Friday, July 10, 2015

खाली पेट पानी पीने के 10 फायदे ..

खाली पेट पानी पीने के 10 फायदे ..

स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं के लिए हम दवाओं का सेवन करते हैं,और कई उपाय आजमाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं, कि बहुत सी स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान केवल पानी में छुपा हुआ है। सि‍र्फ पानी पीकर आप खुद को स्वस्थ और उर्जावान बनाए रख सकते हैं। जानिए पानी पीने के यह 10 फायदे-

1 -  विषैले तत्व करे बाहर -  भरपूर मात्रा में पानी पीने से, शरीर में मौजूद हानिकारक एवं विषैले तत्व पसीने व मूत्र द्वारा शरीर से बाहर निकल जाते हैं। जिससे विषाणुओं से बचाव होता है, बीमारियां नहीं होती। सुबह के वक्त खाली पेट पानी पीने से शरीर की बेहतर सफाई होती है।

2  पेट संबंधी समस्या-  सुबह उठकर खाली पेट पानी पीने से पेट की सारी समस्याएं खत्म हो जाती हैं।इससे कब्ज में राहत मिलती है, आंतों में जमा मल निकलने में आसानी होती है, जिससे पेट पूरी तरह से साफ होता है, और भूख भी खुलती है।

3  तनाव से राहत- सुबह खाली पेट एवं दिनभर पानी पीते रहने से तनाव नहीं होता, और मानसिक समस्याएं भी ठीक हो जाती हैं। जब आप सोकर उठते हैं, तो दिमाग शांत होता है। ऐसे समय पानी पीना दिमाग को ऑक्सीजन प्रदान कर, उसे तरोजाता बनाए रखता है, जिससे दिमाग सक्रिय रहता है।

4  वजन कम करे-  सुबह के वक्त एकदम ठंडा पानी पीने से आपका मेटाबॉलिज्म 24 प्रतिशत तक बढ़ता है, जिससे वजन आसानी से कम होता है, वहीं गरम पानी पीने से भी अतिरिक्त चर्बी कम होती है, और आपका वजन कम हो जाता है।

5  पेशाब संबंधी समस्याएं-  सुबह खाली पेट पिया जाने वाला पानी, रातभर शरीर में बने हानिकारक तत्वों को एक ही बार में पेशाब के जरिए निकालने का काम करता है, इसके साथ ही समय-समय पर भरपूर मात्र में पानी पीते रहने पर, पेशाब में जलन, यूरि‍न इंफेक्शन एवं अन्य समस्याएं समाप्त हो जाती है।

6  त्वचा बने स्वस्थ- खाली पेट पानी पीने से कोशिकाओं को ऑक्सीजन मिलती है, और वे सक्रिय रहती हैं, जिससे त्वचा पर ताजगी बनी रहती है। इसके साथ ही पसीने द्वारा हानिकारक तत्व शरीर से बाहर निकलने पर, त्वचा अंदर से साफ होती है और उसमें नमी बनी रहती है, जिससे त्वचा स्वस्थ व चमकदार दिखाई देती है।

7  शरीर का तापमान- खाली पेट पानी पीने से दिन की शुरूआत से ही आपके शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है, जिससे छोटी- छोटी बीमारियों से शरीर सुरक्षित रहता है।


8   रोग प्रतिरोधक क्षमता-  पानी शरीर में अवांछित तत्वों को रहने नहीं देता, और शरीर के सभी अंगों को स्वस्थ बनाए रखता है। इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

9   नई कोशि‍का-  पानी रक्त में हानिकारक तत्वों को घुलने नहीं देता, और उसके शुद्धि‍करण में सहायक होता है, जिससे नई कोशि‍काओं और मांसपेशि‍यों के बनने की प्रक्रिया बढ़ जाती है ।

10  नमी बनाए रखे-  सुगमता से कार्य करने के लिए शरीर के अंगों में नमी को होना बेहद आवश्यक है, जिसे बनाए रखने का कार्य पानी करता है। इसलिए दिन की शुरूआत में ही खाली पेट पानी पीना बेहतर होता है, ताकि पूरा दिन शरीर के सभी अंग सुगमता से कार्य कर सकें ।



Friday, June 26, 2015

बोतलबंद पानी से कमा रहे हैं अरबों डॉलर...

बोतलबंद पानी से कमा रहे हैं अरबों डॉलर...
 
