क्षेत्र में 64 से ज्यादा प्रत्याशी होने पर चुनाव आयोग कागज के बैलट का इस्तेमाल करने के लिए बाध्य है।
ईवीएम अंदर से : 
1. मतदाता वाले हिस्से पर प्रत्याशियों के नाम और उनका क्रमांक या सीरियल नंबर लिखा होता है। नाम एक दो या तीन भाषाओँ में लिखे जाते हैं। जिस इलाके में जो भाषा प्रचलित है उस भाषा का इस्तेमाल होता है। नाम के साथ ही प्रत्याशी का चुनाव चिन्ह भी होता है। चुनाव चिन्ह उन वोटरों को ध्यान में रख कर बनाए गए हैं जो पढ़ लिख नहीं सकते। चुनाव चिन्हों को लेकर चुनाव आयोग के नियम बेहद सख्त है। मसलन कोई भी प्रत्याशी या पार्टी 'सूअर' या 'नोट की गड्डी' के चिन्ह पर चुनाव नहीं लड़ सकता।

एक ही नाम के एक से ज्यादा उमीदवार होने पर नाम के आगे ब्रैकेट में उम्मीदवार के घर या पेशे के बारे में लिखा जाता है ताकी मतदाता चकराए ना। पहली बार हर ईवीएम में अंतिम बटन नोटा या ऊपर दिए नामों में से कोई नहीं ही होगा।

2. नाम के आगे एक नीला बटन होता है जो वोट देने के लिए दबाया जाता है। जिस खाते में वोट दर्ज हुआ है उस नाम के सामने लगी एक छोटी सी बत्ती भी चमक उठती है। नंबर पहली बार हर ईवीएम पर ब्रेल में नीले बटन के ही बगल में ब्रेल लिपि में उम्मीदवार का सीरियल नंबर लिखा गया है। जो नेत्रहीन उमीदवार ब्रेल नहीं जानते वो अपने साथ किसी सहायक को ले जा सकते हैं।

3. कंट्रोल यूनिट : जहां वोट दरअसल दर्ज होते हैं। ईवीएम का यह हिस्सा पोलिंग ऑफिसर के पास होता है। किसी भी वोटर के वोट देने के पहले पोलिंग ऑफिसर बैलट बटन दबा कर मशीन को वोट दर्ज करने के लिए तैयार करता है। बैलट बटन के ऊपर एक ढक्कन के अंदर तीन बटन बंद होते हैं। पहला होता है 'क्लोज' का। इस बटन को दबाने के बाद मशीन नए वोट दर्ज करना पूरी तरह से बंद कर देती है।

ये बटन केवल एक ही बार दबाया जा सकता है। इस बटन को या तो वोटिंग खत्म होने के बाद शाम को या फिर बूथ कैप्चरिंग की हालत में दबाया जा सकता है।
क्लोज के बटन के बगल में एक अलग खाने में दो बटन होते हैं जो वोटों की गिनती के वक्त हर प्रत्याशी को मिले मिले वोटों की संख्या बताते है। इन परिणामों का प्रिंट आउट भी लिया जाता है और ये परिणाम बैलट यूनिट के ऊपर लगी एक स्क्रीन पर भी देखे जा सकते हैं।
बैलट यूनिट में बटन वाले हिस्से के ऊपर ढक्कन के अंदर छह वोल्ट की अल्कलाइन बैटरी बंद होती है जिसकी मदद से ईवीएम उन इलाकों में भी काम करती हैं जहां बिजली नहीं होती। हर बैलट बटन के पास एक स्पीकर भी होता है जो की हर वोट के सही ढ़ंग से दर्ज होने के बाद तेज आवाज करता है।

मशीन के साथ छेड़छाड़ और सुरक्षा कैसे,

4.चुनाव आयोग ये दावा कभी नहीं करता की इस मशीन के अंदर मौजूद सॉफ्टवेयर के साथ छेड़-छाड़ नहीं की जा सकती। लेकिन चुनाव आयोग ये दावा जरूर करता है कि छेड़-छाड़ करने के लिए ईवीएम किसी के हाथ में नहीं लग सकतीं। चुनाव आयोग का कहना है कि इस मशीन को पूरी प्रक्रिया सुरक्षित बनाती है ना की केवल कोई एक पुर्जा।

सुरक्षा के इंतजाम : 

