Monday, May 11, 2015

क्या है जीएसटी?

GST  टैक्स सुधार के लिए क्रांतिकारी कदम माना जा रहा जीएसटी देश के हर नागरिक को प्रभावित करने वाला है। जानिए जीएसटी से जुड़े हर सवाल का जवाब।

सवालः क्या है जीएसटी?

जवाबः जीएसटी का पूरा नाम है गुड्स एंड सर्विस टैक्स। ये एक अप्रत्यक्ष कर है यानी ऐसा कर जो सीधे-सीधे ग्राहकों से नहीं वसूला जाता लेकिन जिसकी कीमत अंत में ग्राहक की जेब से ही जाती है। अप्रैल 2016 यानी अगले वित्तीय वर्ष से जीएसटी को लागू होना है। इसे आजादी के बाद सबसे बड़ा टैक्स सुधार कदम कहा जा रहा है। जीएसटी लागू होने के बाद दूसरे कई तरह के टैक्स समाप्त हो जाएंगे और उसकी जगह सिर्फ जीएसटी लगेगा।

सवालः जीएसटी कौन-कौन से टैक्स खत्म करेगा?

जवाबः जीएसटी लागू होने के बाद सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी, एडीशनल एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स, एडीशनल कस्टम ड्यूटी (सीवीडी), स्पेशल एडिशनल ड्यूटी ऑफ कस्टम (एसएडी), वैट/सेल्स टैक्स, सेंट्रल सेल्स टैक्स, मनोरंजन टैक्स, ऑक्ट्रॉय एंडी एंट्री टैक्स, परचेज टैक्स, लक्जरी टैक्स खत्म हो जाएंगे।

सवालः तो क्या जीएसटी में कोई टैक्स नहीं लगेगा?

जवाबः जीएसटी लागू होने के बाद वस्तुओं एवं सेवाओं पर केवल तीन टैक्स वसूले जाएंगे पहला सीजीएसटी यानी सेंट्रल जीएसटी जो केंद्र सरकार वसूलेगी। दूसरा एसजीएसटी यानी स्टेट जीएसटी जो राज्य सरकार अपने यहां होने वाले कारोबार पर वसूलेगी। कोई कारोबार अगर दो राज्यों के बीच होगा तो उस पर आईजीएसटी यानी इंटीग्रेटेड जीएसटी वसूला जाएगा। इसे केंद्र सरकार वसूल करेगी और उसे दोनों राज्यों में समान अनुपात में बांट दिया जएगा।

सवालः जीएसटी के क्या फायदा होगा?

जवाबः आज एक ही चीज अलग-अलग राज्य में अलग-अलग दाम पर बिकती है। इसकी वजह है कि अलग-अलग राज्यों में उसपर लगने वाले टैक्सों की संख्या और दर अलग-अलग होती है। अब ये नहीं होगा। हर चीज पर जहां उसका निर्माण हो रहा है, वहीं जीएसटी वसूल लिया जाएगा और उसके बाद उसके लिए आगे कोई चुंगी पर, बिक्री पर या अन्य कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा। इससे पूरे देश में वो चीज एक ही दाम पर मिलेगी। कई राज्यों में टैक्स की दर बहुत ज्यादा है। ऐसे राज्यों में वो चीजें सस्ती होंगी।

सवालः क्या पेट्रोल और शराब पर भी लागू होगा फैसला?

जवाबः पेट्रोल-डीजल की कीमतें आज अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग हैं। यही हाल शराब का है। जीएसटी लागू होने के बाद भी फिलहाल ऐसा जारी रहेगा। क्योंकि राज्यों की डिमांड पर केंद्र सरकार शराब को जीएसटी से बाहर रखने पर राजी हो गई है जबकि पेट्रो पदार्थों पर उसने निर्णय लिया है कि ये रहेंगे तो जीएसटी के अंदर लेकिन इनपर राज्य पहले की तरह ही टैक्स वसूलते रहेंगे। यानी पेट्रोल, डीजल और एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में राज्यों में जो अंतर देखने को मिलता है वो मिलता रहेगा।

सवालः जीएसटी पर राज्यों के हाथ से तमाम टैक्स फिसलेंगे उनकी टैक्स भरपाई कौन करेगा?

जवाबः जीएसटी लागू होने से केंद्र सरकार, कारोबारी, दुकानदार व उपभोक्ता सबको तकरीबन फायदा होगा। हालांकि राज्यों को इससे कुछ नुकसान झेलना पड़ सकता है लेकिन उनको जितना नुकसान होगा तीन साल तक उसकी भरपाई केंद्र सरकार करेगी। चौथे साल 75 फीसदी और पांचवें साल 50 फीसदी नुकसान की भरपाई केंद्र सरकार करेगी। केंद्र सरकार राज्यों को भरपाई की गारंटी देने के लिए इसके लिए संविधान में भी व्यवस्था करने पर भी तैयार हो गई है।

सवालः जीएसटी से सरकार को क्या फायदा होगा?

