Tuesday, January 5, 2010

अर्थव्यवस्था की कराहती हकीकत का पाला

सकल घरेलू उत्पाद बढ़ने से देश का विकास हो जाएगा। ऐसा सोचना या समझना ग़लत हैं। बचपन भले ही भूखा रहे,नौजवान भले ही निराश हों,किसान आत्महत्या कर लें पर सकल घरेलू उत्पाद बढ़ जता हैं तो हम यह कहतें नहीं थकते किहम विकास के रास्ते पर शानदार तरीके से आगे चल रहे हैं। भारत आर्थिक महाशक्ति बनने जा रहा हैं। सपनों की दुनिया और हकीकत में फर्क हैं। भारत में २० से २५ फीसदी आबादी भूखी या कहना चाहिए कि वह कुपोषण का शिकार हैं। बाज़ार में खाद्यान्न उपलब्ध हैं। पर क्रियशक्ति नहीं हैं। यदि लोगों के पास पर्याप्त खाद्य पदार्थ खरीदने के लिए पैसे नहीं है तो भूखे रहने के सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं हैं। गरीबी भूख का सबसे बड़ा कारण हैं। सामान्य कुपोषण की दृष्टि से भारत की स्थिति अफ्रीकी देशों से भी बदतर हैं। अफ्रीका में बार बार अकाल पड़ने के बावजूद भी वहाँ का पोषण स्तरभारत की तुलना में अच्छा है। देश में ५० फीसदी वयस्क महिलाएं रक्त अल्पता से पीड़ित हैं। माताओं में कुपोशन, शिशुओं का वजन अपेक्षा से कम होना एवं जीवन के बाद के दिनों में रोगों के होने की दृष्टि से भारत सबसे ख़राब रिकार्ड वाले देशों में गिना जाता हैं। कम आय, बढाती कीमतें,ख़राब स्वास्थ्य सेवाएं, और बुनियादी शिक्षा की उपेक्षा आदि ने भारत में भूख और कुपोशन को बढाया हैं। झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले, शहर के कर्मचारी,अंशकालिक मजदूर ग्रामीण और कृषि श्रमिक , ग्रामीण क्षेत्र के शिल्पी इन सबकी ज़िन्दगी बदतर होती चली गयी हैं। इस देश में मुठ्ठी भर लोग मालामाल होकर अमीरी के शिखर पर भले ही पहुँच गए हों। पर आम आदमी बदहाल ज़िन्दगी जीने को मजबूर हैं। सही बात तो ये हैं कि केवल २० फीसदी लोग ही सबकुछ लुटे जा रहे हैं। और ८० फीसदी के पास कुछ भी नहीं हैं। जमीनी सच्चाइयां शब्दों के मायाजाल से कहीं अलग हैं।
जीडीपी से आगे हमें सोचना होगा। क्योंकि जीडीपी का आकलन करते समय बुनियादी स्वास्थ्य, बुनियादी, शिक्षा ,साफ़ पीने का पानी औसत आयु,मात्र-शिशु जीवन दर जैसे विषयों पर ध्यान नहीं दिया जाता। देश की प्रगति को आर्थिक आंकड़ों से नापा जाता हैं। जीडीपी के आंकलन में इस तथ्य की पूरी उपेक्षा की जाती हैं कि वहाँ के लोग वास्तव में कितने शिक्षित हैं, स्वास्थ्य, सुखी और संतुष्ट हैं। हमें यह समझना होगा कि ज़िन्दगी में आर्थिक विकास में नहीं हो सकता। जीडीपी हमारे देश की बढ़ रही हैं पर साथ ही गरीबी रेखा से नीचे जीवन निरवाह करने वालों की संख्या भी प्रतिवर्ष बढ़ रही हैं। काम पाने के लिए आतुर करोड़ों पढ़े लिखे नौजवान बेकार होकर पड़े हैं। अमीर और गरीब का अन्तर इतना बढ़ता जा रहा हैं कि उसे देखकर मन में कम्पन शुरू हो जाता हैं। सुखी जीवन जीने के बजाय गर्त की तरफ बढ़ रहे हैं. सामाजिक जीवन में नैतिकता मानो ख़त्म हो चुकी हैं. जीडीपी के धर्म दर्शन के बजाय हमें यह देखना चाहिए की वहां के लोग वास्तव में कितने शिक्षित , स्वास्थ्य,सुखी और संतुष्ट हैं. समय आया गया हैं की हम जीडीपी के बजे देखें की आम आदमी की हैसियत में बढ़ोत्तरी हुयी या नहीं.

Tuesday, December 29, 2009

एन.एस.ई.बनाम बी.एस.ई.

