Friday, March 11, 2016

मार्क्सवाद

मार्क्सवाद के मूलभूत सिद्धांत : मार्क्सवाद बीसवीं सदी में दुनिया के एक बड़े हिस्से को प्रभावित करने वाली विचारधारा तो है ही, लेकिन सोवियत संघ के विघटन, चीन के धीरे-धीरे एक पूंजीवादी तानाशाही में तब्दील होते जाने, दुनिया भर के कई देशों, जैसे रोमानिया में चाउसेस्कू जैसे तानाशाहों को जन्म देने और एक शासन व्यवस्था के रूप में विरोधियों द्वारा पूरे जोर-शोर से खारिज किए जाने के बावजूद आज भी न केवल बौद्धिक अपितु राजनैतिक दुनिया में भी बहस का विषय बनी हुई है।

एक तरफ इसे एक मृत विचारधारा घोषित करने में पूंजीवादी प्रचार तंत्र अपना पूरा जोर लगा देता है तो दूसरी तरफ अपनी हालिया हार के बावजूद दुनिया भर में वाम बुद्धिजीवी तथा वामपंथी राजनैतिक दल अपने-अपने तरीके से वर्तमान संदर्भों में इसकी प्रासंगिकता सिद्ध करने के साथ-साथ नई परिस्थितियों के अनुसार एक वामपंथी राजनैतिक-आर्थिक व्यवस्था को परिभाषित करने में लगे हैं।

कम्युनिज्म के स्वप्न का सबसे बड़ा पक्ष है बराबरी पर आधारित सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व्यवस्था की स्थापना। आज अपने प्रचंड प्रभाव के बावजूद पूंजीवाद जो एक चीज़ कभी नहीं दे सकता वह है समानता। इसके विकास के मूल में ही गैर बराबरी की अवधारणा अन्तर्निहित है। लाभ की लगातार वृद्धि के उद्देश्य से संचालित इसका कार्य व्यापार मुनाफे की एक ऐसी हवस को जन्म देता है जो एक तरफ नए-नए और उन्नत उत्पादों की भीड़ लगाता जाता है तो दूसरी तरफ उन्हें खरीदने की ताकत को लगातार कुछ हाथों में सीमित कर बाकी बहुसंख्या को उत्तरोत्तर वंचितों के खांचे में डालता चला जाता है। दुनिया के पैमाने पर अमीर-गरीब देश बनते जाते हैं, देशों के पैमाने पर अमीर-गरीब लोग। सत्ता इन्हीं प्रभावशाली वर्गों के व्यापारिक और सामाजिक हितों की रक्षा का काम करती है।

भारत में मार्क्सवादी विचारों का प्रवेश : भारत में मार्क्‍सवादी विचारों का प्रवेश बीसवीं सदी के दूसरे दशक में हुआ। हालांकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के गठन को लेकर मतभेद रहे हैं। वर्तमान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के अनुसार उसकी स्थापना 1925 में कानपुर में हुई थी और 1964 में उससे अलग हुआ धड़ा जो अब अपने को मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी कहता है और जो वामपंथी मोर्चे का सरगना है, के अनुसार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना ताशकंद में 1920 में हुई थी और उसमें एमएन राय, एल्विन राय (उनकी पत्नी), रोजा फिंटिंगोफ मोहम्मद अली आदि शामिल थे। किंतु ऐतिहासिक तथ्य यह सुझाते हैं कि ताशकंद में गठित पार्टी में मुख्यत: वे लोग शामिल थे जो विदेशों में मार्क्‍सवाद के प्रभाव में आए और उन्होंने सोवियत संघ की छत्रछाया में वहीं एक कम्युनिस्ट पार्टी गठित कर डाली। ऐसे लोगो का भारत जैसे देश में कोई जनाधार भी नहीं था।