जवाबः जीएसटी लागू होने के बाद देश की जीडीपी ग्रोथ में तकरीबन दो फीसदी तक का उछाल आने का अनुमान है। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि टैक्स की चोरी रुकेगी क्योंकि अभी टैक्स कई स्तरों पर वसूला जाता है इससे हेराफेरी की, धांधली की गुजाइश ज्यादा रहती है। जीएसटी के चलते टैक्स जमा करना जब सुविधापूर्ण और आसान होगा तो ज्यादा से ज्यादा कारोबारी टैक्स भरने में रुचि दिखाएंगे। इससे सरकार की आय बढ़ेगी। व्यापारियों को भी जब अलग-अलग टैक्सों के झंझट से मुक्ति मिलेगी तो वे भी अपना व्यापार सही से कर पाएंगे। टैक्स को लेकर विवाद भी कम होंगे। अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।

सवालः कैसे वसूला जाएगा जीएसटी?

जवाबः जीएसटी की वसूली ऑनलाइन होगी। वस्तु के मैनुफैक्चरिंग के स्तर पर ही इसे वसूल लिया जाएगा। किसी वस्तु का टैक्स जमा होते ही जीएसटी के सभी सेंटरों पर इस बाबत जानकारी पहुंच जाएगी। उसके बाद उस वस्तु पर आपूर्तिकर्ता, दुकानदार या ग्राहक को आगे कोई टैक्स नहीं देना होगा। अगर माल एक राज्य से दूसरे राज्य जा रहा है तो उसपर चुंगी भी नहीं लगेगा। यानी बॉर्डर पर ट्रकों की जो लंबी कतारें अभी दिखती हैं वे गायब हो जाएंगी।

सवालः जीएसटी की दर कौन तय करेगा?

जवाबः जीएसटी संबंधित फैसले लेने के लिए संवैधानिक संस्था जीएसटी काउंसिल का गठन किया जाएगा। जीएसटी काउंसिल में केंद्र व राज्य दोनों के प्रतिनिधि होंगे। इसके मुखिया केंद्रीय वित्त मंत्री होंगे जबकि राज्यों के वित्त मंत्री सदस्य होंगे। जीएसटी काउंसिल जीएसटी की दर, टैक्स में छूट, टैक्स विवाद, टैक्स दायरे व अन्य व्यवस्थाओं पर सिफारिशें देगी।

सवालः जीएसटी इतना फायदेमंद तो अब तक क्यों अटका हुआ था?

जवाबः जीएसटी को लेकर राज्य सरकारें नुकसान की भरपाई पर अड़ी थीं और तमाम कोशिशों के बावजूद इसका कोई सर्वमान्य फॉर्मूला नहीं निकाला जा सका। अब सरकार ने राज्यों को नुकसान भरपाई का जो फॉर्मूला सुझाया है उसपर राज्यों ने सहमति दी है। केंद्र में मजबूत सरकार और तमाम राज्यों में बीजेपी की सरकार आने से भी स्थिति आसान हुई है।

Wednesday, April 15, 2015

नेट न्यूट्रलिटी का घनचक्कर

.... तो महंगा हो जाएगा व्हाट्‍सएप-फेसबुक चलाना...

मोबाइल पर व्हाट्‍सएप और फेसबुक चलाने वालों को झटका लग सकता है। टेलीकॉम कंपनियां अब इन पर उपभोक्ताओं की जेब पर है। टेलीकॉम कंपनियां ऐसे एप के उपयोग  का ज्यादा पैसा ले सकती हैं, जिसका यूजर्स ज्यादा उपयोग करते हों। अभी फेसबुक और  व्हाट्‍सएप फ्री एप हैं। हो सकता है इन एप्स को चलाने के लिए आपको अलग से डेटा पैक लेना पड़े। यह पूरा मामला नेट न्यूट्रलिटी से जुड़ा है, जो इन दिनों चर्चाओं में है।
क्या है नेट न्यूट्रलिटी :  नेट न्‍यूट्रलिटी को हिन्दी में हम ‘इंटरनेट निरपेक्षता’ या  तटस्‍थता भी कह सकते हैं। मोटे तौर पर यह इंटरनेट की आजादी या बिना किसी  भेदभाव के इंटरनेट तक पहुंच की स्‍वतंत्रता का मामला है।
नेट न्‍यूट्रलिटी या इंटरनेट निरपेक्षता का सिद्धांत यही है कि इंटरनेट सेवा प्रदाता या  सरकार इंटरनेट पर उपलब्‍ध सभी तरह के डेटा को समान रूप से ले। इसके लिए समान  रूप से शुल्‍क हो। इस शब्‍द का सबसे पहले इस्‍तेमाल कोलंबिया विश्‍वविद्यालय में प्रोफेसर टिम वू ने किया था। इसे नेटवर्क तटस्‍थता, इंटरनेट न्‍यूट्रलिटी तथा नेट समानता भी  कहा जाता है।
क्यों उठा ये सारा मामला..
एयरटेल ने हाल ही में मुफ्त इंटरनेट प्लान 'एयरटेल जीरो' लांच किया था। इसे लेकर  विवाद था। इस प्लान के जरिए ग्राहक कई एप्लीकेशन्स को बिना किसी डेटा चार्ज के ही प्रयोग कर सकेंगे, लेकिन ग्राहक केवल उसी वेबसाइट को ब्राउज या डाउनलोड कर सकेंगे  जो एयरटेल के साथ रजिस्टर्ड होंगी। फ्लिपकार्ट ने इसके लिए एयरटेल के साथ करार  किया था। इस करार के अंतर्गत एयरटेल ग्राहकों को फ्लिपकार्ट के दूसरे चुनिंदा एप्स  मुफ्‍त प्रयोग की सुविधा थी।
इसका पैसा ग्राहक से नहीं बल्कि कंपनी से लिया जाता। करार के बाद 51 हजार लोगों  ने एप की रेटिंग 1 की और हजारों ने डिलीट कर दिया। 3 लाख से ज्यादा लोगों ने 3  दिन में ट्राई को ई-मेल भेजा। फ्लिपकार्ट ने करार यह कहते हुए तोड़ दिया कि वह नेट  न्यूट्रलिटी को समर्थन देती है और गहराई से देखा जाए तो यह नेट न्यूट्रलिटी के खिलाफ  है।