नॅशनल स्टाक एक्सचेंज कारोबारी समय बढ़ाने के नाम पर बाज़ार के कारोबारियों और नियामकों को भ्रम के जाल में फंसा रहा हैं। एन.एस.ई.और बी.एस.ई। में कारोबारी समय बढ़ाने की होड़ नहीं हैं। होड़ अपने वर्चस्व और एकाधिकार को साबित करने की हैं।

दरअसल एन.एस.ई। ने बी.एस.ई को कई मामले में पीछे छोड़ दिया हैं। और उसके बाज़ार हिस्से को हड़प लिया हैं। इसलिए बी.एस.ई इससे पहले की कुछ नया कर पाये एन.एस.ई पूरी तरह से हावी होना चाहता हैं। इस कोशिश में भले ही देश का नुकसान हो। बाज़ार के जानकारों के अनुसार एन.एस.ई ने एक बड़ी रणनीति और अपने एकाधिकार के बल पर दूसरे सभी एक्सचेंजों, निवेशकों, बाज़ार के सहभागियों आदि के अलावा पूँजी बाज़ारके नियामकों को भी ताकपर रख दिया हैं। कारोबारी समय बढ़ाने के पीछे एन.एस.ई एस.जी.एक्स। के साथ तालमेल बिठाने का तर्क दे रहा हैं। ताकि एन.एस.ई एस.जी.एक्स में होने वाले निफ्टी के कारोबार को खींच सके। गौरतलब हैं की सिंगापुर एक्सचेंज (एस.जी.एक्स ) में निफ्टी के वायदा सौदे हो रहे हैं। जबकि इन सौदों के लिए एन.एस.ई ने ही एस.जी.एक्स को लाइसेंस दिया हैं। साफ़ हैं किएन.एस.ई को इससे लाइसेंस फीस और ट्रांजैक्शन फीस के रूप में आमदनी हो रही हैं। सिंगापुर एक्सचेंज सुबह साढ़े सात बजे खुलता हैं । और जब tak भारत के एक्सचेंज खुलते हैं, एस.जी.एक्स में निफ्टी के अच्छे खासे वायदा सौदे हो जाते हैं। अब एन.एस.ई चाहता हैं कि ये सौदे उसके एक्सचेंज पर हों,इसलिए उसने भारतीय एक्सचेंज सुबह नौ बजे खुलने का राग अलापने लगा हैं। और सेबी और ब्रोकरों के सामने आवाज़ उठाना शुरू कर दिया हैं। कि भारत के सौदे एस जी एक्स में जा रहे हैं। एन.एस.ई चाहता तो एस.जी.एक्स के साथ मिलकर निफ्टी के अनुबंधों को संशोधित करके भारतीय समय के अनुकूल बना सकता था। और यदि एस.जी.एक्स को इसमें कोई एतराज होता तो एन.एस.ई उक्त अनुबंध को रद्द भी कर सकता था। लेकिन वह ऐसा नहीं कर रहा हैं।
एन.एस.ई ने अपने हित में सेबी को सुबह नौ बजे एक्सचेंज खोलने का प्रस्ताव किया हैं। जबकि एस.जी.एक्स भारतीय समय से ढाई घंटे पहले खुलता हैं। सिंगापूर एक्सचेंज में नौ बजे खुलने के समय भारत में सुबह साढ़े सात बजे होते हैं। सपष्ट हैं भारत के एक्सचेंजों के ९ बजे खुलने पर भी सिंगापुर के ढाई घंटे के सौदे को एन.एस.ई कवर नहीं कर पायेगा।
यदि कवर हो भी जाए तो इससे देश को क्या हाशिल होगा? सिवाय सट्टेबाजी के वर्चस्व की इस लड़ाई का खामियाजा आम निवेशकों, छोटे कारोबारियों और कर्मचारियों को ही भुगतना हैं। ट्रेडिंग बढ़ने से फ़ायदा केवल विदेशी निवेशकों और एक्सचेंजों को ही होगा। इसलिए शेयर बाजारों में कारोबारी समय बढ़ाना कतई उचित नहीं होगा।