वोटिंग के पहले और बाद में हर मशीन को कड़ी निगरानी में कैद रखा जाता है। वोट डलने के बाद शाम को कई लोगों की मौजूदगी में पोलिंग ऑफिसर इस मशीन को सील बंद करता है। हर वोटिंग मशीन को एक खास कागज से सील जाता है। ये कागज करंसी नोट की तरह ही खास तौर पर बने होते हैं। करंसी नोट की ही तरह हर कागज़ के ऊपर एक खास नंबर होता है।
कई लोग सवाल करते हैं कि जब करंसी नोट नकली बन सकते हैं तो ये कागज क्यों नहीं। ये विशेष कागज सुरक्षा की अंतिम कड़ी नहीं होते। इन कागजों से सील करने के बाद भी इस मशीन को एक सैकड़ों साल पुराने तरीके से सील किया जाता है। हर मशीन के परिणाम वाले हिस्से में एक छेद होता है जिसे धागे के मदद से बंद किया जाता है और उसके बाद उसे कागज और गर्म लाख से एक खास पीतल की सील लगा कर बंद किया जाता है।
सील करने के बाद हर पोलिंग मशीन को किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की तरह की सुरक्षा के घेरे में मतगणना केंद्र तक लाया जाता है। मतगणना केन्द्रों पर हर मशीन मई 16 तक कड़े पहरे में रहेगी। मई 16 को एक साथ सुबह 6 बजे पूरे देश में वोटों की गिनती होगी।

ईवीएम : कुछ रोचक तथ्य :

* 2004 के आम चुनावों में पहली बार पूरे भारत के वोटरों ने ईवीएम के जरिये वोट डाले थे।
* ईवीएम इस तरह से बनाई गई है कि बिना पढ़े-लिखे वोटर भी चुनाव चिन्ह के आगे लगे बटन को दबा कर वोट डाल सकें।
* हर ईवीएम के अंदर एक छह वोल्ट की अल्कलाइन बैटरी होती है जो बिजली ना होने पर भी मशीन को चालू रखती है।
* एक ईवीएम अधिकतम 3840 वोट दर्ज कर सकती है. सामान्यतः किसी भी पोलिंग बूथ पर 1500 से अधिक वोटर नहीं होते।
* ईवीएम पर अधिकतम 64 प्रत्याशी तक दर्शाए जा सकते हैं।
* किसी लोकसभा क्षेत्र में 64 से ज्यादा प्रत्याशी होने पर चुनाव आयोग कागज के बैलट का इस्तेमाल करने के लिए बाध्य है।
* पहली बार हर ईवीएम में अंतिम बटन 'नोटा' या 'ऊपर दिए नामों में से को कोई नहीं' ही होगा।

* ईवीएम के अंदर 10 सालों तक परिणामों को सुरक्षित रखा जा सकता है।

Thursday, January 23, 2014

'ॐ' धर्म का नहीं सेहत का भी मंत्र है

'ॐ' किसी धर्म से जुड़ा न होकर ध्वनिमूलक है। माना जाता है कि सृष्टि के आरंभ में केवल यही एक ध्वनि ब्रह्मांड में गूंजती थी। 

     जब हम 'ॐ' बोलते हैं, तो वस्तुतः हम तीन वर्णों का उच्चारण करते हैं: 'ओ', 'उ' तथा 'म'। 'ओ' मस्तिष्क से, 'उ' हृदय से तथा 'म' नाभि (जीवन) से जुड़ा है।

मन, मस्तिष्क और जीवन के तारतम्य से ही कोई भी काम सफल होता है। 'ॐ' के सतत उच्चारण से इन तीनों में एक रिदम आ जाती है।

      जब यह तारतम्य आ जाता है, तो व्यक्ति का व्यक्तित्व पूर्ण हो जाता है। उसका आभामंडल शक्तिशाली हो जाता है, इंद्रियां अंतरमुखी हो जाती हैं। 

    जैसे किसी पेड़ को ऊंचा उठने के लिए जमीन की गहराइयों तक जाना पड़ता है, ठीक उसी तरह व्यक्ति को अपने भीतर की गहराइयों में झाँकने हेतु (अपने संपूर्ण विकास के लिए) 'ॐ' का सतत जाप बहुत मदद करता है। ॐ आध्यात्मिक साधना है। इससे हम विपदा, कष्ट, विघ्नों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।