तो लेना पड़ेंगे, व्हाट्‍सएप- फेसबुक के लिए डेटा पैक..
लेना पड़ेंगे अलग से प्लान :   इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि डीटीएच  कंपनिया कुछ चैनल फ्री देती हैं और बाकी चैनल के लिए आपको पैक लेना पड़ता है।  जैसे स्पोर्ट्‍स के लिए अलग पैक। अब अगर आपको क्रिकेट देखना है तो यह लेना पड़ेगा  चाहे कंपनी उसका कितना भी चार्ज क्यों न ले। इसी तरह से इंटरनेट में भी हो जाएगा।  कुछ एप फ्री होंगे और कुछ के आपको पैसे चुकाने पड़ेंगे।
व्हाट्‍सएप- फेसबुक के लिए लेना पड़ेंगे पैक : ‍डीटीएच की तरह आपको फेसबुक और  व्हाट्‍सएप के लिए अलग- अलग डेटा पैक लेना पड़ें। अगर ऐसा नहीं हुआ तो टेलीकॉम  कंपनियां यूजर्स की संख्या बताकर इन कंपनियों से पैसे वसूल करे। अगर एप कंपनियां  भी टेलीकॉम कंपनियों को पैसा नहीं देंगी तो हो सकता है उनके लिए इंटरनेट की स्पीड  धीमी हो। स्काइप, वाइबर, चैट ऑन, इंस्टाग्राम, हाइक, वीचैट, ई-कॉमर्स साइट्स  (अमेजन, फ्लिपकार्ट, स्नेपडील), फेसबुक मैसेंजर, ओला, ब्लैकबैरी मैसेनजर, ऑनलाइन वीडियो  गेम्स सबके लिए आपको अलग से इंटरनेट प्लान लेना होगा।

किसका होगा फायदा : नेट न्यूट्रेलिटी में आप अगर किसी साइट पर वीडियो या कंटेंट एक्सेस कर रहे हैं और अगर वह साइट आपकी सर्विस प्रदाता कंपनी से रजिस्टर्ड नहीं है तो आपको धीमी स्पीड मिलेगी। ऐसे में आपकी इंटरनेट की स्वतंत्रता छिन जाएगी क्योंकि आप स्वतंत्र रूप से इंटरनेट इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। आप अगर दूसरी साइट को तेजी से इस्तेमाल करना चाहेंगे तो आपको उसके लिए अलग से डाटा पैक खरीदना होगा। इससे टेलीकॉम कंपनियों का फायदा ही फायदा होगा और आपको इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए मोटी रकम चुकानी होगी।

सरकार का रुख : सरकार ने इस पूरे मामले पर एक कमेटी का गठन किया है जो अगले महीने सरकार को रिपोर्ट सौंपेगी। ट्राई भी इसके लिए दिशा-निर्देश की बना रहा है। सभी  पक्षों से 24 अप्रैल तक रिपोर्ट मांगी गई है। टेलीकॉम कंपनियों को 8 मई तक का समय दिया गया है। इसके बाद ही इस पर फैसला होगा।

Tuesday, April 14, 2015

अग्निशमन सेवा दिवस...