प्रकृति ने मनुष्य को मिट्टी, हवा, पानी, रोशनी जैसी जीवनदायी सुविधाएं मुफ्त में दी थी लेकिन बढ़ती जनसंख्या, औद्योगीकरण और बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा हर बुनियादी वस्तु को उत्पाद बनाकर बेचने की प्रवृत्ति के चलते समूचे जीव जंतुओं की यह सम्पदा कारोबारियों और कंपनियों की तिजोरियां भरने का जरिए बन गई है।

इससे जुड़े बहुत सारे तथ्य ऐसे हैं जिन्हें जानकार आपको हैरानी होगी कि बोतलों में ‍बंद कर बेचे जाने वाला पानी कितने बड़े कारोबार का हिस्सा है। यह कारोबार अंतरराष्ट्रीय स्तर से लेकर स्थानीय स्तर तक पहुंच गया है। 

आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि पिछले दशक से कुछ अधिक समय के अंतराल में बोतलबंद पानी की बिक्री नाटकीय तरीके से बढ़ी है और यह कारोबार 100 अरब अमेरिकी डॉलर से भी अधिक राशि का हो गया है। 

वर्ष 1999 से लेकर 2004 तक सारी दुनिया में बिकने वाले बोतलबंद पानी की खपत करीब 118 अरब लीटर से बढ़कर 182 अरब लीटर से अधिक तक हो गई है। 

विकासशील विश्व के बहुत से शहरों में बोतलबंद पानी की खपत बढ़ती जा रही है क्योंकि शहरों का स्थानीय प्रशासन पर्याप्त मात्रा में पानी होने के बावजूद लोगों को समुचित मात्रा में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने में असफल रहा है। इसके परिणाम स्वरूप विकासशील देशों में बोतलबंद पानी का उत्पादन करने वाली कंपनियां बड़े पैमाने पर पैसा कमा रही हैं।

वर्ष 2004 में अमेरिका में बोतलबंद पानी की बिक्री अन्य किसी देश से ज्यादा थी। 30.8 अरब लीटर पानी के लिए 9 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक की राशि चुकाई गई। यह मात्रा इतनी अधिक है कि इससे कंबोडिया की समूची जनसंख्या की पानी की सालाना जरूरतें पूरी हो सकती हैं। 

बोतलबंद पानी की सबसे ज्यादा खपत वाले दस शीर्ष देशों में अमेरिका, मेक्सिको, चीन, ब्राजील, इटली, जर्मनी, फ्रांस, इंडोनेशिया, स्पेन और भारत हैं। 

बोतलबंद पानी का उपयोग करने वालों से जब पूछा जाता है कि वे पानी पर इतना अधिक पैसा क्यों खर्च करते हैं जबकि उन्हें नल का पानी आसानी से मुफ्त में मिल सकता है? उनका कहना है कि वे बोतलबंद पानी को इसलिए वरीयता देते हैं क्योंकि वह अधिक शुद्ध और स्वास्थ्यकर होता है। 

ज्यादातर कंपनियां अपने उत्पाद को यह कहकर बेचती हैं कि वह नल के पानी से ज्यादा सुरक्षित है लेकिन इस मामले में विभिन्न अध्ययनों का कहना है कि बोतलबंद पानी से जुड़े नियम वास्तव में इत‍ने अपर्याप्त हैं कि वे शुद्धता या सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकते हैं। इस मामले में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि वास्तव में बोतलबंद पानी में म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के नल के पानी की तुलना में अधिक बेक्टेरिया हो सकते हैं। 

अमेरिका में जिन मानकों के आधार पर पानी को मापा जाता है उसे अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के द्वारा नियमित किया जाता है़, ये मानक वास्तव में नल के पानी से भी नीचे हैं जिन्हें पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी द्वारा तय किया जाता है। 

पानी भरने के काम में आने वाली ज्यादातर बोतलों को रिसाइकल, फिर से नया बनाया जाता है। इन बोतलों को बनाने में जो पोलीएथलीन टेरेप्थलेट (पीईटी) इस्तेमाल किया जाता है, उसका केवल 20 प्रतिशत हिस्सा ही रिसाइकल किया जा सकता है। इसके अलावा पी‍ईटी उत्पादन प्रक्रिया से हानिकारक रसायन निकलते हैं जिससे वायु की गुणवत्ता पर बुरा असर पड़ता है। 

अनुमानित तौर पर ऐसा माना जाता है कि यूनान में पानी पीने की 1 अरब प्लास्टिक बोतलें प्रति‍वर्ष फेंक दी जाती हैं जोकि वातावरण में प्रतिकूल असर छोड़ती हैं। 