ॐ' के जाप से वह स्थान जहां जाप किया जा रहा है, तरंगित होकर पवित्र एवं सकारात्मक हो जाता है। इसके अभ्यास से जीवन की गुत्थियाँ सुलझती हैं तथा आत्मज्ञान होने लगता है।

मनुष्य के मन में एकाग्रता, वैराग्य, सात्विक भाव, भक्ति, शांति एवं आशा का संचार होता है। इससे आध्यात्मिक ऊँचाइयाँ प्राप्त होती हैं। 'ॐ' से तनाव, निराशा, क्रोध दूर होते हैं। 

मन, मस्तिष्क, शरीर स्वस्थ होते हैं। गले व साँस की बीमारियों, थायरॉइड समस्या, अनिद्रा, उच्च रक्तचाप, स्त्री रोग, अपच, वायु विकार, दमा व पेट की बीमारियों में यह लाभदायक है। 

विद्यार्थियों को परीक्षा में सफलता हेतु एकाग्रता दिलाने में भी यह सहायक है। इन दिनों पश्चिमी देशों में नशे की लत छुड़ाने में भी 'ॐ' के उच्चार का प्रयोग किया जा रहा है।

ध्यान, प्राणायाम, योगनिद्रा, योग आदि सभी को 'ॐ' के उच्चारण के बाद ही शुरू किया जाता है। मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए दिन में कम से कम 21 बार 'ॐ' का उच्चारण करना चाहिए। 

Tuesday, January 14, 2014

पृथ्वी को सनस्क्रीन पहनाने की योजना

सूरज की रोशनी से बचने के लिए जैसे त्वचा पर सनस्क्रीन लोशन लगाया जाता है, अगर पूरी पृथ्वी के साथ भी वैसा ही कुछ कर दिया जाए, तो क्या बढ़ते तापमान का मुकाबला हो सकता है। सुनने में दिलचस्प पर क्या हकीकत में संभव।

बुधवार को जारी रिसर्च में कहा गया है कि अगर ऐसा किया जा सके, तो यूरोप और एशिया के कुछ हिस्सों में तो बहुत फायदा हो सकता है लेकिन इक्वेटर यानि विषुवत रेखा के आस-पास मौसम पर बुरा असर पड़ सकता है। इतना कि दक्षिणी अमेरिका में ऊष्णकटिबंधीय वन सूख सकते हैं। अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया में सूखा पड़ सकता है। ब्रिटेन की रीडिंग यूनिवर्सिटी के मौसम विज्ञानी एंड्रयू चार्लटन पेरेज का कहना है, "इस तरह की जियो इंजीनियरिंग के भयंकर जोखिम हैं।"

साल 1997 में अमेरिकी भौतिकशास्त्री एडवर्ड टेलर और दूसरे वैज्ञानिकों ने सलाह दी कि वायुमंडल के ऊपरी परत स्ट्रेटोस्फेयर में सल्फेट पार्टिकल का छिड़काव कर दिया जाए, तो धरती पर गिरने वाली सूर्य की कुछ किरणें परिवर्तित होकर अंतरिक्ष में लौट जाएंगी। इससे धरती के तापमान के बढ़ते स्तर पर अंकुश लग सकती है। स्ट्रेटोस्फेयर धरती के वायुमंडल की दूसरी परत है।

राख जैसा एरोसोल : प्रस्तावित सनस्क्रीन उसी तरह काम करेगा, जैसा ज्वालामुखी फटने से निकलने वाली राख करती है। इसकी वजह से भी तापमान पर रोक लगती है लेकिन अगर सनस्क्रीन का इस्तेमाल किया गया, तो लागत बहुत कम आएगी। फिर कोयला, गैस और तेल के खर्च में ज्यादा कटौती की जरूरत नहीं पड़ेगी। जियो इंजीनियरों के बीच यह एक लोकप्रिय अवधारणा है, जो इसे आखिरी उपाय की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं।