अग्निशमन सेवा दिवस...
तेज उठती लपटें और उनके बीच किसी के उजड़ते आशियाने को बचाने की मंशा फायरकर्मियों में देखने को मिलती है। वे हर दिन आग से खेलने का काम करते हैं। इस खतरनाक काम को अंजाम देते हुए उन्हें अपनी जान की भी फिक्र नहीं होती। फिक्र होती है तो उन्हें सिर्फ उस जलते मंजर या फिर उसमें धधकती जिंदगी को बचाने की। आग लगने वाली जगहों पर फायरमैन सिर्फ एक फोन कॉल पर दौड़ पड़ते हैं।
दूसरों के हिस्से की तपन को झेलते हुए जनता की रक्षा व सुरक्षा के लिए कृत संकल्पित इस जांबाज फायरमैन दल के लिए अग्निशमन दिवस महज कौशल प्रदर्शन का मंच नहीं है, वरन ये स्मृति दिवस है उन 66 अग्निशमन कर्मचारियों की शहादत का, जिन्होंने जनसेवा करते हुए सहर्ष मृत्यु का वरण किया।
वह14 अप्रैल 1944 का एक धधकता शुक्रवार था,जब विक्टोरिया डाक बंबई में सेना की विस्फोट सामग्री से भरा पानी का जहाज लपटों के आगोश में समा गया। आग पर काबू पाने के लिए बंबई फायर सर्विस के एक सैकड़ा अधिकारी व कर्मचारी घटनास्थल पर भेजे गए।
अटूट साहस और पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए इन जांबाज अग्निशमन कर्मचारियों ने धधकती ज्वाला पर काबू करने का भरसक प्रयत्न किया। आग पर नियंत्रण तो पा लिया गया,लेकिन इस कोशिश में 66फायरमैन को अपनी जान की आहूति देनी पड़ी।
उन्हीं 66शहीद अग्निशमन कर्मचारियों को श्रद्धांजलि देने के लिए अग्निशमन सेवा दिवस मनाया जाता है।
इस दिवस के विभिन्न आयोजन पूरे सप्ताह भर चलते हैं। सप्ताह के दौरान फायर ब्रिगेड द्वारा विभिन्न कारखानों, शैक्षणिक संस्थाओं,ऑइल डिपो आदि जगहों पर अग्नि से बचाव संबंधी प्रशिक्षण दिया जाता है।

अग्निशमन सप्ताह के अंतर्गत नागरिकों को अग्नि से बचाव तथा सावधानी बरतने के संबंध जागृत करने के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते है। इसका उद्देश्य अग्निकांडों से होने वाली क्षति के प्रति नागरिकों को जागरूक करना होता है।

Wednesday, December 24, 2014

भारत रत्न को क्या-क्या मिलता है?

भारत रत्न को क्या-क्या मिलता है?
भारत रत्न पाने वालों को भारत सरकार की ओर से सिर्फ़ एक प्रमाणपत्र और एक तमगा मिलता है। इस सम्मान के साथ कोई रकम नहीं दी जाती। इसे पाने वालों को सरकारी महकमे सुविधाएं मुहैया कराते हैं। उदाहरण के तौर पर भारत रत्न पाने वालों को रेलवे की ओर से मुफ्त यात्रा की सुविधा मिलती है।
भारत रत्न पाने वालों को अहम सरकारी कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए न्यौता मिलता है। सरकार वॉरंट ऑफ़ प्रिसिडेंस में उन्हें जगह देती है। जिन्हें भारत रत्न मिलता है,उन्हें प्रोटोकॉल में राष्ट्रपति,उपराष्ट्रपति,प्रधानमंत्री,राज्यपाल,पूर्व राष्ट्रपति,उपप्रधानमंत्री,मुख्य न्यायाधीश,लोकसभा स्पीकर,कैबिनेट मंत्री,मुख्यमंत्री,पूर्व प्रधानमंत्री और संसद के दोनों सदनों में विपक्ष के नेता के बाद जगह मिलती है।
क्या सुविधाएं मिलती है?
वॉरंट ऑफ़ प्रिसिडेंस का इस्तेमाल सरकारी कार्यक्रमों में वरीयता देने के लिए होता है। राज्य सरकारें भारत रत्न पाने वाली हस्तियों को अपने राज्यों में सुविधाएं उपलब्ध कराती हैं। मसलन दिल्ली सरकार डीटीसी बसों में उन्हें मुफ़्त सफ़र करने की सुविधा देती है।
ये पुरस्कार पाने वाले अपने विज़िटिंग कार्ड पर यह लिख सकते हैं, 'राष्ट्रपति द्वारा भारत रत्न से सम्मानित'या'भारत रत्न प्राप्तकर्ता'। सबसे पहला भारत रत्न सी राजागोपालाचारी को दिया गया था। 25 दिसंबर को अटल बिहारी बाजपेयी और मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न का सम्मान दिया जाएगा।
कैसा होता है भारत रत्न
भारत रत्न एक तांबे के बने पीपल के पत्ते जैसा होता है,जो59 मिमी. लंबा, 48मिमी. चौड़ा और 3.मिमी. मोटा होता है। इसमें सामने की तरफ प्लेटिनम से सूरज का चित्र बना होता है। पूरे रत्न की किनारी को प्लेटिनम से बनाया जाता है। भारत रत्न के सामने की तरफ सूरज के चिह्न के साथ हिन्दी में 'भारत रत्न'लिखा होता है। इसके पीछे की तरफ अशोक स्तम्भ का चिह्न बना होता है और साथ में'सत्यमेव जयते'लिखा होता है।
इसके साथ ही एक सफेद रंग का रिबन भी लगा होता है,ताकि इसे आसानी से गले में पहना जा सके।1954 में भारत रत्न35 मिमी. का एक गोल सोने का मेडल था,जिस पर चमकते सूरज के चिह्न के साथ'भारत रत्न'लिखा होता था और पीछे की तरफ अशोक स्तंभ के साथ'सत्यमेव जयते'लिखा होता था। हालांकि,इसके साल भर बाद ही इसका डिजाइन बदल दिया गया था।
यह उपाधि दिसंबर2011 से पहले तक सिर्फ कला,साहित्य,विज्ञान और समाज सेवा में कार्य करने वाले लोगों को दिया जाता था,लेकिन दिसंबर2011 में इसमें संशोधन किया गया। अब भारत रत्न किसी खास क्षेत्र तक सीमित नहीं है। अब किसी भी क्षेत्र में बिना किसी भेदभाव के एक व्यक्ति को उसके काम के लिए भारत रत्न दिया जा सकता है।
कौन देता है भारत रत्न
किसी भी व्यक्ति को भारत रत्न देश के राष्ट्रपति देते हैं। भारत रत्न किसे देना चाहिए,इसके लिए नाम का प्रस्ताव देश के प्रधानमंत्री देते हैं। एक साल में प्रधानमंत्री अधिक से अधिक तीन लोगों को भारत रत्न देने का प्रस्ताव राष्ट्रपति को दे सकते हैं।