चीन की कम से कम 70 फीसदी नदियां और झीलें प्रदूषित हैं और बोतलबंद पानी की माँग करने वाले ज्यादातर ‍शहरों के निवासी होते हैं क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इतने गरीब हैं कि वे इतना महंगा पानी खरीद कर नहीं पी सकते हैं।

मतलब कहा जा सकता है कि कभी सभी को उपलब्ध साफ पानी अब सर्वसाधारण की संपत्ति नहीं रहा। कैपिटलिज्म के इस जमाने में कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता।

Monday, June 8, 2015

स्टार्ट-अप कम्पनी

स्टार्ट-अप कम्पनी 

यह नई संस्कृति का शब्द है। नयापन, अभिनव, नवोन्मेष और नवाचार से मिलता-जुलता शब्द है स्टार्ट-अप। अंग्रेजी में इसके माने हैं नवोदय या अचानक उदय होना, उगना, आगे बढ़ना वगैरह। इसके कारोबारी माने हैं नए और अनजाने बिजनेस मॉडल की खोज। यानी नए किस्म के कारोबार में जुड़ी नई कम्पनियों को स्टार्ट-अप कम्पनी कहते हैं। भारत में ई-रिटेल और इंटरनेट से जुड़ी ज्यादातर नई कम्पनियाँ स्टार्ट-अप हैं। इनकी तकनीक नई है और मालिक और प्रबंधक भी नए किस्म के हैं। उनका काम करने का तरीका नया है। यह शब्द बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में डॉट-कॉम ‘बूम’ और ‘बबल’ के वक्त ज्यादा लोकप्रिय हुआ। 

सामाजिक दृष्टि से भारत में यह नया चलन है। अमेरिका में बिजनेस प्लान करना, नयी कम्पनी बनाना, उसके मार्फत भारी सफलता पाने का चलन पहले से है। अमेरिका के बिजनेस और इंजीनियरी संस्थानों से निकल कर छात्र कारोबार शुरू करने के बारे में सोचता है। इस चलन के समानांतर एक नई संस्कृति का जन्म हो रहा है, जिसे स्टार्ट-अप कल्चर नाम मिला है। 

भारत में अभी तक नौजवान नौकरी को वरीयता देते हैं। अब स्थितियाँ बदल रहीं हैं। अब तक की समझ है कि कारोबार में जोखिम है। कम उम्र में जोखिम उठाया जा सकता है, यही इस संस्कृति का मूल मंत्र है। माना जा रहा है कि संपन्नता उन्हीं के पास आती है, जो जोखिम उठाते हैं। परम्परागत व्यवसाय की जगह नए कारोबार के आविष्कार में फायदे की गुंजाइश भी ज्यादा है। परम्परागत तरीके से 10 से 15 फीसदी फायदा मिलता है, जबकि नवोन्मेष से 85 फीसदी या उससे भी ज्यादा फायदा मिलता है। 

Friday, June 5, 2015

मैट यानी मिनिमम अल्टरनेटिव टैक्स और उससे जुड़ा विवाद


         इन दिनों मैट को लेकर काफी चर्चा है। यह पिछली बार 1997 में शुरू हुआ था, तब भी
कंपनियों ने इसका खासा विरोध किया था। तब उदारीकरण  केंद्र में संयुक्त मोर्चा सरकार थी। वित्तमंत्री रहते हुए पी. चिदंबरम ने इसे फिर शुरू किया था। जब इसकी घोषणा हुई, तब इसे कोई समझ नहीं पाया था, जबकि यह हमारे देश में 1988 में प्रयोग में लाया जा चुका है। लेकिन लागू होने पर  काफी विरोध हुआ और शेयर बाजार में भी खासी गिरावट आई थी। हालांकि अभी भी एक कमेटी इस पर  विचार के लिए बनाई गई है।

मैट क्या है?
भारत में कंपनी दो प्रकार से आय की गणना करती हैं। कंपनी एक्ट के अनुसार, जिसे ‘बुक प्रॉफिट’ कहा जाता है और इनकम टैक्स एक्ट के अनुसार जिसे ‘टैक्सेबल प्रॉफिट’ कहा जाता है। - कई कंपनियां हजारों करोड़ रु. का बुक प्रॉफिट बताती थीं, और शेयरधारकों को डिविडेन्ड देती थीं। लेकिन इनकम टैक्स में मिली छूटों, कटौतियों एवं भत्तों के कारण अपना टैक्सेबल प्रॅफिट शून्य बता कर टैक्स का भुगतान नहीं करती थीं। इन्हें जीरो टैक्स कंपनी कहा जाता था। जिसका श्रेय ये अपने प्रभावी टैक्स मैनेजमेंट को देती थीं।
   इन कंपनियों को कर भरने के लिए बाध्य करने के लिए सरकार ने वर्ष 1988-89 से मैट लागू कर दिया।