विज्ञान की पत्रिका एनवायरनमेंटल रिसर्च लेटर्स में ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने कहा है कि एरोसोल नाम के पदार्थ से तापमान बढ़ने की प्रक्रिया रोकी जा सकती है। एक्सेटर यूनिवर्सिटी के अनगुस फेरारो का कहना है, "वैश्विक तापमान को कम करने के लिए भारी संख्या में एरोसोल के इंजेक्शन की जरूरत पड़ेगी।" थ्योरी है कि साल 1991 में माउंट पिनाटूबो ज्वालामुखी की विस्फोट से जितनी राख निकली, हर साल उससे पांचगुनी मात्रा में एरोसोल का इस्तेमाल करना होगा। माउंट पिनाटूबो को मिसाल इसलिए बनाया गया है क्योंकि पिछले 25 साल का यह सबसे बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट है।

यह मॉडल इस तरह तैयार किया गया है कि जलवायु में मौजूद कार्बन डायोक्साइड की मात्रा प्रति 10 लाख कण में 1,022 कम कर दी जाए, यानी प्रति दिन 400 कणों की कमी। इसके बाद धरती का तापमान चार डिग्री तक कम हो सकता है।

मर जाएंगे जंगल : लेकिन जांच में यह भी पता चला है कि एरोसोल की भारी मात्रा से विषुवत रेखा के आस पास भारी असर पड़ सकता है। इसकी वजह से स्ट्रेटोस्फेयर का तापमान बेहिसाब बढ़ सकता है। सबसे ज्यादा असर यहां होने वाली बारिश पर होगा।

चार्लटन पेरेज कहते हैं, "ऊष्णकटिबंधीय इलाके में 30 फीसदी बारिश घट जाएगी। मतलब कि करीब हर दिन बरसात देखने वाला इंडोनेशिया इतना सूख जाएगा कि सूखे जैसे हालात हो जाएंगे। विषुवत रेखा के आस पास का मौसम पृथ्वी पर सबसे नाजुक है। हम देखते हैं कि यहां इतनी तेजी से बदलाव होता है कि लोगों को इसके मुताबिक खुद को ढालने में वक्त लग जाता है।"

अगस्त 2012 में इसी पत्रिका में प्रकाशित कीमतों के मुताबिक एरोसोल के छिड़काव की बुनियादी तकनीक मौजूद है और इस काम में हर साल पांच अरब डॉलर से कम खर्च होगा। इसकी अगर मौजूदा योजना से तुलना करें, तो 2030 में 200 अरब से 2,000 अरब डॉलर के बीच खर्च होंगे। हालांकि एरोसोल छिड़काव में मौसम को होने वाले नुकसान को नहीं जोड़ा गया है।

साल 2009 में ब्रिटेन की विज्ञान अकादमी यानी रॉयल सोसाइटी की एक समीक्षा आई, जिसमें कहा गया था कि एरोसोल के छिड़काव का काम बहुत जल्दी हो सकता है और इसका नतीजा साल भर के अंदर आ सकता है। लेकिन इससे कार्बन डायोक्साइड की मात्रा पर लगाम नहीं लग सकेगी, जिसके दूसरे खराब नतीजे हो सकते हैं। और इसका असर धरती की ओजोन परत पर भी पड़ सकता है।                          एजेए/आईबी (एएफपी)

Tuesday, December 10, 2013

मानव अधिकार दिवस

संयुक्त राष्ट्रसंघ की ओर से प्रति वर्ष 10 दिसंबर को मानव अधिकार दिवस मनाया जाता है। सन् 1945 में अपनी स्थापना के समय से ही संयुक्त राष्ट्रसंघ ने मानव अधिकारों की अभिवृद्धि एवं संरक्षण के लिए प्रयास आरंभ किए। इसी के मद्देनजर मानव अधिकार आयोग ने अधिकारों की एक विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की जिसे संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 10 दिसंबर, 1948 को स्वीकार किया।
मानवाधिकार मनुष्य के वे मूलभूत सार्वभौमिक अधिकार हैं, जिनसे मनुष्य को नस्ल, जाति, राष्ट्रीयता, धर्म, लिंग आदि किसी भी दूसरे कारक के आधार पर वंचित नहीं किया जा सकता।

मानव अधिकार क्या है :- 
किसी भी मनुष्य की जिंदगी में आजादी, बराबरी और सम्मान का अधिकार है ही मानवाधिकार है। भारतीय संविधान इस अधिकार की न सिर्फ ग्यारंटी देता है, बल्कि इसे तोड़ने वाले को अदालत सजा भी देती है।

मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा :- 
10 दिसंबर 1948 को यूनाइटेड नेशन्स की जनरल एसेम्बली ने मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा को स्वीकृत और घोषित किया। इस ऐतिहासिक कार्य के बाद ही एसेम्बली ने सभी सदस्य देशों से अपील की कि वे इस घोषणा का प्रचार करें और देशों या प्रदेशों की राजनीतिक स्थिति पर आधारित भेदभाव का विचार किए बिना विशेषतः स्कूलों और अन्य शिक्षा संस्थाओं में इसके प्रचार, प्रदर्शन और व्याख्या का प्रबंध करें। इस घोषणा में न सिर्फ मनुष्य जाति के अधिकारों को बढ़ाया गया बल्कि महिलाएं और पुरुषों को भी समान अधिकार दिए गए।

भारत में कब अमल में आया :- 
12 अक्‍टूबर, 1993 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन किया तथा 28 सितंबर 1993 से भारत में मानव अधिकार कानून अमल में आया। जिसमें बाल विवाह, महिला अधिकार, बाल मजदूरी, स्वास्थ्य, एचआईवी (एड्स), भोजन, हिरासत और मुठभेड़ में होने वाली मौत और अल्पसंख्यकों और अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकार शामिल है।

मानव अधिकार से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण जानकारी :-
1829 - राजा राममोहन राय द्वारा चलाए गए हिन्दू सुधार आंदोलन के बाद भारत में ब्रिटिश राज के दौरान सती प्रथा को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।
1929 - नाबालिगों को शादी से बचाने के लिए बाल विवाह निरोधक कानून पास हुआ।
1947 - ब्रिटिश राज की गुलामी से भारतीय जनता को आजादी मिली।
1950 - भारतीय गणतंत्र का संविधान लागू हुआ।
1955 - भारतीय परिवार कानून में सुधार। हिन्दू महिलाओं को मिले और ज्यादा अधिकार।
1973 - केशवानंद भारती वाद में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया कि संविधान संशोधन द्वारा संविधान के मूलभूत ढांचे में परिवर्तन नहीं किया जा सकता। (जिसमें संविधान द्वारा प्रदत्त कई मूल अधिकार भी शामिल हैं)
1989 - अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (अत्याचारों से सुरक्षा) एक्ट 1989 पास हुआ।
1992 - संविधान में संशोधन के जरिए पंचायत राज की स्थापना, जिसमें महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण लागू हुआ। अजा-अजजा के लिए भी समान रूप से आरक्षण लागू।
1993 - प्रोटेक्शन ऑफ ह्यूमन राइट्स एक्ट के तहत राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की स्थापना।
2001 - खाद्य अधिकारों को लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त आदेश पास किया।
2005 - सूचना का अधिकार कानून पास।
2005 - रोजगार की समस्या हल करने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट पास।
2005 - भारतीय पुलिस के कमजोर मानव अधिकारों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधार के निर्देश दिए।

Tuesday, November 19, 2013

हिन्दू धर्म की मुख्य बातें

किसी भी धर्म के मूल तत्त्व उस धर्म को मानने वालों के विचार, मान्यताएं, आचार तथा संसार एवं लोगों के प्रति उनके दृष्टिकोण को ढालते हैं। हिंदू धर्म की बुनियादी पांच बातें तो है ही, (1.वंदना, 2.वेदपाठ, 3.व्रत, 4.तीर्थ, और 5.दान) लेकिन इसके अलावा निम्न ‍सिद्धांत को भी जानें:-

1. ब्रह्म ही सत्य है:
 ईश्वर एक ही है और वही प्रार्थनीय तथा पूजनीय है। वही सृष्टा है वही सृष्टि भी। शिव, राम, कृष्ण आदि सभी उस ईश्वर के संदेश वाहक है। हजारों देवी-देवता उसी एक के प्रति नमन हैं। वेद, वेदांत और उपनिषद एक ही परमतत्व को मानते हैं।

2. वेद ही धर्म ग्रंथ है :
कितने लोग हैं जिन्होंने वेद पढ़े? सभी ने पुराणों की कथाएं जरूर सुनी और उन पर ही विश्वास किया तथा उन्हीं के आधार पर अपना जीवन जिया और कर्मकांड किए। पुराण, रामायण और महाभारत धर्मग्रंथ नहीं इतिहास ग्रंथ हैं। ऋषियों द्वारा पवित्र ग्रंथों, चार वेद एवं अन्य वैदिक साहित्य की दिव्यता एवं अचूकता पर जो श्रद्धा रखता है वही सनातन धर्म की सुदृढ़ नींव को बनाए रखता है।