Wednesday, November 5, 2014

दातून के इन फायदों को जानिये


आज कल हर घर में दांत साफ करने के लिए लोग टूथब्रश का इस्तेमाल करने लगे हैं। जबकि दातुन के इतने फायदे हैं जिसे जानकर आप टूथब्रश की बजया दातुन का इस्तेमाल करने लगेंगे। दातुन न सिर्फ आपकी सेहत और बौद्घिक क्षमता के लिए बेहतर है बल्कि दातुन धर्म और अध्यात्म की दृष्टि से भी उत्तम बताया गया है। यही कारण है कि व्रत, त्योहार के दिन बहुत से लोग ब्रश की बजाय दातुन से दांत साफ करते हैं।
धार्मिक दृष्टि से दातुन का महत्व इसलिए बताया गया है कि क्योंकि दातुन जूठा नहीं होता जबकि टुथब्रश आप हर दिन नया नहीं प्रयोग करते। एक ही टूथब्रश को धोकर आप कई बार इस्तेमाल करते हैं। इससे ब्रश शुद्घ और पवित्र नहीं रह जाता है। इसलिए व्रत और त्योहार के दिन ब्रश करना शास्त्रों की दृष्टि से उचित नहीं है। जबकि आयुर्वेद के अनुसार दातुन करने का फायदा चौंकाने वाला है।
1 - 
आयुर्वेद में बताया गया है कि दातुन सिर्फ आपके दांतों को ही चमकाता नहीं है बल्कि यह आपकी बौद्घिक क्षमता और स्मरण शक्ति को भी बढ़ता है। जो लोग अपनी याद्दाश्त बढ़ाना चाहते हैं उन्हें अपामार्ग के दातुन से दांतों का साफ करना चाहिए। इससे बुध ग्रह का दोष भी दूर होता है।

2 - 
मसूड़ों और दांतों की मजबूती के लिए बबूल के दातुन से दांत साफ करना बड़ा ही फायदेमंद होता है। बबूल शनि ग्रह के अशुभ प्रभाव को दूर करता है। इसलिए ज्योतिषशास्त्र में बताया गया है कि शनि दोष से मुक्ति के लिए सुबह शाम बबूल के दातुन से दांत साफ करें।

3 - 
आयुर्वेद में बताया गया है कि 'निम्बश्च तिक्तके श्रेष्ठः'। नीम का दातुन दांतों को ही स्वस्थ नहीं रखता बल्कि इससे पाचन क्रिया और चेहरे पर भी निखार आता है। यही कारण है कि आज भी गांवों में बहुत से लोगों नियमित नीम की दातुन इस्तेमाल करते हैं।

4 - 
आयुर्वेद में बताया गया है कि बेर के दातुन से नियमित दांत साफ करें तो आवज साफ और मधुर हो जाती है 'बदर्या मधुरः स्वरः'। इसलिए जो लोग वाणी से संबंधित क्षेत्रों में करियर बनाने की सोच रहे हैं या इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। यानी अपनी आवाज का कैरियर के तौर पर इस्तेमाल करना चाहते हैं उन्हें बेर के दातुन का नियमित इस्तेमाल करना चाहिए।

5 -
मार्कण्डेय पुराण में बताया गया है कि 'प्रक्षाल्य भक्षयेत् पूर्वं प्रक्षाल्यैव तु तत्त्यजेत' यानी दातुन करने से पहले और दातून करने के बाद इसे पानी से धो लेना चाहिए। कारण यह है कि बिना धोए दातुन करने से दातुन पर बैठे हानिकारक कीटों से नुकसान हो सकता है। जबकि दातुन करने के बाद इसलिए धोकर फेंकना चाहिए क्योंकि सुबह मुख विषैला होता है इससे इस्तेमाल किए दातून के संपर्क में आने से दूसरे जीवों को नुकसान हो सकता है।