भारत में वामपंथी आंदोलन : वर्तमान भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का दावा अधिक तर्कयुक्त लगता है, क्योंकि उसके अनुसार 1925 में जिस कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया गया उसमें एसवी घाटे और श्रीपाद अमृत डांगे जैसे वे राजनीतिक नेता शामिल थे जिन्होंने भारत में ट्रेड यूनियनों की शुरुआत की थी। इस तरह 1925 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का जन्म तब हुआ जब सोवियत संघ अस्तित्व में आ चुका था और रूस में 1917 की अक्टूबर क्रांति से कई बुद्धिजीवी, ट्रेड यूनियन नेता और विशेषकर युवा क्रांतिकारी लोग प्रभावित हो रहे थे। इसके साथ ही यह राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों का दौर भी था जब उपनिवेशवाद और विशेष कर ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध अनेक देशों में जनआंदोलन शुरू हो रहे थे।

भारत में कांग्रेस के नेतृत्व में जो राष्ट्रवादी आंदोलन अपने उभार पर था और उसमें अनेक कम्युनिस्ट शामिल थे। तत्कालीन सोवियत संघ भी अनेक देशों में चल रहे साम्राज्यवाद विरोधी और उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों के पक्ष में था। भारत में कम्युनिस्टों ने कांग्रेस के भीतर रहकर अपना राजनीतिक कार्य करने का निर्णय लिया, पर एक पार्टी के रूप में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपनी स्थापना के बाद लगभग डेढ़ दशक तक भूमिगत रही, पर उसके अनेक नेता भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल होकर कार्य करते रहे।

भारतीय कम्युनिस्टों का दावा है कि उन्होंने ही पहली बार पूर्ण स्वराज्य की मांग उठाई थी और उन्हीं के दबाव में आकर 1927 के कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस ने इसे स्वीकार कराया था। एक ओर जहां व्यक्तिगत स्तर पर कम्युनिस्ट कांग्रेस के भीतर रहकर कार्य कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर वे ट्रेड यूनियनों के माध्यम से मजदूरों को संगठित भी कर रहे थे।

1929 में गिरणी कामगार मजदूरों के नेतृत्व में बंबई में कपड़ा मजदूरों की हड़ताल, 1930 में कलकत्ता के जूट मजदूरों और रेलवे तथा बागान मजदूरों की हड़ताल और कानपुर, मदुरई और कोयंबटूर में कपड़ा मजदूरों की हड़ताल के पीछे कम्युनिस्टों का ही हाथ था। उस समय की सबसे बड़ी राष्ट्रीय स्तर की ट्रेड यूनियन एटक में (जिससे टूटकर बाद में कांग्रेस का ट्रेड यूनियन मोर्चा इंटक बना) मुख्यत: कम्युनिस्ट ही अग्रणी पदों पर थे। 1929 में मेरठ षड्यंत्र मुकदमा सामने आया। अंग्रेजी हुकूमत ने भारतीय रेलवे में हड़ताल कराने के लिए तीन अंग्रेजों सहित अनेक ट्रेड यूनियन नेताओं को गिरफ्तार किया और उन पर मुकदमा चलाया। उन पर आरोप यह भी था कि वे भारत में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल (कार्मिटर्न) की शाखा स्थापित करने जा रहे थे।

गिरफ्तार लोगों में कम्युनिस्ट पार्टी के नेता एसए डांगे, मुजफ्फर अहमद आदि शामिल थे। 1929 से 1933 तक चले इस मुकदमे ने न केवल मजदूरों के बीच, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी पहचान बनाने में मदद की। आगे चलकर जब 1934 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर जयप्रकाश नारायण, नरेंद्र देव और मीनू मसानी के नेतृत्व में सोशलिस्ट पार्टी का गठन हुआ तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उसमें शामिल हो गई क्योंकि कांग्रेस का यह घटक कुछ हद तक मार्क्‍सवादी विचारों की दुहाई देता था और साथ ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को नाराज भी नहीं करना चाहता था।