वर्तमान में मैट 20 फीसदी

वर्तमान में प्रत्येक कंपनी को कम से कम अपने बुक प्रॉफिट का 18.5 फीसदी (जो कि अब शिक्षा उपकर और सरचार्ज मिलाकर 20 फीसदी है) मैट का भुगतान करना होगा। यदि किसी कंपनी का बुक प्रॉफिट 1000 करोड़ रु. है और टैक्सेबल प्रॉफिट शून्य है, तो भी कंपनी को 200 करोड़ रु. मैट का भुगतान करना होगा।
- 1990 में मैट खत्म कर दिया गया था, जिसे 1 अप्रैल 1997 से पुन: लागू किया गया। भारत में कई कंपनियां जैसे डाबर, गोदरेज कंज्यूमर, एनटीपीसी, जेएसडब्ल्यू एनर्जी आदि मैट का भुगतान
करती हैं।

ऐसे शुरू हुआ मैट:-
अमेरिका में सरकार ने 1969 में पाया कि उच्च आय वाले 155 परिवार आयकर के रूप में कुछ भी नहीं
देते हैं। इन परिवारों ने आयकर कटौतियों का भरपूर लाभ उठाया, जबकि कई मध्यम व निम्न आय परिवार आयकर का भुगतान कर रहे थे। जिन व्यक्तियों व कॉर्पोरेट करदाताओं की आय पूंजी लाभ पर आधारित थी, वे आयकर की कई कटौतियों का लाभ उठा पाए। जबकि उत्पादन व सेवा क्षेत्र से लगभग उतनी ही आय कमाने वाले व्यक्ति व कॉर्पोरेट करदाताओं को ये टैक्स कटौतियां उपलब्ध नहीं थी, जिसके कारण उन्हें कर का भुगतान करना पड़ा। इन्हीं विसंगतियों को दूर करने के लिए अमेरिकी सरकार ने 1970 से मिनिमम टैक्स लागू किया। केवल 155 परिवारों को 1970 में टैक्स भरने को बाध्य करने के लिए इसे शुरू किया गया। वर्तमान में अमेरिका में 40 लाख करदाता मिनिमम टैक्स देते हैं।

मैट की मांग 
अभी तक मैट उन घरेलू कंपनियों पर लगाया जाता था, जिनका स्थायी कामकाज भारत में है और साथ
ही जो भारतीय कंपनी कानून के अनुसार बहीखाते बनाकर रखती हैं। मैट लागू करने के इतने वर्षों बाद आयकर विभाग ने अचानक मार्च 2015 में एफपीआई को मैट की मांग का नोटिस भेजना शुरू कर दिया। जबकि एफपीआई का न तो भारत में स्थायी कामकाज है, न ही ये कंपनियां भारतीय कंपनी कानून के अनुसार बहीखाते या बुक्स ऑफ अकाउंट्स मैंटेन करती हैं। नोटिस मिलने पर कई एफपीआई ने इस मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया है।

मामला अदालत में

आयकर विभाग द्वारा नोटिस भेजने का कारण था अथॉरिटी फॉर एडवांस रूलिंग्स द्वारा केसलटन इंवेस्टमेंट्स के बारे में वर्ष 2012 में दिया गया आदेश, जिसमें कहा गया था कि केसलटन इंवेस्टमेंट्स को मैट का भुगतान करना चाहिए। यह प्रकरण अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

अथॉरिटी फॉर एडवांस रूलिंग्स की स्थापना
नॉन रेसीडेंट्स के आयकर निर्धारण एवं लंबित मामलों के त्वरित निराकरण के लिए की गई है। वर्ष 2013 में महालेखा परीक्षक ने इस मुद्दे को अपनी रिपोर्ट में उठाया। तब आयकर विभाग ने एफपीआई को मैट मांग का नोटिस भेजना शुरू कर दिया। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि एफपीआई पर 1 अप्रैल 2015 से मैट आरोपित नहीं किया जाएगा। लेकिन आयकर विभाग एफपीआई से पिछले सात साल, यानी 2008-09 से मैट की मांग कर सकता है, जो कि लगभग 40 हजार करोड़ रु. है।