Monday, October 20, 2014

चीन की दीवाली, भारत का दीवाला

चीन की दीवाली, भारत का दीवाला

इस सप्ताह जब आप दीवाली की खरीदारी के लिए बाजार जाएँ तो ज़रा इस स्थिति पर गंभीरता और बारीकी से गौर करें कि क्या आप वही दीवाली मना रहे हैं जो दीवाली मनाने की परंपरा थी? शायद नहीं. आज के दौर में नई दीपावली को चीनी ओद्योगिक तंत्र ने पूरी तरह से बदल दिया है. दीया, झालर, पटाखे, खिलौने, मोमबत्तियां, लाइटिंग, लक्ष्मी जी की मूर्तियाँ आदि से लेकर त्यौहारी कपड़ों तक सभी कुछ चीन हमारे बाजारों में उतार चुका है और हम इन्हें खरीदकर दीवाली के दिन भारत की अर्थव्यवस्था का दीवाला निकाल रहे हैं. ये हालात तब हैं जब चीन का उत्पादन चीन में बनकर भारत आ रहा है किन्तु अब तो स्थिति और अधिक गंभीर हो रही है. गत सप्ताह हमारे प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने अपनी चीन यात्रा के दौरान इस करार पर हस्ताक्षर कर दिया है कि भारत में अब एक चाइनीज ओद्योगिक परिसर बनेगा जहां चीनी उद्योग ही लगेंगे जिन्हें सरकार अतिरिक्त छूट और रियायतें प्रदान करेगी.
यदि आप गौर करेंगे तो पायेंगे कि दीपावली के इन चीनी सामानों में निरंतर हो रहे षड्यंत्र पूर्ण नवाचारों से हमारी दीपावली और लक्ष्मी पूजा का स्वरुप ही बदल रहा है. हमारा ठेठ पारम्परिक स्वरुप और पौराणिक मान्यताएं कहीं पीछें छूटती जा रहीं हैं और हम केवल आर्थिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक गुलामी को भी गले लगा रहें हैं. हमारें पटाखों का स्वरुप और आकार बदलनें से हमारी मानसिकता भी बदल रही है और अब बच्चों के हाथ में टिकली फोड़ने का तमंचा नहीं बल्कि माउजर जैसी और ए के ४७ जैसी बंदूकें और पिस्तोलें दिखनें लगी है. हमारा लघु उद्योग तंत्र बेहद बुरी तरह प्रभावित हो रहा है. पारिवारिक आधार पर चलनें वालें कुटीर उद्योग जो दीवाली के महीनों पूर्व से पटाखें, झालरें, दिए, मूर्तियाँ आदि-आदि बनानें लगतें थे वे तबाही और नष्ट हो जाने के कगार पर है. कृषि और कुटीर उत्पादनों पर प्रमुखता से आधारित हमारी अर्थ व्यवस्था पर मंडराते इन घटाटोप चीनी बादलों को न तो हम पहचान रहे हैं ना ही हमारा शासन तंत्र. हमारी सरकार तो लगता है वैश्विक व्यापार के नाम पर अंधत्व की शिकार हो गई है और बेहद तेज गति से भेड़ चाल चल कर एक बड़े विशालकाय नुकसान की और देश को खींचे ले जा रही है.
केवल कुटीर उत्पादक तंत्र ही नहीं बल्कि छोटे, मझोले और बड़े तीनों स्तर पर पीढ़ियों से दीवाली की वस्तुओं का व्यवसाय करनेवाला एक बड़ा तंत्र निठल्ला बैठनें को मजबूर हो गया है. लगभग पांच लाख परिवारों की रोजी रोटी को आधार देनेवाला यह त्यौहार अब कुछ आयातकों और बड़े व्यापारियों के मुनाफ़ातंत्र का केंद्र मात्र बन गया है. बाजार के नियम और सूत्र इन आयातकों और निवेशकों के हाथों में केन्द्रित हो जानें से सड़क किनारें पटरी पर दुकानें लगानें वाला वर्ग निस्सहाय होकर नष्ट-भ्रष्ट हो जानें को मजबूर है. यद्दपि उद्योगों से जुड़ी संस्थाएं जैसे-भारतीय उद्योग परिसंघ और भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) ने चीनी सामान के आयात पर गहन शोध एवं अध्ययन किया और सरकार को चेताया है तथापि इससे सरकार चैतन्य हुई है इसके प्रमाण नहीं दिखई देते हैं.