Tuesday, December 15, 2009

तेलंगाना जैसी पाइप लाइनों में भड़की आग

देश में २९ वें राज्य के रूप में तेलंगाना के उदय होने से तेलंगाना जैसी पाइप लाइनेगरम होना शुरू हो चुकी हैं। जिस पाइप लाइन से पहले धुंआ निकलता था। और पृथक राज्य बनाए जाने की मांग शैनः शैनः हो रही थी। अब वहाँ चिंगारी निकालनी शुरू हो गयी हैं। एक ओर जहाँ महाराष्ट्र में विदर्भ को अलग कराने के लिए बीजेपी ने आन्दोलन को राशन पानी देना शुरू कर दिया हैं। तो उत्तर-प्रदेश में मायावती ने भी हरित प्रदेश और बुंदेलखंड को पृथक राज्य बनाये जाने की मांग को हवा पानी देना शुरू कर दिया हैं। मायावती ने तो प्रधानमन्त्री को पत्र लिखकर अलग राज्य बनाये जाने की मांग भी कर डाली हैं।
दरअसल तेलंगाना को अलग राज्य बनाए जाने की हरी झंडी मिलना जनाकांक्षाओं की जीत हैं। चंद्र शेखर राव के तेजस्वी और जोशीले नेतृतवमें केवल आठ वर्षों में तेलंगाना नेतृत्व अपनी लक्ष्य प्राप्ति तक जा पहुचा। और विदर्भ, बुंदेलखंड और हरित प्रदेश को बनाए जाने के आन्दोलन में नयी जान आ गयी। अगर तेंगाना के बारे में जाने तो तेलंगाना का तात्पर्य हैं - तेलगू की भूमि। महाभारत में तेलंगाना के लिए तेलिंगा राज्य का जिक्र किया गया हैं। और यहाँ के निवासियों को तेल्वाना से संबोधित किया गया हैं। माहाभारत और रामायण दोनों में तेलंगाना का उल्लेख मिलता हैं।
वैसे पृथकका आन्दोलन १९६९ में शुरू हुआ था। लेकिन इसे दबा दिया गया। १९९८ के विधान सभा चुनाव में भाजपा ने एक वोट दो राज्य का नारा देकर आन्दोलन को तेल देना शुरू कर दिया। २००१ में केचंद्रशेखर राव के नेतृत्व में तेलंगाना राष्ट्र समिति का गठन हुआ। आन्ध्र प्रदेश विधान सभा की २९४ सीटों में से ११९ सीटें तेलंगाना की हैं। इसी तरह आंध्र प्रदेश की ४२ लोकसभा सीटों में से १७ तेलंगाना की हैं। राव के आमरण अनशन ने केन्द्र सरकार की हवा निकल दी। राव के दृढ विश्वाश और फौलादी इरादों की बदौलत मनमोहन सरकार को अलग राज्य बनाये जाने का सिगनल देना पड़ा॥
जाहिर हैं दिल्ली दरबार के सिग्नल देते ही नागपुर में चल रहे शीतकालीन सत्र में रोशनी की आस जाग गयी। और मायावती ने भी केन्द्र सरकार के पाले में यार्कर गेंद फेंक दी। क्योंकि राहुल बाबा बुंदेलखंड का गुणगान करते की मायावती भंजाने के फिराक में जुट गयी।

अब एक नजर डालते हैं की पाइप लाइन में कितने हैं तेलंगाना-
बुंदेलखंड - पिछले ५० साल से अलग बुंदेलखंड बनाये जाने को लेकर आन्दोलन चल रहा हैं। इलाके की आबादी तकरीबन ६ करोड़ से ऊपर हैं इसका कुछ हिस्सा उत्तर परदेश का हैं तो कुछ मध्य प्रदेश का हैं। अपार खनिज संपदा होने के बावजूद यह इलका काफ़ी पिछड़ा हुआ हैं और गरीब हैं। यहाँ किसानों के नाम पर अलग राज्य की मांग उठती रही हैं।
पूर्वांचल - उत्तर मध्य भारत का यह हिस्सा यूंपी के पूर्वी छोर पर बसा हैं। यह उत्तर में नेपाल पूर्व में बिहार दक्षिण में मध्य प्रदेश बुंदेलखंड क्षेत्र और पश्चिम में यूपी के अवध क्षेत्र से लगा हुआ हैं। पूराव्चल के तीन भाग हैं पश्चिम में अवधी क्षेत्र, पूर्व में भोजपुरी और दक्षिण में बुंदेलखंड क्षेत्र।
विदर्भ - पूर्वी महाराष्ट्र का यह इलाका अमरावती और नागपुर डिवीजन से मिलकर बना हैं। यहाँ अलग राज्य की मांग के पीछे राज्य सरकार द्वारा क्षेत्र की उपेक्षा बड़ा कारन हैं। एन.के.पी साल्वे और वसंत साथे अलग राज्य की मांग के हक़ में हैं। लेकिन राजनीतिक हलकों ने इसकी खास रुचि नहीं दिखाई। हालाँकि युति में बीजेपी ने अलग राज्य बनाये जाने की मांग को जोर दिया हैं। लेकिन शिवसेना संयुक्त महाराष्ट चाहती हैं।