सरकार द्वारा उठाए कदम
 सरकार ने स्पष्ट किया है कि मैट उन देशों के एफपीआई पर लागू नहीं होगा, जिनकी भारत के साथ कर संधि है। इनमें सिंगापुर व मॉरिशस शामिल हैं। भारत में 30 फीसदी विदेशी पोर्टफोलियो निवेश कर संधि वाले देशों से आता है। पिछले सप्ताह सरकार ने निर्देश दिया है कि अब राजस्व विभाग नए मैट की मांग नहीं करेगा। साथ ही अभी तक जारी मैट नोटिस पर कोई कार्यवाही नहीं करेगा, जब तक
कि एपी शाह कमेटी विदेशी निवेशकों पर मैट लागू करने के संबंध में अपनी रिपोर्ट सरकार को पेश नहीं कर देती।
- फैक्ट - भारत में एफपीआई पर अल्पावधि इक्विटी लाभ पर 15 फीसदी, बॉण्ड लाभ पर 5 फीसदी कर लागू है, जबकि लंबी अवधि के पूंजीगत लाभ पर कोई कर नहीं देना होता है। मेट लगने पर इन सभी लाभों पर एफपीआई को 20% कर देना होगा।

Monday, May 11, 2015

क्या है जीएसटी?

GST  टैक्स सुधार के लिए क्रांतिकारी कदम माना जा रहा जीएसटी देश के हर नागरिक को प्रभावित करने वाला है। जानिए जीएसटी से जुड़े हर सवाल का जवाब।

सवालः क्या है जीएसटी?

जवाबः जीएसटी का पूरा नाम है गुड्स एंड सर्विस टैक्स। ये एक अप्रत्यक्ष कर है यानी ऐसा कर जो सीधे-सीधे ग्राहकों से नहीं वसूला जाता लेकिन जिसकी कीमत अंत में ग्राहक की जेब से ही जाती है। अप्रैल 2016 यानी अगले वित्तीय वर्ष से जीएसटी को लागू होना है। इसे आजादी के बाद सबसे बड़ा टैक्स सुधार कदम कहा जा रहा है। जीएसटी लागू होने के बाद दूसरे कई तरह के टैक्स समाप्त हो जाएंगे और उसकी जगह सिर्फ जीएसटी लगेगा।

सवालः जीएसटी कौन-कौन से टैक्स खत्म करेगा?

जवाबः जीएसटी लागू होने के बाद सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी, एडीशनल एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स, एडीशनल कस्टम ड्यूटी (सीवीडी), स्पेशल एडिशनल ड्यूटी ऑफ कस्टम (एसएडी), वैट/सेल्स टैक्स, सेंट्रल सेल्स टैक्स, मनोरंजन टैक्स, ऑक्ट्रॉय एंडी एंट्री टैक्स, परचेज टैक्स, लक्जरी टैक्स खत्म हो जाएंगे।

सवालः तो क्या जीएसटी में कोई टैक्स नहीं लगेगा?

जवाबः जीएसटी लागू होने के बाद वस्तुओं एवं सेवाओं पर केवल तीन टैक्स वसूले जाएंगे पहला सीजीएसटी यानी सेंट्रल जीएसटी जो केंद्र सरकार वसूलेगी। दूसरा एसजीएसटी यानी स्टेट जीएसटी जो राज्य सरकार अपने यहां होने वाले कारोबार पर वसूलेगी। कोई कारोबार अगर दो राज्यों के बीच होगा तो उस पर आईजीएसटी यानी इंटीग्रेटेड जीएसटी वसूला जाएगा। इसे केंद्र सरकार वसूल करेगी और उसे दोनों राज्यों में समान अनुपात में बांट दिया जएगा।

सवालः जीएसटी के क्या फायदा होगा?

जवाबः आज एक ही चीज अलग-अलग राज्य में अलग-अलग दाम पर बिकती है। इसकी वजह है कि अलग-अलग राज्यों में उसपर लगने वाले टैक्सों की संख्या और दर अलग-अलग होती है। अब ये नहीं होगा। हर चीज पर जहां उसका निर्माण हो रहा है, वहीं जीएसटी वसूल लिया जाएगा और उसके बाद उसके लिए आगे कोई चुंगी पर, बिक्री पर या अन्य कोई टैक्स नहीं देना पड़ेगा। इससे पूरे देश में वो चीज एक ही दाम पर मिलेगी। कई राज्यों में टैक्स की दर बहुत ज्यादा है। ऐसे राज्यों में वो चीजें सस्ती होंगी।

सवालः क्या पेट्रोल और शराब पर भी लागू होगा फैसला?