आश्चर्य जनक रूप से चीन में महंगा बिकने वाला सामान जब भारत आकर सस्ता बिकता है तो इसके पीछे सामान्य बुद्धि को भी किसी षड्यंत्र का आभास होनें लगता है किन्तु सवा सौ करोड़ की प्रतिनिधि भारतीय सरकार को नहीं हो रहा है. सस्ते चीनी माल के भारतीय बाजार पर आक्रमण से चिन्ता व्यक्त करते हुए एक अध्ययन में भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) ने कहा है, "चीनी माल न केवल घटिया है, अपितु चीन सरकार ने कई प्रकार की सब्सिडी देकर इसे सस्ता बना दिया है, जिसे नेपाल के रास्ते भारत में भेजा जा रहा है, यह अध्ययन प्रस्तुत करते हुए फिक्की के अध्यक्ष श्री जी.पी. गोयनका ने कहा था, "चीन द्वारा अपना सस्ता और घटिया माल भारतीय बाजार में झोंक देने से भारतीय उद्योग को भारी नुकसान हो रहा है. भारत और नेपाल व्यापार समझौते का चीन अनुचित लाभ उठा रहा है.'
चीन द्वारा नेपाल के रास्ते और भारत के विभिन्न बंदरगाहों से भारत में घड़ियां, कैलकुलेटर, वाकमैन, सीडी, कैसेट, सीडी प्लेयर, ट्रांजिस्टर, टेपरिकार्डर, टेलीफोन, इमरजेंसी लाइट, स्टीरियो, बैटरी सेल, खिलौने, साइकिलें, ताले, छाते, स्टेशनरी, गुब्बारे, टायर, कृत्रिम रेशे, रसायन, खाद्य तेल आदि धड़ल्ले से बेचें जा रहें हैं. दीपावली पर चीनी आतिशबाजी और बल्बों की चीनी लड़ियों से बाजार पटा दिखता है. पटाखे और आतिशबाजी जैसी प्रतिबंधित चीजें भी विदेशों से आयात होकर आ रही हैं, यह आश्चर्य किन्तु पीड़ा जनक और चिंता जनक है. आठ रुपए में साठ चीनी पटाखों का पैकेट चालीस रुपए तक में बिक रहा है, सौ सवा सौ रूपये घातक प्लास्टिक नुमा कपड़ें से बनें लेडिज सूट, बीस रूपये में झालरें-स्टीकर और पड़ चिन्ह पंद्रह रुपए में घड़ी, पच्चीस रुपए में कैलकुलेटर, डेढ़-दो रुपए में बैटरी सेल बिक रहें हैं. घातक सामग्री और जहरीले प्लास्टिक से बनी सामग्री एक बड़ा षड्यंत्र नहीं तो और क्या है?
तिरुपति से लेकर रामेश्वरम तक की सड़क मार्ग की यात्रा में निर्धनता और अशिक्षा भरे वातावरण में इस उद्योग ने जो जीवन शलाका प्रज्ज्वलित कर रखी है वह एक प्रेरणास्पद कथा है. लगभग बीस लाख लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार और सामाजिक सम्मान देनें वाला शिवाकाशी का पटाखा उद्योग केवल धन अर्जित नहीं करता-कराता है बल्कि इसनें दक्षिण भारतीयों के करोड़ों लोगों को एक सांस्कृतिक सूत्र में भी बाँध रखा है. परस्पर सामंजस्य और सहयोग से चलनें वाला यह उद्योग सहकारिता की नई परिभाषा गढ़नें की ओर अग्रसर होकर वैसी ही कहानी को जन्म देनें वाला था जैसी कहानी मुंबई के भोजन डिब्बे वालों ने लिख डाली है; किन्तु इसके पूर्व ही चीनी ड्रेगन इस समूचे उद्योग को लीलता और समाप्त करता नजर आ रहा है. यदि घटिया और नुकसानदेह सामग्री से बनें इन चीनी पटाखों का भारतीय बाजारों में प्रवेश नहीं रुका तो शिवाकाशी पटाखा उद्योग इतिहास का अध्याय मात्र बन कर रह जाएगा.
भारत में २००० करोड़ रूपये से अधिक का चीनी सामान तस्करी से नेपाल के रास्तें आता है इसमें से दीपावली पर बिकनें वाला सामान की हिस्सेदारी लगभग ३५० करोड़ रु. की है. इतनें बड़े व्यवसाय पर प्रत्यक्ष कर निदेशालय की नजर न पड़ना और वित्त, विदेश, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालयों का आँखें बंद किये रहना सिद्ध हमारी शुतुरमुर्गी प्रवृत्तियों और इतिहास से सबक न लेनें की और गंभीर इशारा करता है. विभिन्न भारतीय लघु एवं कुटीर उद्योगों के संघ और प्रतिनिधि मंडल भारतीय नीति निर्धारकों का ध्यान इस ओर समय समय पर आकृष्ट करतें रहें है. दुखद है कि विभिन्न सामरिक विषयों पर हमारी सप्रंग सरकार और इसके मुखिया मनमोहन सिंह चीन के समक्ष बिलकुल भी प्रभावी नहीं रहें हैं और विभिन्न मोर्चों पर चीन के समक्ष सुरक्षात्मक ही नजर आतें रहें हैं तब इस शासन से कुछ बड़ी आशाएं व्यर्थ ही हैं किन्तु फिर भी इस दीवाली के अवसर पर यदि शासन तंत्र अवैध रूप से भारतीय बाजारों में घुस आये सामानों पर और इस व्यवसाय के सूत्रधारों पर कार्यवाही करे तो ही शुभ-लाभ होगा.
(कहीं से प्रप्त हुआ है ये लेख, नाम नहीं मालूम, जागरूकता फैलाने के मकसद से पोस्ट कर रहा हूं...  )