3. सृष्टि उत्पत्ति व प्रलय : 
सनातन हिन्दू धर्म की मान्यता है कि सृष्टि उत्पत्ति, पालन एवं प्रलय की अनंत प्रक्रिया पर चलती है। गीता में कहा गया है कि जब ब्रह्मा का दिन उदय होता है, तब सब कुछ अदृश्य से दृश्यमान हो जाता है और जैसे ही रात होने लगती है, सब कुछ वापस आकर अदृश्य में लीन हो जाता है। वह सृष्टि पंच कोष तथा आठ तत्वों से मिलकर बनी है। परमेश्वर सबसे बढ़कर है।

4. कर्मवान बनो :
सनातन हिन्दू धर्म भाग्य से ज्यादा कर्म पर विश्वास रखता है। कर्म से ही भाग्य का निर्माण होता है। कर्म एवं कार्य-कारण के सिद्धांत अनुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने भविष्य के लिए पूर्ण रूप से स्वयं ही उत्तरदायी है। प्रत्येक व्यक्ति अपने मन, वचन एवं कर्म की क्रिया से अपनी नियति स्वयं तय करता है। इसी से प्रारब्ध बनता है। कर्म का विवेचन वेद और गीता में दिया गया है।

5. पुनर्जन्म : 
सनातन हिन्दू धर्म पुनर्जन्म में विश्वास रखता है। जन्म एवं मृत्यु के निरंतर पुनरावर्तन की प्रक्रिया से गुजरती हुई आत्मा अपने पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है। आत्मा के मोक्ष प्राप्त करने से ही यह चक्र समाप्त होता है।

6. प्रकृति की प्रार्थना : 
वेद प्राकृतिक तत्वों की प्रार्थना किए जाने के रहस्य को बताते हैं। ये नदी, पहाड़, समुद्र, बादल, अग्नि, जल, वायु, आकाश और हरे-भरे प्यारे वृक्ष हमारी कामनाओं की पूर्ति करने वाले हैं अत: इनके प्रति कृतज्ञता के भाव हमारे जीवन को समृद्ध कर हमें सद्गति प्रदान करते हैं। इनकी पूजा नहीं प्रार्थना की जाती है। यह ईश्वर और हमारे बीच सेतु का कार्य करते हैं। यही दुख मिटाकर सुख का सृजन करते हैं।

7.गुरु का महत्व : 
सनातन धर्म में सद्‍गुरु के समक्ष वेद शिक्षा-दीक्षा लेने का महत्व है। किसी भी सनातनी के लिए एक गुरु (आध्यात्मिक शिक्षक) का मार्ग दर्शन आवश्यक है। गुरु की शरण में गए बिना अध्यात्म व जीवन के मार्ग पर आगे बढ़ना असंभव है। लेकिन वेद यह भी कहते हैं कि अपना मार्ग स्वयं चुनों। जो हिम्मतवर है वही अकेले चलने की ताकत रखते हैं।

8.सर्वधर्म समभाव :
 'आनो भद्रा कृत्वा यान्तु विश्वतः'- ऋग्वेद के इस मंत्र का अर्थ है कि किसी भी सदविचार को अपनी तरफ किसी भी दिशा से आने दें। ये विचार सनातन धर्म एवं धर्मनिष्ठ साधक के सच्चे व्यवहार को दर्शाते हैं। चाहे वे विचार किसी भी व्यक्ति, समाज, धर्म या सम्प्रदाय से हो। यही सर्वधर्म समभाव: है। हिंदू धर्म का प्रत्येक साधक या आमजन सभी धर्मों के सारे साधु एवं संतों को समान आदर देता है।

9.यम-नियम : 
यम नियम का पालन करना प्रत्येक सनातनी का कर्तव्य है। यम अर्थात 1.अहिंसा, 2.सत्य, 3.अस्तेय, 4.ब्रह्मचर्य और 5.अपरिग्रह। नियम अर्थात 1.शौच, 2.संतोष, 3.तप, 4.स्वाध्याय और 5.ईश्वर प्राणिधान।