हरित प्रदेश - पश्चिम यूपी के जिलों को मिलाकर अलग हरित प्रदेश या पश्चिमांचल बनने की मांग उठती रही हैं। हालाँकि १९५५ में बी आर अमेडकर ने तीन हिस्सों में बांटने की वकालत की थी। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। पर अलग-अलग राज्य बनाये जाने की मांग आज भी जिन्दा हैं। और इसे अजीत सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोक दल पुरजोर तरीके से तेल पानी दे रही हैं।
बोडोलैंड - असममें अलग राज्य बोडोलैंड के गठन की मांग ६० के दशक से चली आ रही हैं। बोडोलैंड की सीमायें ब्रम्हपुत्र नदी के उत्तरी छोर से लेकर भूटान और अरुणाचल प्रदेश से लगे तराई वाले इलाके तक हैं। इलाके की ज्यादातर आबादी बोडो भाषी हैं।
रायलसीमा- आन्ध्र प्रदेश के इस इलाके में कुरनूल, कडपा,अंतपुर,चित्तूर,नेल्लोर और प्रकाशम् जिले का कुछ क्षेत्र आता हैं। इस इलाके से राज्य के कई सी एम् रहे चुके हैं। इनमें वाई.एस आर रेद्द्दी और चंद्र बाबू का नाम भी शामिल हैं।

सौराष्ट्र- गुजरात के इस अंदरूनी हिस्से की अलग राज्य के गठन की मांग ज्यद्फातर बुलंद नहीं रही। इसकी वजह लोगों की एक्जुता और लोगों की सम्पन्नता भी रही हैं। साथ ही सौराष्ट्र में आम गुजराती बोली बोली जाती हैं। और संस्कृति और परम्परा भी आम गुजरती की तरह ही हैं।
मिथिलांचल- नेपाल से सटे कुछ इलाकों के अलावा बिहार का आधे से ज्यादा इलाका मिथिलांचल क्षेत्र में आता हैं। इसके बड़े शहरों में जनकपुर, दरभंगा,मधुबनी,समस्तीपुर,मधेपुरा,बेगुसराय,सीतामढी,वैशाली,मुंगेर शामिल हैं। मिथिलांचल मूल रूप से मिथिली भाषी इलाका हैं। अलग पारम्परिक लिपि होने के कारण मैथिली बोलने वालों की तादाद ४.५ करोड़ हैं।
गोरखालैंड- हालांकि दार्जिलिंग गोरखा हिल कौंसिल के तहत गोरखा लैंड को कुछ स्वायत्ता मिली हुयी हैं। पर दार्जलिंग और आसपास के क्षेत्र के लोगों की आक्शान्यें पूरी नहीं हो सकी हैं। यही वजह हैं की एक अलग राज्य मांग यहाँ जोर पकड़ रही हैं। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा इस मान का झंडा बुलद किए हुए हैं।
कुर्ग- कर्नाटक में कुर्ग राज्य बनाने की मान मूलतः इस प्रदेश की संस्कृति विशिष्टता के कारन हैं.बांकी जगह की तरह यहान्न अलग राज्य की मांग के लिए भेदभाव नहीं हैं। हालाँकि ५० के दसक में इसके गठन की मांग उठाती रही हैं। पर इसने कभी मुखर रूप नहीं लिया। शायद इसकी वजह इस क्षेत्र का अधिक संपन्न होना भी रहा।
तुलुनादू-यह कर्नाटक और केरल का वह इअलाका हैं जो अपनी अलग संस्कृति और भाषाई पहचान रखता हैं। तुलु भाषी लोगों की संस्कृति कर्नाटक से काफी भिन्न हैं। क्षेत्र के वासियों की पहचान को बचाने और उपेक्षा की भावना को ख़त्म करने के लिए कर्णाटक और केरल सरकार ने तुलु साहित्य अकादमी भी बनाई हैं।

Wednesday, October 14, 2009

नोबेल नहीं, दूसरा बुश न पैदा हो

जिस पुरस्कार से महात्मा गाँधी या पंडित जवाहर लाल नेहरू को नहीं नवाजा गया । वह अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को सिर्फ़ नौ माह के कार्यकाल में ही मिल गया। जबकि फ़िल्म अभी पूरी बांकी है।
अगर नोबेल के बारे में बात की जाए तो विभिन्न क्षेत्रों में नोबेल पुरस्कार प्रतिवर्ष स्वीडिश रसायन शास्त्री अल्फ्रेड बर्नार्ड नोबेल (१८३३-९६) की स्मृति में उनकी पुण्यतिथि (१० दिसम्बर)के अवसर पर स्वीडन की राजधानी स्टाकहोम और नार्वे की राजधानी ओस्लो में दिए जाते हैं। नोबेल ने एक कोष बनाया था। जिसके धन के ब्याज से पुरस्कार की राशि आती है। यह पुरस्कार उन लोगों को दिया जाता है जिन्होंने मानवता के हित के लिए भौतिक शास्त्र ,रसायन शास्त्र,शारीरिक क्रिया विज्ञान ,चिकत्सा विज्ञान और विश्व शान्ति में योगदान किया हो.ऐ.बी.नोबेल ने नाइट्रोग्लिसरीन की खोज की। और इसका उपयोग विस्फोटक बनाने में किया गया।