भारतीय कम्युनिस्ट तब लेनिन के इस विचार से प्रेरित थे कि उन्हें राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों के साथ एकता और संघर्ष की नीति अपनानी चाहिए और लगातार यह प्रयास करना चाहिए कि इन आंदोलनों को एक वामपंथी दिशा प्रदान की जाए। इसका एक उदाहरण यह है कि जब कांग्रेस के त्रिपुरा सम्मेलन के बाद सुभाष चंद्र बोस द्वारा 1939 में फारवर्ड ब्लॉक की स्थापना किए जाने के बाद जब वामपंथी समेकन समिति का गठन किया गया तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उसमें शामिल हुई। इसमें फारवर्ड ब्लॉक और कम्युनिस्ट पार्टी के अलावा, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और अनुशीलन दल जैसे अन्य वामपंथी संगठन भी शामिल थे। पर कुछ समय बाद ही अनुशीलन दल और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी इस सहमेल से अलग हो गए और यह सहमेल ढह गया। अनुशीलन पार्टी के नेताओं ने फिर क्रांतिकारी समाजवादी दल (आरएसपी) का गठन किया।

कम्युनिस्टों पर अंग्रेजों का साथ देने का आरोप
कम्युनिस्टों पर अंग्रेजों का साथ देने का आरोप : भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी लगातार सोवियत संघ से ही मार्गदर्शित होती रही। जब दूसरा महायुद्ध शुरू हुआ तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को राष्ट्रीय मुख्यधारा से अलग-थलग होना पड़ा। इसकी वजह यह थी जब देश में गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन चल रहा था तब उसने इस आंदोलन का विरोध किया, क्योंकि सोवियत संघ, ब्रिटेन और अमेरिका हिटलर के फासीवाद से लड़ रहे थे। इसीलिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पर यह आरोप भी लगाया जाता है कि उसने स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान अंग्रेजी हुकूमत का साथ दिया।

इस तरह आजादी से पहले भारतीय वामपंथ पूरी तरह सोवियत संघ के मार्गनिर्देश में कार्य करता रहा। पर वैचारिक दृष्टि से वह इस दुविधा से भी ग्रस्त रहा कि उग्रवादी रणनीति अपनाए या फिर राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा के साथ चले। 1940 के दशक के उत्तरार्ध में राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्य धारा से अलग होते हुए भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने न केवल अनेक औद्योगिक हड़तालों की अगुवाई की, बल्कि पश्चिम बंगाल में किसानों के अधिकारों के लिए तेभागा आंदोलन और केरल में पुनप्रा-वायलार आंदोलन भी चलाया। इन दोनों राज्यों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थिति पहले से ही मजबूत थी।

पर इस दौर का सबसे महत्त्वपूर्ण आंदोलन निजाम की हुकूमत के अंतर्गत आने वाले भयावह निर्धनता से ग्रस्त तेलंगाना क्षेत्र में चलाया गया किसानों का सशस्त्र आंदोलन था। इस संघर्ष में सैकड़ों कम्युनिस्टों और आंदोलनकारी किसानों की जानें गईं। पर इस आंदोलन ने सैकड़ों गांवों को भूस्वामियों के चंगुल से मुक्त कराया और कई स्थानों पर किसानों के बीच भूमि का पुनर्वितरण भी किया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा सशस्त्र संघर्ष की यह सबसे बड़ी कार्रवाई थी।

इस संघर्ष का एक कारण उस समय पार्टी पर हावी उग्रवादी लाइन थी जिसके चलते आजादी मिलने पर उसने ‘यह आजादी झूठी है’ और 'लाल किले पर लाल निशान मांग रहा है हिंदुस्तान’ जैसे नारे कम्युनिस्टों की भाषा का अंग बन गए। इस लाइन को आज पार्टी वामपंथी संकीर्णतावाद की लाइन मानती है। इसके चलते पार्टी को अलगाव का सामना करना पड़ा जिसे दूर करने के लिए उसने संशोधित कार्यक्रम अपनया और संकीर्णतावादी लाइन त्याग कर आजाद भारत के पहले चुनावों में भाग लेने की तैयारी में जुट गई।