10. मोक्ष का मार्ग : 
मोक्ष की धारणा और इसे प्राप्त करने का पूरा विज्ञान विकसित किया गया है। यह सनातन धर्म की महत्वपूर्ण देन में से एक है। मोक्ष में रुचि न भी हो तो भी मोक्ष ज्ञान प्राप्त करना अर्थात इस धारणा के बारे में जानना प्रमुख कर्तव्य है।

11 संध्यावंदन : 
संधि काल में ही संध्या वंदन की जाती है। वैसे संधि पांच या आठ वक्त (समय) की मानी गई है, लेकिन सूर्य उदय और अस्त अर्थात दो वक्त की संधि महत्वपूर्ण है। इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि कर गायत्री छंद से निराकार ईश्वर की प्रार्थना की जाती है।

12. श्राद्ध-तर्पण :
 पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं तथा तृप्त करने की क्रिया और देवताओं, ऋषियों या पितरों को तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते हैं। तर्पण करना ही पिंडदान करना है। श्राद्ध पक्ष का सनातन हिंदू धर्म में बहुत ही महत्व माना गया है।

13.दान का महत्व :
दान से इंद्रिय भोगों के प्रति आसक्ति छूटती है। मन की ग्रथियां खुलती है जिससे मृत्युकाल में लाभ मिलता है। मृत्यु आए इससे पूर्व सारी गांठे खोलना जरूरी है, ‍जो जीवन की आपाधापी के चलते बंध गई है। दान सबसे सरल और उत्तम उपाय है। वेद और पुराणों में दान के महत्व का वर्णन किया गया है।

14.संक्रांति : 
भारत के प्रत्येक समाज या प्रांत के अलग-अलग त्योहार, उत्सव, पर्व, परंपरा और रीतिरिवाज हो चले हैं। यह लंबे काल और वंश परम्परा का परिणाम ही है कि वेदों को छोड़कर हिंदू अब स्थानीय स्तर के त्योहार और विश्वासों को ज्यादा मानने लगा है। सभी में वह अपने मन से नियमों को चलाता है। कुछ समाजों ने मांस और मदिरा के सेवन हेतु उत्सवों का निर्माण कर लिया है। रात्रि के सभी कर्मकांड निषेध माने गए हैं।
उन त्योहार, पर्व या उत्सवों को मनाने का महत्व अधिक है जिनकी उत्पत्ति स्थानीय परम्परा, व्यक्ति विशेष या संस्कृति से न होकर जिनका उल्लेख वैदिक धर्मग्रंथों, धर्मसूत्रों और आचार संहिता में मिलता है। ऐसे कुछ पर्व हैं और इनके मनाने के अपने नियम भी हैं। इन पर्वों में सूर्य-चंद्र की संक्रांतियों और कुम्भ का अधिक महत्व है। सूर्य संक्रांति में मकर सक्रांति का महत्व ही अधिक माना गया है।

15.यज्ञ कर्म : 
वेदानुसार यज्ञ पांच प्रकार के होते हैं-1.ब्रह्मयज्ञ, 2.देवयज्ञ, 3.पितृयज्ञ, 4.वैश्वदेव यज्ञ और 5.अतिथि यज्ञ। उक्त पांच यज्ञों को पुराणों और अन्य ग्रंथों में विस्तार दिया गया है। वेदज्ञ सार को पकड़ते हैं विस्तार को नहीं।
16.वेद पाठ : कहा जाता है कि वेदों को अध्ययन करना और उसकी बातों की किसी जिज्ञासु के समक्ष चर्चा करना पुण्य का कार्य है, लेकिन किसी बहसकर्ता या भ्रमित व्यक्ति के समक्ष वेद वचनों को कहना निषेध माना जाता है।