आर्थिक विज्ञान के लिए नोबेल पुरस्कार सन १९६७ में ' रिक्स्वांड दी सेन्ट्रल बैंक ऑफ़ स्वीडन द्वारा इसकी ३०० वीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में स्थापित किया गया। सभी पुरस्कार १९०१ ईसवी से प्रारम्भ हुए। परन्तु अर्थशाश्त्र के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार सर्वप्रथम १९६९ में दिया गया।
भौतिक शास्त्र और रसायन शास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार स्वीडिश एकेडमी ऑफ़ साइंस द्वारा दिया जाता है। जबकि चिकत्सा और शारीरिक क्रिया विज्ञान के लिए पुरस्कार 'स्टाक होम फैकल्टी ऑफ़ मेडीसिन ' द्वारा दिया जाता है।
साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए चयन स्वीडिश एकेडमी ऑफ़ लिटरेचर द्वारा किया जाता है।
शान्ति के क्षेत्र में इस पुरस्कार हेतु निर्णय नार्वे की संसद के पाँच निर्वाचित प्रतिनिधि करते है। कोष का प्रबंध बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स द्वारा किया जाता है। जिसका अध्यक्ष स्वीडन सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है। साल २००१ से १०० वीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में प्रत्येक वर्ग में विजेताओं को पुरस्कार स्वरुप एक -एक करोड़ स्वीडिश क्रोनर (लगभग ४.७५ करोड़) रुपये की राशि दी जाती है।

ओबामा को पुरस्कार मिलने पर वे ख़ुद आश्चर्य चकित हैं ओबामा ने कहा है कि - मुझे नहीं लगता कि इस पुरस्कार से सम्मानित अनेक युगांतकारी हस्तियों की कतार में मैं कहीं स्वयं को पाता हूँ। ओबामा के इस कथन से उनकी ईमानदारी झलकती है। क्यों कि बहुत से अमेरिकी मानते होंगे कि उन्हें ये पुरस्कार समय से कुछ पहले ही मिल गया है।ओबामा अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति हैं जिन्हें नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके पहले वुडरो विल्सन और फ्रेंकलिन रूजवेल्ट को नोबेल मिल चुका है।

अब दिमाग में ये सवाल कौंध रहा है कि ओबामा ने ऐसा कौन सा शांतिकुंज स्थापित कर दिया है जिससे नोबेल देने की घोषणा कर दी गयी है। अलकायदा और तालिबान के ख़िलाफ़ अमेरिका को अब तक सफलता नहीं मिली हैं। अगर ओबामा विश्व शान्ति के प्रति इतने गंभीर और ईमानदार हैं तो पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता राशि तिगुनी नहीं होती। जबकि ओबामा भली भांति जानते हैं कि पाकिस्तान इस राशि का उपयोग भारत के ख़िलाफ़ आतंक की फसल उगाने में करता है। पश्चिम एशिया में शान्ति स्थापना का अर्थ है इजरायल को मजबूत करना। तो क्या नोबेल पुरस्कार समिति पर कोई दबाव था कि इस साल नोबेल पुरस्कार ओबामा कि दिया जाए। ओबामा दुनिया के किस हिस्से में शान्ति स्थापित कर पायें हैं इसका अभी तक कोई ठोस उदाहरण नही हैं। ईराक और अफगानिस्तान के घाव जल्दी भरने वाले नहीं है। अमेरिका ने जिस फावडे का इस्तेमाल ईराक और अफगानिस्तान के ऊपर किया है पाकिस्तान में भी आतंक की फसल लहलहा रही है । अमेरिका पाकिस्तान के ऊपर इराकी फावडा इस्तेमाल करने के बजाय मरहम दे रहा है। क्या इस लिए शान्ति का पुरस्कार देने के लिए ओबामा को चुना गया है ?

ऐसे में निशित रूप से नोबेल शान्ति पुरस्कार ने ओबामा की नैतिक जिम्मेदारी और प्रतिबध्दता को बढ़ा दिया है। जिससे ओबामा बुश के समान कोई युध्द नहीं छेड़े। अब तो अमेरिका को दूसरे देशों से एन.पी.टी यानी परमाणु अप्रसार संधि में हस्ताक्षर करने के लिए कहने से पहले ओबामा को ख़ुद हस्ताक्षर कर देना चाहिए। क्योंकि वे तो अब शान्ति के मिसाल बन गए हैं।