पहला चुनाव : 1951-52 के पहले लोकसभा चुनावों में पार्टी को 16 सीटें प्राप्त हुई और वह कांग्रेस के बाद दूसरे स्थान पर रही और इस तरह विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उसने संसदीय लोकतंत्र में अपनी एक पहचान बनाई। इसने 1957 के चुनावों में 27 और 1962 के चुनावों में 29 सीटें हासिल कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी बढ़ती शक्ति का परिचय दिया।

वर्ष 1957 में उसने केरल विधान सभा चुनावों में 127 सीटों में से 60 सीटों पर विजय हासिल की और पांच स्वतंत्र विधायकों की मदद से ईएमएस नंबूदरीपाद के नेतृत्व में कम्युनिस्ट मंत्रिमंडल का गठन किया।

यह जनतांत्रिक चुनावों के माध्यम से विश्व में कम्युनिस्टों की पहली जीत थी वरन साम्यवादी समानता पर आधारित समाज को ताकत के बल पर स्थापित करने का विचार रखते थे। कम्युनिस्टों के नेतृत्व में गठित इस पहली राज्य स्तर की सरकार ने भूमि सुधारों को लेकर काम करना शुरू ही किया था कि 1959 कांग्रेस ने संविधान के अनुच्छेद 356 का सहारा लेकर उसे गिरा दिया। पर इससे यह स्पष्ट था कि अब तक कि कम्युनिस्ट राष्ट्रीय राजनीति की मुख्य धारा की एक शक्ति बन चुके थे।

पर इस बीच भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर कथित ‘वामपंथी संकीर्णतावादियों’ और ‘संशोधनवादियों’ के बीच का टकराव भीतर ही भीतर सुगबुगा रहा था। 1962 में भारत-चीन युद्ध ने इस टकराव में चिंगारी का काम किया। पार्टी का एक धड़ा खुले आम यह कह कर चीन का पक्ष ले रहा था कि यह तो एक पूंजीवादी और एक कम्युनिस्ट देश के बीच का टकराव है। इस टकराव के फलस्वरूप 1964 में पार्टी का विभाजन हो गया और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी) अस्तित्व में आई। विभाजन के बाद 1967 में बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों में मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी एक बड़ी शक्ति बनकर उभरी और उसने बंगला कांग्रेस के अजय मुखर्जी के नेतृत्व में गठित राज्य सरकार के गठन में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। पर 1977 के बाद से बंगाल में मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी लम्बे समय तक चुनावों के जरिए लगातार सत्ता में बनी रही।

वहीं 1969 में केरल में मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मुस्लिम लीग ने अपना समर्थन वापस ले लिया और इसके बाद वहां कांग्रेस के सहयोग से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के अच्युत मेनन के नेतृत्व में राज्य सरकार का गठन किया गया। पर 1964 के विभाजन के बाद मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के एक धड़े ने उत्तरी पश्चिम बंगाल के नक्सलवाड़ी में किसान विद्रोह का नेतृत्व कर अपने को पार्टी से अलग कर लिया। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादियों) ने इस आंदोलन का समर्थन किया, पर पश्चिम बंगाल सरकार ने जिसमें माकपा प्रमुख साझेदार थी, इस आंदोलन को कुचल दिया।

विभाजन के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ इस आधार पर तालमेल स्थापित किया कि कांग्रेस मूलत: राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग की पार्टी है और क्योंकि राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग इजारेदाराना पूंजीपति वर्ग से कम घातक है, इसलिए उसके साथ तालमेल स्थापित करना भारतीय स्थितियों में उचित होगा।