जवाबः पेट्रोल-डीजल की कीमतें आज अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग हैं। यही हाल शराब का है। जीएसटी लागू होने के बाद भी फिलहाल ऐसा जारी रहेगा। क्योंकि राज्यों की डिमांड पर केंद्र सरकार शराब को जीएसटी से बाहर रखने पर राजी हो गई है जबकि पेट्रो पदार्थों पर उसने निर्णय लिया है कि ये रहेंगे तो जीएसटी के अंदर लेकिन इनपर राज्य पहले की तरह ही टैक्स वसूलते रहेंगे। यानी पेट्रोल, डीजल और एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में राज्यों में जो अंतर देखने को मिलता है वो मिलता रहेगा।

सवालः जीएसटी पर राज्यों के हाथ से तमाम टैक्स फिसलेंगे उनकी टैक्स भरपाई कौन करेगा?

जवाबः जीएसटी लागू होने से केंद्र सरकार, कारोबारी, दुकानदार व उपभोक्ता सबको तकरीबन फायदा होगा। हालांकि राज्यों को इससे कुछ नुकसान झेलना पड़ सकता है लेकिन उनको जितना नुकसान होगा तीन साल तक उसकी भरपाई केंद्र सरकार करेगी। चौथे साल 75 फीसदी और पांचवें साल 50 फीसदी नुकसान की भरपाई केंद्र सरकार करेगी। केंद्र सरकार राज्यों को भरपाई की गारंटी देने के लिए इसके लिए संविधान में भी व्यवस्था करने पर भी तैयार हो गई है।

सवालः जीएसटी से सरकार को क्या फायदा होगा?

जवाबः जीएसटी लागू होने के बाद देश की जीडीपी ग्रोथ में तकरीबन दो फीसदी तक का उछाल आने का अनुमान है। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि टैक्स की चोरी रुकेगी क्योंकि अभी टैक्स कई स्तरों पर वसूला जाता है इससे हेराफेरी की, धांधली की गुजाइश ज्यादा रहती है। जीएसटी के चलते टैक्स जमा करना जब सुविधापूर्ण और आसान होगा तो ज्यादा से ज्यादा कारोबारी टैक्स भरने में रुचि दिखाएंगे। इससे सरकार की आय बढ़ेगी। व्यापारियों को भी जब अलग-अलग टैक्सों के झंझट से मुक्ति मिलेगी तो वे भी अपना व्यापार सही से कर पाएंगे। टैक्स को लेकर विवाद भी कम होंगे। अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।

सवालः कैसे वसूला जाएगा जीएसटी?

जवाबः जीएसटी की वसूली ऑनलाइन होगी। वस्तु के मैनुफैक्चरिंग के स्तर पर ही इसे वसूल लिया जाएगा। किसी वस्तु का टैक्स जमा होते ही जीएसटी के सभी सेंटरों पर इस बाबत जानकारी पहुंच जाएगी। उसके बाद उस वस्तु पर आपूर्तिकर्ता, दुकानदार या ग्राहक को आगे कोई टैक्स नहीं देना होगा। अगर माल एक राज्य से दूसरे राज्य जा रहा है तो उसपर चुंगी भी नहीं लगेगा। यानी बॉर्डर पर ट्रकों की जो लंबी कतारें अभी दिखती हैं वे गायब हो जाएंगी।

सवालः जीएसटी की दर कौन तय करेगा?

जवाबः जीएसटी संबंधित फैसले लेने के लिए संवैधानिक संस्था जीएसटी काउंसिल का गठन किया जाएगा। जीएसटी काउंसिल में केंद्र व राज्य दोनों के प्रतिनिधि होंगे। इसके मुखिया केंद्रीय वित्त मंत्री होंगे जबकि राज्यों के वित्त मंत्री सदस्य होंगे। जीएसटी काउंसिल जीएसटी की दर, टैक्स में छूट, टैक्स विवाद, टैक्स दायरे व अन्य व्यवस्थाओं पर सिफारिशें देगी।

सवालः जीएसटी इतना फायदेमंद तो अब तक क्यों अटका हुआ था?

जवाबः जीएसटी को लेकर राज्य सरकारें नुकसान की भरपाई पर अड़ी थीं और तमाम कोशिशों के बावजूद इसका कोई सर्वमान्य फॉर्मूला नहीं निकाला जा सका। अब सरकार ने राज्यों को नुकसान भरपाई का जो फॉर्मूला सुझाया है उसपर राज्यों ने सहमति दी है। केंद्र में मजबूत सरकार और तमाम राज्यों में बीजेपी की सरकार आने से भी स्थिति आसान हुई है।

Wednesday, April 15, 2015

नेट न्यूट्रलिटी का घनचक्कर

.... तो महंगा हो जाएगा व्हाट्‍सएप-फेसबुक चलाना...