Wednesday, October 7, 2009

सादा जीवन उच्च विचार हो गए मालामाल

इन दिनों लोकतंत्र के पुजारी (जन-प्रतिनिधि)सादगी पर उतर आए हैं। इनकी सादगी पर कौन मरेगा ,किसका भला होगा, सादगी पर कितना सादापन है । ये एक अलग मुद्दा है। लेकिन राजनीतिक घरानों को कारपोरेट घराने की चमक-दमक शान-शौकत, उच्च वेतन से भौंहें तनी हुयी हैं। कंपनी मामलो के मंत्री सलमान खुर्शीद को सी.ई.ओ। का वेतन कचोट रहा है। साथ ही योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया भी खुर्शीद से इत्तेफाक रखते हैं.मोंटेंक सिंह का कहना है कि सी.ई.ओ को उलूल जुलूल वेतन(indecent salaries) नहीं मिलना चाहिए।
ऐसे में जिम्मेदार पदों पर बैठे इन लोगों से ऐसी बयानबाजी की उम्मीद नहीं की जा सकती है। निजी क्षेत्र की कम्पनियों के उच्च अधिकारयों को काबिलियत ,मेहनत और कंपनी को सफल बनाने में मिलता है। जबकि फाइलों का ढेर ,हाथ में तमंचा, अगल-बगल गुंडे रखने वाले बाहुबली नेता पर लाखों रुपये उड़ते है।
एक नज़र डालते हैं की देश के मंत्री जी को क्या मिलता है ?
- टाइप ८ बँगला,राज्य मंत्रियों को टाइप ७ बंगला
- कोई किराया नहीं, बिजली के बिल पर कोई लगाम नहीं।
-बेसिक सैलरी १६ हज़ार ,डेली भत्ता एक हज़ार
-संसदीय क्षेत्र भत्ता २० हज़ार रुपये।
-- टेलीफोन - दो फ़ोन, एक लाख ७५ हज़ार फ्री कॉल,हर साल ढाई हज़ार रुपये मोबाइल भत्ता,मोबाइल हैंडसेट फ्री, इन्टरनेट ,ख़ुद के लिए जितना चाहे उतना एयर टिकट ।
- परिवार के लिए साल में ४८ यात्राएं
- जितना चाहें उतनी एसी कोच में जर्नी परिवार के साथ।
--- स्टाफ- पर्सनल स्टाफ में १५ लोगों को नियुक्त किया जा सकता है। एक प्राइवेट सेक्रेटरी ,एक एडिशनल पर्सनल सेक्रेटरी दो पर्सनल अस्सिटेंट ,एक हिन्दी स्टेनो ,एक ड्राईवर, एक क्लर्क एक जमादार और एक चपरासी।
(यह केवल मंत्री जी का स्टाफ है मंत्रालय से अलग से स्टाफ मिलता है)
ये हैं देश के जनसेवक जिन्हें देश की सेवा कराने में कितने सेवकों की जरूरत पड़ती है।
अब इनके द्वारा कामो की घोंघा चाल को भी देख लेते हैं
दस साल में-