मार्क्सवादियों पर चीन का असर : दूसरी ओर मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी आरंभ में चीनी मार्क्‍सवाद से प्रेरित रही, पर धीरे-धीरे भारतीय राजनीति के व्यावहारिक धरातल पर उतर आई। इंदिरा गांधी के शासन द्वारा थोपे गए राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान वह अन्य सभी कांग्रेस विरोधी शक्तियों के साथ शामिल हो गई जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, कांग्रेस का पल्ला थामे रही। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल थोपे जाने का समर्थन इस आधार पर किया कि जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में घोर दक्षिणपंथी शक्तियां देश को विभाजित करने पर आमादा थीं। इसमें संदेह नहीं कि ‘संपूर्ण क्रांति’ की आड़ में पुरानी कांग्रेस के सदस्य, लोकदल, जनसंघ और अन्य दक्षिणपंथी राजनीतिक तत्व अपना हित साधने के लिए एकजुट हुए थे, पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने इस तथ्य को नजरअंदाज किया कि कांग्रेस के भीतर भी संजय गांधी की अगुवाई में दक्षिणपंथी तत्व प्रभुत्व में आ चुके थे और कांग्रेस सर्वसत्तावादी चरित्र धारण कर चुकी थी।

आपातकाल के बाद हुए चुनावों में सफाया : आपातकाल के बाद हुए चुनावों में कांग्रेस के साथ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को भी करारी हार का सामना करना पड़ा। उसके लोकसभा सदस्यों की संख्या 1971 के चुनावों में 23 से घटकर 1977 के चुनावों में मात्र सात रह गई। कुछ इस वजह से और कुछ राजनीतिक रूप से अलग-थलग हो जाने के भय से उसने कांग्रेस के साथ अपना गठबंधन तोड़ दिया कि आपातकाल का समर्थन उसकी एक ऐतिहासिक भूल थी। पर पार्टी ने कांग्रेस को कभी राष्ट्रीय पूंजीपति वर्ग की प्रतिनिधि मानने और उसके साथ वामपंथी जनतांत्रिक एकता स्थापित करने के अपने पिछले दृष्टिकोण को क्यों त्यागा इसका विचारधारात्मक स्तर पर स्पष्टीकरण अभी भी सामने नहीं आया है। 1978 के बाद से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में आत्ममंथन की जो नई प्रक्रिया चली उसके फलस्वरूप वामपंथी एकता की स्थापना हुई।

भारतीय वामपंथ के एकजुट होने के साथ ही साथ भारतीय राजनीति में भी बदलाव आने लगे। कांग्रेस का पूर्ण प्रभुत्व समाप्त होने लगा और बिहार, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश और अन्यत्र क्षेत्रीय राजनीतिक दल महत्त्व धारण करने लगे और दक्षिणपंथी भाजपा पूरी तरह से राष्ट्रीय मुख्य धारा का अंग बन गई। वामपंथी एकता स्थापित होने से वामपंथी केवल संसद में एक अधिक बड़ी शक्ति बन गए और मुख्य धारा की राजनीति में हस्तक्षेप करने में और अधिक सक्षम बन गए। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के इंद्रजीत गुप्ता केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने वाले पहले कम्युनिस्ट रहे। एक बार तो ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने की पेशकश भी की गई (जो खुद उनकी पार्टी के कुछ नेताओं ने अस्वीकार कर दिया)। जब हरकिशनसिंह सुरजीत मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव थे तब वामपंथ ने ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाने का प्रयास भी किया।

वामपंथी दल तीसरे विकल्प की बात करते हैं। इस दिशा में वे कई प्रयास कर चुके हैं। पर इस तीसरे विकल्प में वे जिन दलों को शामिल करने का प्रयास करते रहे हैं, उनके साथ तालमेल बनाने का औचित्व वर्ग विश्लेषण के आधार पर वे कभी भी स्पष्ट नहीं कर पाए। मसलन जातीय राजनीति करने वाली मुलायमसिंह यादव की समाजवादी पार्टी का वर्ग विश्लेषण उन्होंने कभी भी नहीं किया। उनके लिए इस दल की प्रासंगिकता केवल इसलिए है कि वह पहले कांग्रेस और फिर भाजपा के विरोध में रही थी। मार्क्‍सवादी विचारधारा को जीवित रखने के लिए यह जरूरी है कि भारतीय वामपंथ एक ऐसा वर्ग दृष्टिकोण अपनाए जो न केवल भारतीय संदर्भ में प्रासंगिक हो, बल्कि उनके वर्गीय आधार का विस्तार भी करे।