Friday, November 15, 2013

मुहर्रम : कैसे हुई ताजियों की शुरुआत

ताजियों की परंपरा

मुहर्रम कोई त्योहार नहीं है, यह सिर्फ इस्लामी हिजरी सन्‌ का पहला महीना है। पूरी इस्लामी दुनिया में मुहर्रम की नौ और दस तारीख को मुसलमान रोजे रखते हैं और मस्जिदों-घरों में इबादत की जाती है। रहा सवाल भारत में ताजियादारी का तो यह एक शुद्ध भारतीय परंपरा है, जिसका इस्लाम से कोई संबंध नहीं है।
इसकी शुरुआत बरसों पहले तैमूर लंग बादशाह ने की थी, जिसका ताल्लुक ‍शीआ संप्रदाय से था। तब से भारत के शीआ-सुन्नी और कुछ क्षेत्रों में हिन्दू भी ताजियों (इमाम हुसैन की कब्र की प्रतिकृति, जो इराक के कर्बला नामक स्थान पर है) की परंपरा को मानते या मनाते आ रहे हैं।
भारत में ताजिए के इतिहास और बादशाह तैमूर लंग का गहरा रिश्ता है। तैमूर बरला वंश का तुर्की योद्धा था और विश्व विजय उसका सपना था। सन्‌ 1336 को समरकंद के नजदीक केश गांव ट्रांस ऑक्सानिया (अब उज्बेकिस्तान) में जन्मे तैमूर को चंगेज खां के पुत्र चुगताई ने प्रशिक्षण दिया। सिर्फ 13 वर्ष की उम्र में ही वह चुगताई तुर्कों का सरदार बन गया।
फारस, अफगानिस्तान, मेसोपोटामिया और रूस के कुछ भागों को जीतते हुए तैमूर भारत (1398) पहुंचा। उसके साथ 98000 सैनिक भी भारत आए। दिल्ली में मेहमूद तुगलक से युद्ध कर अपना ठिकाना बनाया और यहीं उसने स्वयं को सम्राट घोषित किया। तैमूर लंग तुर्की शब्द है, जिसका अर्थ तैमूर लंगड़ा होता है। वह दाएं हाथ और दाए पांव से पंगु था।
तैमूर लंग शीआ संप्रदाय से था और मुहर्रम माह में हर साल इराक जरूर जाता था, लेकिन बीमारी के कारण एक साल नहीं जा पाया। वह हृदय रोगी था, इसलिए हकीमों, वैद्यों ने उसे सफर के लिए मना किया था। बादशाह सलामत को खुश करने के लिए दरबारियों ने ऐसा करना चाहा, जिससे तैमूर खुश हो जाए। उस जमाने के कलाकारों को इकट्ठा कर उन्हें इराक के कर्बला में बने इमाम हुसैन के रोजे (कब्र) की प्रतिकृति बनाने का आदेश दिया।
कुछ कलाकारों ने बांस की किमचियों की मदद से 'कब्र' या इमाम हुसैन की यादगार का ढांचा तैयार किया। इसे तरह-तरह के फूलों से सजाया गया। इसी को ताजिया नाम दिया गया। इस ताजिए को पहली बार 801 हिजरी में तैमूर लंग के महल परिसर में रखा गया।
तैमूर के ताजिए की धूम बहुत जल्द पूरे देश में मच गई। देशभर से राजे-रजवाड़े और श्रद्धालु जनता इन ताजियों की जियारत (दर्शन) के लिए पहुंचने लगे। तैमूर लंग को खुश करने के लिए देश की अन्य रियासतों में भी इस परंपरा की सख्ती के साथ शुरुआत हो गई। खासतौर पर दिल्ली के आसपास के जो शीआ संप्रदाय के नवाब थे, उन्होंने तुरंत इस परंपरा पर अमल शुरू कर दिया। तब से लेकर आज तक इस अनूठी परंपरा को भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और बर्मा (म्यांमार) में मनाया जा रहा है।
जबकि खुद तैमूर लंग के देश उज्बेकिस्तान या कजाकिस्तान में या शीआ बहुल देश ईरान में ताजियों की परंपरा का कोई उल्लेख नहीं मिलता है। 68 वर्षीय तैमूर अपनी शुरू की गई ताजियों की परंपरा को ज्यादा देख नहीं पाया और गंभीर बीमारी में मुब्तिला होने के कारण 1404 में समरकंद लौट गया। बीमारी के बावजूद उसने चीन अभियान की तैयारियां शुरू कीं, लेकिन 19 फरवरी 1405 को ओटरार चिमकेंट के पास (अब शिमकेंट, कजाकिस्तान) में तैमूर का इंतकाल (निधन) हो गया। लेकिन तैमूर के जाने के बाद भी भारत में यह परंपरा जारी रही।

तुगलक-तैमूर वंश के बाद मुगलों ने भी इस परंपरा को जारी रखा। मुगल बादशाह हुमायूं ने सन्‌ नौ हिजरी 962 में बैरम खां से 46 तौला के जमुर्रद (पन्ना/ हरित मणि) का बना ताजिया मंगवाया था ।