मोबाइल पर व्हाट्‍सएप और फेसबुक चलाने वालों को झटका लग सकता है। टेलीकॉम कंपनियां अब इन पर उपभोक्ताओं की जेब पर है। टेलीकॉम कंपनियां ऐसे एप के उपयोग  का ज्यादा पैसा ले सकती हैं, जिसका यूजर्स ज्यादा उपयोग करते हों। अभी फेसबुक और  व्हाट्‍सएप फ्री एप हैं। हो सकता है इन एप्स को चलाने के लिए आपको अलग से डेटा पैक लेना पड़े। यह पूरा मामला नेट न्यूट्रलिटी से जुड़ा है, जो इन दिनों चर्चाओं में है।
क्या है नेट न्यूट्रलिटी :  नेट न्‍यूट्रलिटी को हिन्दी में हम ‘इंटरनेट निरपेक्षता’ या  तटस्‍थता भी कह सकते हैं। मोटे तौर पर यह इंटरनेट की आजादी या बिना किसी  भेदभाव के इंटरनेट तक पहुंच की स्‍वतंत्रता का मामला है।
नेट न्‍यूट्रलिटी या इंटरनेट निरपेक्षता का सिद्धांत यही है कि इंटरनेट सेवा प्रदाता या  सरकार इंटरनेट पर उपलब्‍ध सभी तरह के डेटा को समान रूप से ले। इसके लिए समान  रूप से शुल्‍क हो। इस शब्‍द का सबसे पहले इस्‍तेमाल कोलंबिया विश्‍वविद्यालय में प्रोफेसर टिम वू ने किया था। इसे नेटवर्क तटस्‍थता, इंटरनेट न्‍यूट्रलिटी तथा नेट समानता भी  कहा जाता है।
क्यों उठा ये सारा मामला..
एयरटेल ने हाल ही में मुफ्त इंटरनेट प्लान 'एयरटेल जीरो' लांच किया था। इसे लेकर  विवाद था। इस प्लान के जरिए ग्राहक कई एप्लीकेशन्स को बिना किसी डेटा चार्ज के ही प्रयोग कर सकेंगे, लेकिन ग्राहक केवल उसी वेबसाइट को ब्राउज या डाउनलोड कर सकेंगे  जो एयरटेल के साथ रजिस्टर्ड होंगी। फ्लिपकार्ट ने इसके लिए एयरटेल के साथ करार  किया था। इस करार के अंतर्गत एयरटेल ग्राहकों को फ्लिपकार्ट के दूसरे चुनिंदा एप्स  मुफ्‍त प्रयोग की सुविधा थी।
इसका पैसा ग्राहक से नहीं बल्कि कंपनी से लिया जाता। करार के बाद 51 हजार लोगों  ने एप की रेटिंग 1 की और हजारों ने डिलीट कर दिया। 3 लाख से ज्यादा लोगों ने 3  दिन में ट्राई को ई-मेल भेजा। फ्लिपकार्ट ने करार यह कहते हुए तोड़ दिया कि वह नेट  न्यूट्रलिटी को समर्थन देती है और गहराई से देखा जाए तो यह नेट न्यूट्रलिटी के खिलाफ  है।

तो लेना पड़ेंगे, व्हाट्‍सएप- फेसबुक के लिए डेटा पैक..
लेना पड़ेंगे अलग से प्लान :   इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि डीटीएच  कंपनिया कुछ चैनल फ्री देती हैं और बाकी चैनल के लिए आपको पैक लेना पड़ता है।  जैसे स्पोर्ट्‍स के लिए अलग पैक। अब अगर आपको क्रिकेट देखना है तो यह लेना पड़ेगा  चाहे कंपनी उसका कितना भी चार्ज क्यों न ले। इसी तरह से इंटरनेट में भी हो जाएगा।  कुछ एप फ्री होंगे और कुछ के आपको पैसे चुकाने पड़ेंगे।
व्हाट्‍सएप- फेसबुक के लिए लेना पड़ेंगे पैक : ‍डीटीएच की तरह आपको फेसबुक और  व्हाट्‍सएप के लिए अलग- अलग डेटा पैक लेना पड़ें। अगर ऐसा नहीं हुआ तो टेलीकॉम  कंपनियां यूजर्स की संख्या बताकर इन कंपनियों से पैसे वसूल करे। अगर एप कंपनियां  भी टेलीकॉम कंपनियों को पैसा नहीं देंगी तो हो सकता है उनके लिए इंटरनेट की स्पीड  धीमी हो। स्काइप, वाइबर, चैट ऑन, इंस्टाग्राम, हाइक, वीचैट, ई-कॉमर्स साइट्स  (अमेजन, फ्लिपकार्ट, स्नेपडील), फेसबुक मैसेंजर, ओला, ब्लैकबैरी मैसेनजर, ऑनलाइन वीडियो  गेम्स सबके लिए आपको अलग से इंटरनेट प्लान लेना होगा।