Friday, January 29, 2016

कई देशों में फैल चुका है जीका वायरस

जिका वायरस लैटिन अमेरिका के करीब 20 देशों में फैल चुका है और विश्व स्वास्थ्य संगठन को कनाडा और चिली को छोड़कर प्रत्येक अमेरिकी देश में इसके फैलने की आशंका है। डेनमार्क और स्विटजरलैंड लैटिन अमेरिका से लौट रहे लोगों में जिका संक्रमण की रिपोर्ट देने के लिए यूरोपीय देशों की बढ़ती संख्या में जुड़ गए हैं।

तो वहीं मध्य अमेरिका के सबसे छोटे और घनी आबादी वाले देश अल साल्वाडोर ने समूचे मध्य अमेरिका की महिलाओं को सलाह दी है कि वह 'जीका' वायरस के खतरे को देखते हुए वर्ष 2018 तक गर्भधारण करने की योजना ना बनाएं। डेंगू की ही तरह मच्छरों के माध्यम से फैलने वाले 'जीका' वायरस से विश्व के दर्जनों देश प्रभावित हो रहे हैं।

जाइका से लड़ाई के लिए डब्ल्यूएचओ ने कसी कमर 

गुरुवार को हुई बैठक में डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक मार्गेट चेन ने कहा कि जाइका भयंकर रूप ले रहा है और तेजी से फैल रहा है।

कनाडा और चिली को छोड़कर पूरे उत्तरी और दक्षिणी अमेरिकी महाद्वीप में इस वायरस के फैलने के खतरे को देखते हुए संगठन ने यह बैठक बुलाई थी। अमेरिकी महाद्वीपों में चालीस लाख लोगों पर इसके संक्रमण का खतरा मंडरा रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने प्रभावित देशों की यात्रा करने वाले लोगों के रक्तदान करने पर भी रोक लगाने की बात कही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वायरस का संक्रमण नहीं रोका गया तो यह भयानक महामारी का रूप ले सकता है। साथ ही इबोला की तरह हजारों लोगों के मरने का अंदेशा भी जताया जा रहा है।

गौरतलब है कि जाइका वायरस से प्रभावित महिलाएं ऐसे शिशुओं को जन्म दे रही हैं जिनका मस्तिष्क पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता है। लातिन अमेरिका और कैरिबिया के 21 देशों में यह वायरस फैल चुका है। ब्राजील इससे सबसे ज्यादा प्रभावित है। ब्राजील की राष्ट्रपति डिल्मा रोसेफ ने लातिन अमेरिकी देशों से एकजुट होकर इस वायरस से लड़ने की अपील की है। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इससे निपटने के टीकों और उपचार के विकास में तेजी की अपील की है। विशेषज्ञों के अनुसार जाइका वायरस को खत्म करने के लिए टीका तैयार करने में कम से कम दो साल का वक्त लग सकता है।

जीका वायरस के लक्षण:
जीका वायरस से संक्रमित हर पांच में से एक में ही इसके लक्षण दिखते हैं। आम तौर पर संक्रमित व्यक्तियों में जोड़ों में तेज दर्द, आंखें लाल होना, मतली, चिड़चिड़ापन या बेचैनी जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

कहां से आया जीका:
जीका का पहला मामला1947 में युगांडा में मिला था। वर्ष 2015 तक यह वायरस अफ्रीका, एशिया और प्रशांत द्वीपों में भी पाया गया जो अब फैलते हुए अब 14 देशों में में जा चुका है।जीका वायरस को एडीज मच्छर फैलाता है, इसलिए मच्छर के काटने से बचना सबसे जरूरी बचाव है।

बचाव:
अब तक इस वायरस से निपटने के लिए कोई वैक्सीन या दवा नहीं बनी है। फिलहाल तो हर हाल में मच्छरों के काटने से बचना ही एकमात्र एक उपाय है।