१९९८- में पी.सी.जैन कमीशन ने वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा को रिपोर्ट सौंपी गयी। इसमें १०९ ऐसे कानूनों को चिन्हित किया गया.जिनमें बड़े पैमाने पर बदलाव की जरूरत है.इसी तरह एक समिति ने २५सौ कानूनों का अध्ययन किया १४०० kaanoono को गैर जरूरी बताया।
१९९९ में प्रशासन सुधार विभाग ने ९९ से २००१ के बीच दस मंत्रालयों का अध्ययन किया इसमें आठ हज़ार पद ख़त्म करने १३संगठनो को ख़त्म करने और २४ को नए सिरे से व्यवस्थित करने का सुझाव दिया।
२००३ में सुरेन्द्र नाथ कमिटी ने सरकारी कर्मचारियों की वेतन वृद्धि की प्रक्रिया में सुधार का सुझाव दिया ताकि कर्मचारियों का स्किल मुआयना किया जा सके।
२००५ में कानून मंत्री वीरप्पा मोइली के नेतृत्व में प्रशासनिक सुधार आयोग बना। आयोग ने चार रिपोर्ट फाइल की। जिसमें आर.टी.आई.क्राइसेस,मैनेजमेंट के साथ गवर्नेस के एथिक्स पर भी एक रिपोर्ट थी। रिपोर्ट पर अभी तक कोई कारवाई नहीं हुई।
आजादी के बाद से अब तक तकरीबन ३० कमिटी और कमीशन बन चुके हैं लेकिन किसी की भी आधी सिफारिशों पर भी अमल नहीं किया गया है। ये हैं हमारे देश केमंत्रियों के कारनामे।
आज कोई भी सांसद या विधायक पद की उम्मेदवारी के समय कितनी संपत्ति है । इसके बाद जब वह जीत जाता है । और फ़िर से जब उम्मेदवार बनता है तो पाँच साल में करोड़ों का मालिक बन बैठता है। हाल ही में नॅशनल इलेक्शन वॉच और एसोसियेशन फॉर डेमोक्रेटिक रेफोर्म्स संगठन ने खुलासा किया कि हरियाणा में उम्मीदवारों की संपत्ति पिछले पाँच साल में पाँच हज़ार फीसदी से अधिक का इजाफा हुआ है। ओमप्रकाश चौटाला की अगुवाई वाले आई.एन.एल.डी.के ५६ प्रत्याशी करोड़पति है। इसी तरह हरियाणा जनहित kaangresh के ४४ और बी.जे.पी .के ४१ करोड़पति उम्मीदवार हैं। इधर महारष्ट्र में भी मुंबई और ठाणे की ६० विधान सभा सीटों पर १२२ करोड़पति उम्मीदवार मैदान मारने की फिराक में हैं। महाराष्ट्र राज्य के सबसे धनी उम्मीदवार अबू आसिम आज़मी हैं जिनकी संपत्ति १२६ करोड़ है। ये संपत्ति देश के भावी विधायकों की हैं।
इधर मंत्री जी फाइव स्टार होटलों में रुके हुए थे। एक दिन में लाखों रुपये का बिल आता था। और सीना तानकर कहते थे कि बिल हम अपनी जेब से भर रहे है। लेकिन जब छीछालेदर होने लगी तो सादगी के पैमाने पर उतर आए। संसद को चलाने में करोड़ों रुपये स्वाहा हो जाते है। आम आदमी तक रुपये में दस पैसे भी पहुँचने पर दस बार आई.सी.यूं.से होकर गुजरता है। जनता के टैक्स के पैसों से ही नेता जी फ्री में उड़ना, फ्री में ठहरने की आदत पड़ गयी है।
अब आते हैं असली मुद्दे पर तो सलमान खुर्शीद ने लोकसभा चुनाव के हलफनामे पर २.६१ करोड़ की संपत्ति दिखाई है। खुर्शीद साहब ख़ुद एक बेहद कामयाब वकील हैं.इसका मतलब मोटी फीस भी जरूर लेते रहे होंगे। क्या वे जनसेवक के नाते फ्री में केस लडेंगे।
आज देश को आज़ाद हुए ६० साल से ज्यादा का समय हो गया है। मुझे अभी तक समझ में नहीं आ रहा है कि देश को ६० साल का बूढा देश कहूं या फ़िर ६० साल का जवान देश। जवान शब्द इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूँ कि हम विकासशील बने हुए हैं यानी की जवानी की दहलीज पर पहुँच रहे हैं। बूढा इस लिए कह रहा हूँ कि सरकार की जो भी योजनायें निकलती हैं वो बूढी हो जाती हैं और फ़िर उस बूढी नब्ज में खून दौडाना मुश्किल हो जाता है। नरेगा नरक बन गया है ये किसी से छिपा नहीं है। नरेगा के जरिये अरबों रूपये वारा-न्यारा हो गए है। सरकारी आंकडे बताते हैं कि देश की पाँच karod जनता को नरेगा का लाभ मिला है। लेकिन सरकारी आंकडे ये नहीं बताते कि कितने लोग नरेगा को छोड़ गाव से शहर की और कूच कर गए हैं। विधायक ,संसद निधि का कमीशन किसी से छिपा नहीं है। सादगी से जीवन व्यतीत कर रहे हैं। और मालामाल हो रहे हैं। कोई हाड़तोड़ मेहनत करता है । रोजगार के अवसर पैदा करता है। पैसा कमाता है तो तो इन घरानों को बर्दाश्त नही होता।

धन्य है ऐसी सादगी।







Thursday, October 1, 2009

कम खर्च का चोला

कम खर्च और भ्रष्टाचार एक बार फ़िर से बहस का मुद्दा बन गया है। बोफोर्स काण्ड में सी.बी.आई. की तोप ही फिस्स हो गयी।और कई दशक से चला आ रहा कांड अब अपने अन्तिम संस्कार पर पहुँच रहा है। सवाल ये है की मंत्री जी फाइव स्टार होटल में हैं और दलील दे रहे हैं कि यहाँ का खर्चा वे अपनी जेब से भर रहे हैं। एक दिन का लाखों में खर्च और करोड़ों का बिल बन चुका था। ऐसे में क्या मंत्री जी की आमदनी इतनी ज्यादा है कि वे इतना व्यय सहन कर सकते हैं। या फ़िर इसका भुगतान कोई अज्ञात व्यक्ति कर रहा हैं।
खैर कम खर्चे में सोनिया गाँधी से लेकर सभी मंत्री सोनिया जी की राह पर निकल पड़े। राहुल बाबा ने तो उड़नखटोला को ही बाय बोल दिया। और रेल से ही निकल पड़े। लेकिन इससे सरकार ने कितने रुपये बचाए। किसका फायदा हुआ। ये भी एक सवाल है। ये वही पार्टी जिसमें महात्मा गाँधी जी ने एक धोती पहनकर पूरा देश घूमा है। ऐसे में आखिरकार इस पार्टी के नेता कैसे पंचसितारा होटल के आदि हो गए कि गांधीजी के सिद्धांत को तिलांजलि दे दी। ख़बर ये भी है कि दो अक्टूबर को कांग्रेसी स्लम में जायेंगे । और बांकी दिन कहाँ रहेंगे। क्या आदिवासी के घर जाकर वहाँ का खाना खाकर खर्चा कम होगा। तो फ़िर सबसे पहले अपने सुरक्षा रक्षक हटा दो। जिस जनता ने चुनकर भेजा है उसी जनता से डर है और सुरक्षा भारी होना चाहिए,ये भी नेताओं की मांग है ।