किसका होगा फायदा : नेट न्यूट्रेलिटी में आप अगर किसी साइट पर वीडियो या कंटेंट एक्सेस कर रहे हैं और अगर वह साइट आपकी सर्विस प्रदाता कंपनी से रजिस्टर्ड नहीं है तो आपको धीमी स्पीड मिलेगी। ऐसे में आपकी इंटरनेट की स्वतंत्रता छिन जाएगी क्योंकि आप स्वतंत्र रूप से इंटरनेट इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे। आप अगर दूसरी साइट को तेजी से इस्तेमाल करना चाहेंगे तो आपको उसके लिए अलग से डाटा पैक खरीदना होगा। इससे टेलीकॉम कंपनियों का फायदा ही फायदा होगा और आपको इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए मोटी रकम चुकानी होगी।

सरकार का रुख : सरकार ने इस पूरे मामले पर एक कमेटी का गठन किया है जो अगले महीने सरकार को रिपोर्ट सौंपेगी। ट्राई भी इसके लिए दिशा-निर्देश की बना रहा है। सभी  पक्षों से 24 अप्रैल तक रिपोर्ट मांगी गई है। टेलीकॉम कंपनियों को 8 मई तक का समय दिया गया है। इसके बाद ही इस पर फैसला होगा।

Tuesday, April 14, 2015

अग्निशमन सेवा दिवस...

अग्निशमन सेवा दिवस...
तेज उठती लपटें और उनके बीच किसी के उजड़ते आशियाने को बचाने की मंशा फायरकर्मियों में देखने को मिलती है। वे हर दिन आग से खेलने का काम करते हैं। इस खतरनाक काम को अंजाम देते हुए उन्हें अपनी जान की भी फिक्र नहीं होती। फिक्र होती है तो उन्हें सिर्फ उस जलते मंजर या फिर उसमें धधकती जिंदगी को बचाने की। आग लगने वाली जगहों पर फायरमैन सिर्फ एक फोन कॉल पर दौड़ पड़ते हैं।
दूसरों के हिस्से की तपन को झेलते हुए जनता की रक्षा व सुरक्षा के लिए कृत संकल्पित इस जांबाज फायरमैन दल के लिए अग्निशमन दिवस महज कौशल प्रदर्शन का मंच नहीं है, वरन ये स्मृति दिवस है उन 66 अग्निशमन कर्मचारियों की शहादत का, जिन्होंने जनसेवा करते हुए सहर्ष मृत्यु का वरण किया।
वह14 अप्रैल 1944 का एक धधकता शुक्रवार था,जब विक्टोरिया डाक बंबई में सेना की विस्फोट सामग्री से भरा पानी का जहाज लपटों के आगोश में समा गया। आग पर काबू पाने के लिए बंबई फायर सर्विस के एक सैकड़ा अधिकारी व कर्मचारी घटनास्थल पर भेजे गए।
अटूट साहस और पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए इन जांबाज अग्निशमन कर्मचारियों ने धधकती ज्वाला पर काबू करने का भरसक प्रयत्न किया। आग पर नियंत्रण तो पा लिया गया,लेकिन इस कोशिश में 66फायरमैन को अपनी जान की आहूति देनी पड़ी।
उन्हीं 66शहीद अग्निशमन कर्मचारियों को श्रद्धांजलि देने के लिए अग्निशमन सेवा दिवस मनाया जाता है।
इस दिवस के विभिन्न आयोजन पूरे सप्ताह भर चलते हैं। सप्ताह के दौरान फायर ब्रिगेड द्वारा विभिन्न कारखानों, शैक्षणिक संस्थाओं,ऑइल डिपो आदि जगहों पर अग्नि से बचाव संबंधी प्रशिक्षण दिया जाता है।

अग्निशमन सप्ताह के अंतर्गत नागरिकों को अग्नि से बचाव तथा सावधानी बरतने के संबंध जागृत करने के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते है। इसका उद्देश्य अग्निकांडों से होने वाली क्षति के प्रति नागरिकों को जागरूक करना होता है।