Thursday, December 17, 2015

तेल की सुस्ती से ओपेक चिन्तित

तेल की सुस्ती से ओपेक चिन्तित 

कच्चे तेल की गिरती क़ीमतें अब नहीं थम रही हैं. इस वजह से तेल उत्पादक देशों के समूह आर्गेनाईजेशन ऑफ़ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज(ओपेक) में खलबली मची है और सरकारों की कमाई पर असर पड़ रहा है। कच्चे तेल की गिरती क़ीमतों ने अब दुनिया भर के बाज़ारों में भूचाल पैदा कर दिया है. जो लोग कच्चे तेल पर पैनी नज़र रखते हैं उनका मानना है कि गिरती क़ीमत दुनियाभर की कमज़ोर अर्थव्यवस्था के बारे में बता रही है। पिछले हफ़्ते कच्चा तेल 40 डॉलर प्रति बैरल के नीचे चला गया। नाइमेक्स और ब्रेंट की क़ीमतों के आधार पर ये 11 साल में सबसे कम क़ीमत है। गिरती हुई कच्चे तेल की क़ीमतों से ओपेक के 12 देश भी हिल से गए हैं।
अगर क़ीमतें फ़रवरी तक बढ़ती नहीं हैं तो ओपेक ने एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाने का सोचा है ताकि वह ऐसे क़दमों पर विचार कर सके जिससे क़ीमतों में गिरावट को रोक जा सकता है। कच्चे तेल की उत्पादन में कटौती इनमें एक तरीक़ा हो सकता है।ओपेक देश कच्चे तेल के बाज़ार में काफ़ी अहमियत रखते हैं. दुनिया की एक तिहाई कच्चे तेल के उत्पादन करने के कारण वो क़ीमतें बढ़ाने या घटाने की स्थिति में होते हैं। ओपेक में क़तर, लीबिया, सऊदी अरब, अल्जीरिया, नाइजीरिया, ईरान, इराक़, कुवैत जैसे देश इसके सदस्य हैं। इंडोनेशिया दोबारा ओपेक में अगले साल शामिल हो जाएगा। वह उसका तेरहवां सदस्य होगा।
ओपेक देशों के अलावा अर्थव्यवस्था पर नज़र रखने वाले कच्चे तेल की खपत पर ख़ास ध्यान देते हैं। दुनिया भर की फैक्ट्रियों में जो भी उत्पादन हो रहा है उसकी मांग को देखते हुए पेट्रोल, डीज़ल की खपत और जहाज़ों की बुकिंग के आंकड़ों को देख कर इस बात का अंदाज़ा लग जाता है कि अर्थव्यवस्था की हालत कैसी है। कच्चे तेल की ख़रीद और पेट्रोल, डीज़ल की खपत देखते ही अर्थशास्त्री ये कह सकते हैं कि मंदी का दौर ख़त्म हो सकता है। लेकिन फ़िलहाल अर्थशास्त्री मांग में बढ़ोतरी की उम्मीद नहीं कर रहे हैं।
इस कमज़ोर अर्थव्यवस्था का असर रूस जैसे देशों पर भी हो रहा है, जिसकी क़रीब 60 फीसदी सालाना विदेशी मुद्रा की कमाई कच्चे तेल की बिक्री से होती है। क़ीमतें घटने से रूस और उसके जैसे देशों की कमाई भी मारी जाती है। ओपेक देशों में से अल्जीरिया, अंगोला, नाइजीरिया और वेनेज़ुएला जैसे देश अक्सर ये मांग करते हैं कि उत्पादन में कटौती होनी चाहिए क्योंकि उससे गिरती क़ीमतों पर रोक लग सकती है। इन देशों की अर्थव्यवस्था और सरकारी राजस्व कच्चे तेल से होने वाली कमाई पर बहुत ज़्यादा निर्भर है।