एक सर्वेक्षण में दावा किया गया है कि सबसे ज्यादा खर्च सरकार, उसके मंत्री और अफसर करते हैं। लगभग ७५ फीसदी राशि तो यही लोग उड़ा देते है। २००७-०८ में केन्द्रीय मंत्रियों द्वारा १८२ करोड़ रुपया खर्च किया गया। यह खर्च २००६ -०७ में १२१ करोड़ और २००५-०६ में ९८ करोड़ का हुआ। यात्रा व्यय पर २००७-०८ में १३८ करोड़ खर्च हुए। २००६-०७ में ८२ करोड़ और २००६-०५ में ६१ करोड़ खर्च हुए। राज्य मंत्रयों के वेतन पर १.७५ करोड़, १.54 करोड़ और १.२० करोड़ खर्च हुए। एक अनुमान के मुताबिक यदि प्रधानमन्त्री पर दस फीसदी की कटौती की जाए तो लगभग १८ से २० करोड़ रुपये की बचत हो सकती है।
ये सारे आंकड़े सीधे खर्च के हैं। इन पर परोक्ष रूप से आंकड़े पाना कठिन है। सुरक्षा और यात्राओं के के दौरान विभिन्न मंत्रालयों द्वारा किए गए खर्च का आंकडा मिलना मुश्किल है। क्योंकि वे विभिन्न मदों में दर्ज होते हैं। एक समय आदर्श स्थिति रहती थी कि प्रसासनिक खर्च ३० फीसदी से ज्यादा मंजूर नहीं होता था। आज लगभग ७० फीसदी प्रसासनिक खर्च हो रहा है। कम खर्च का चोला ओढ़ने वाले विधायक,सांसद क्या संकल्प लेंगे कि वे अपना वेतन और सुविधाएं नहीं बढायेंगे।

Wednesday, September 23, 2009

घर नहीं तो शादी नहीं.

मुंबई की भागदौड़ ज़िन्दगी में आराम फरमाने के लिए किसे एक बेहतरीन आशियाने की जरूरत नहीं होती। लेकिन आप अगर कुवांरे हैं और आप शादी करना चाहते है। तो आपके पास भले ही अच्छी नौकरी हो। लेकिन अगर घर नहीं है तो सकता है की आपकी शादी टूट जायेगी। क्योंकि मुंबई में घर बनाना एक टेढी खीर है। लिहाजा मुंबई जैसे शहर में शादी करने के लिए आवश्यक शैक्षिक योग्यता अब घर हो गया है।ऐसे में अब मुंबई जैसे शहर में वो दिन दूर नहीं रह जायेंगें जब एक शैक्षिक योग्यता और जुड़ जायेगी क्या क्या वो पानी पिला सकता है?
खैर यहाँ बात करना चाहता हूँ यूनिटेक प्रोजेक्ट पर। यूनिटेक ने मुंबई के वरली इलाके में बाज़ार के दाम से ४० फीसदी की सस्ती परियोजना की बुकिंग की शुरुआत की है। कंपनी ने सम्पत्ति के दाम में कटौती नहीं कराने के बजे परियोजना को ही कम कीमत पर पेश किया है। इस कटौती पर बिल्डरों ने कुछ शर्त भी राखी है जिसमें ग्राह्नकों को बुकिंग के समय ही 75 फीसदी रकम अदा करनी होगी। अगर वरली में सम्पत्ति के दाम की चर्चा की जाए तो औसतन १७,००० से २०,००० रुपये प्रति वर्गफुट के बीच है। हालांकि यूनिटेक ने इसके दाम १२ हज़ार से १४ हज़ार रखने का फैसला किया हैं। लेकिन किसी भी निवेशक को इसका फायदे नहीं दिया जायेगा। कंपनी का कहना है की निवेशकों को इस दायरे से अलग रखा जायेगा।
अब कीमत भले ही आपको आकर्षक लग रहीं हो लेकिन लेकिन इस परियोजना को पूरा होने में आपको लंबा इंतज़ार करना पड़ सकता हैं। क्यों की इसकी अनौपचारिक बुकिंग सितम्बर २०१० में शुरू होगी और इसके ४ से ५ साल बाद बनकर तैयार होगा।

ऐसे में अगर आप अपनी ज़िन्दगी में सपनों की रानी लाना चाहते हैं तो मुंबई जैसे शहर में रहकर आप अपनी शैक्षिक योग्यता पूरी कर सकने के लिए आपके पास बेहतर मौका है।