Wednesday, July 30, 2014

बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE)

बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE)
बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज दुनिया का सबसे पुराना स्टॉक एक्सचेंज है। इसमें करीब 6000 स्टॉक्स लिस्टेड है, जिसमें 30 स्टॉक हैं। सेंसेक्स में शामिल शेयरों में बाजार पूँजी और ट्रेडिंग वॉल्यूम के मुताबिक बदलाव होता रहता है। बीएसई के शेयरों को A, B1, B2, C, F  और Z ग्रुप में बाँटा गया है। ए ग्रुप के शेयर वे हैं जिन्हें कैरी फारवर्ड सिस्टम यानी बदला में शामिल किया गया है। जेड ग्रुप के शेयर ब्लैक लिस्टेड कंपनियों के हैं। एफ ग्रुप फिक्स इन्कम सिक्यूरिटीज यानी डेट मार्केट का प्रतिनिध्व करता है।
सेंसेक्स की तरह बीएसई के कुछ और भी इंडेक्स हैं -----       
= BSE PSU
= BSE MIDCAP
=BSE SMALL CAP
=BSE BANKEX
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE)
1992 में जब हर्षद मेहता घोटाला सामने आया तो बाजार में उथल-पुथल हुई और हजारों निवेशक डूब गये । तब सरकार को एक ऐसे स्टॉक एक्सचेंज की जरूरत हुई जो इन खामियों को दूर करे और पारदर्शी हो । इसी को देखते हुए 1992 में एनएसई की स्थापना हुई और इसे अप्रैल 1993 में स्टॉक एक्सचेंज का दर्जा मिला। जून 1994 में इस पर होल सेल डेट मार्केट में कारोबार शुरू हुआ । नवंबर 1994 में कैपिटल मार्केट सेगमेंट में भी कारोबार शुरू हो गया। जून 2000 में इस पर फ्यूचर एंड ऑपशंस में ट्रेडिंग शुरू हो गई ।
एनएसई में करीब 1500 कंपनियों के शेयर लिस्टेड हैं। एनएसई का प्राइमरी इंडेक्स S & P CN NIFTY शेयर है। एनएसई के ट्रेडिंग सिस्टम को नीट (NEAT) कहते हैं, जिसे नेशनल एक्सचेंज फॉर ऑटोमेटेड ट्रेडिंग ( National Exchange for Automated Treading) कहते हैं।
रोलिंग सेटलमेंट साइकल –  इसमें हर ट्रेडिंग दिन को ट्रेडिंग पीरियड की तरह लिया जाता है और दिन हुए सौदों को टी+ 2 के आधार पर निपटाया जाता है। जैसे कि आज कोई सौदा हुआ है तो परसों उसका सैटलमेंट हो जायेगा । जैसे सोमवार को शेयर बेचे हैं तो बुधवार को उसके एकाउंट में पैसे जमा हो जायेंगे। इसी तरह किसी ने सोमवार को शेयर खरीदे हैं तो बुधवार को उसके डीमैट खातों में शेयरों की डिलीवरी हो जायेगी। इसमें छुट्टी का दिन शामिल नहीं किया जाता। BSE के लिए सोमवार से शुक्रवार और NSE के लिए बुधवार से मंगलवार सैटलमेंट सत्र होता है।
इंडेक्स(Index) – यह बाजार के दिशा का सूचक है। जो यह बताता है कि बाजार किस तरफ जा रहा है। बीएसई का सेंसेक्स और एनएसई का निफ्टी ही दो बड़े इंडेक्स हैं।
प्राइमरी मार्केट – जब कोई कंपनी अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए नये शेयर या डिबेंचर जारी करके सीधे निवेशकों से पैसा उगाही करती है तो इसे कहते हैं कि कंपनी प्राइमरी मार्केट से पैसा उगाह रही है।
सेकेंड्री मार्केट – आईपीओ (IPO) के बाद भी कोई कंपनी नये शेयर जारी करके प्राइमरी मार्केट से पैसा उठा सकती है । जब कोई कंपनी एक बार प्राइमरी मार्केट में IPO इश्यू करती है तो कंपनी लिस्टेड हो जाती है । फिर उसी खरीद-फरोख्त को सेकेंड्री मार्केट कहते हैं।
Remark – प्राइमरी मार्केट में कंपनी अपने शेयर सीधे निवेशकों को बेचती है जबकि सेकेंड्री मार्केट में स्टॉक एक्सचेंज के माध्यम से शेयर बेचती है।
बाय टुडे सैल टुमारो – आज खरीदा है तो आप उसे अपनी इच्छा के मुताबिक डिलीवरी मिलने के बाद कभी भी बेच सकते हैं।
इंट्रा डे – खरीदी और बिक्री उसी दिन करनी होती है। 
राइट्स इश्यू – यह शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनी के लिए अतिरिक्त पूँजी जुटाने के जरिया है। राइट्स इश्यू के तहत कंपनी आम निवेशकों के बजाय सिर्फ अपने शेयर धारकों को कंपनी अपने नये शेयर खरीदने का अधिकार देती है । शेयर धारकों के पास कंपनी के जितने शेयर होते हैं उसी अनुपात में उन्हें शेयर जारी किये जाते हैं।
डुअल लिस्टिंग – उस प्रक्रिया को कहते हैं, जिसके तहत कोई कंपनी दो अलग – अलग देशों के स्टॉक एक्सचोजों में खुद को सूचीबद्ध कराती है । जब दो देशों की दो कंपनियों के बीच कारोबार को लेकर समझौता होता है तो डुअल लिस्टिंग के जरिये दोनो ही देशों में इन कंपनियों के शेयर सूचीबद्ध बने रहते हैं।

वोलैटिलिटी (Voliatility) -  बाजार में पल – पल बदलते हवा के रूख को उठा पटक या वोलैटिलिटी कहा जाता है। यानी शेयर की कीमत में आने वाले बदलाव की दर...