ओपेक देशों का लालच भी एक वजह

जैसे-जैसे चीन और भारत की अर्थव्यवस्थाएं अहम होती जा रही हैं, इनकी खपत तेज़ी से बढ़ रही है। कच्चे तेल की क़ीमतों पर खाड़ी और उसके आसपास के देशों में हो रही लड़ाई का भी असर होता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में क़ीमतें गिरने लगती हैं तो ओपेक देशों में थोड़ा लालच भी होता है। ओपेक देश हर साल कम से कम दो बार मिलते हैं। हर मीटिंग में उत्पादन की सीमा पर विचार किया जाता है। लेकिन कुछ देश उससे ज़्यादा कच्चे तेल का भी उत्पादन करते हैं। उन्हें लगता है कि क़ीमतें और भी नीचे जाएंगी तो ऐसे में उन्हें आज ही अपने उत्पाद की बढ़िया क़ीमत मिल जाएंगी।


लगता है कुछ ऐसी ही स्थिति अभी बनी हुई है। ओपेक के मुताबिक़, नवंबर 2015 में उसने 3 करोड़ 17 लाख बैरल का रोज़ाना उत्पादन किया। ये उसके उत्पादन स्तर के मुताबिक़ तीन साल में सबसे ज़्यादा है। कमज़ोर मांग वाले बाज़ार में ओपेक सदस्यों के लालच के कारण शायद गिरती क़ीमतें थम नहीं रही हैं। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतें पिछले दशक की शुरुआत में 10 डॉलर प्रति बैरल के आसपास हुआ करती थीं। लेकिन खाड़ी देशों के बदलते हालात और बढ़ती मांग के कारण पहली बार कच्चे तेल ने 100 डॉलर प्रति बैरल की क़ीमत जनवरी 2008 में पार कर लिया था। और उस साल जुलाई आते-आते क़ीमतें 147 डॉलर प्रति बैरल के अब तक के रिकॉर्ड के ऊपर पहुंच गई थीं।

Tuesday, September 15, 2015

सयुंक्त राष्ट्र महासभा ( UNGC ) का प्रस्ताव और भारत की दावेदारी


सयुंक्त राष्ट्र महासभा ( UNGC ) का प्रस्ताव और भारत की दावेदारी

कल सयुंक्त राष्ट्र महासभा ने सुरक्षा परिषद के विस्तार से संबंधित एक प्रस्ताव को मंजूरी दी। इस प्रस्ताव के सवाल पर भारतीय मीडिया में बहुत ही भ्रामक खबरें आ रही हैं और ऐसा दिखाया जा रहा है जैसे भारत को स्थाई सदस्यता मिलने जा रही है। जबकि इस मामले में दिल्ली ( न्यूयार्क ) अभी बहुत दूर है। कल जो प्रस्ताव पास हुआ है उसके मायने आखिर क्या हैं ?

                    भारत सहित कई देश दुनिया की बदली हुई परिस्थिति में सयुंक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के विस्तार की मांग कर रहे थे। इन देशों में मुख्य रूप से चार देश शामिल हैं, भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील। परन्तु सुरक्षा परिषद के विस्तार का मुद्दा किसी निर्णय पर नही पहुंच पा  रहा था। सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य जिसमे अमेरिका, रूस, चीन, फ़्रांस और ब्रिटेन शामिल हैं इस को लटकाये रखना चाहते थे। ये देश हर रोज अपने भाषणो में अलग  अलग  बातें कहते रहे हैं। इस बातचीत को जिसे एक अंतर सरकार ग्रुप ( IGN ) चला रहा था 2008 से कोई प्रगति नही हो पा रही थी। इसलिए भारत सहित कई देशों ने इस बातचीत के लिए एक लिखित बातचीत ( पाठ  आधारित ) का प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव के अनुसार तय किये गए पांच मुद्दों पर,  ( जिसमे वीटो पावर का मुद्दा भी शामिल है ) हर देश द्वारा लिखित पक्ष रखने को जरूरी किया गया। इस प्रस्ताव का उद्देश्य बातचीत को भाषणो और आश्वासनों से आगे बढ़ाने का था। P -5 के देशों ने इस प्रस्ताव पर नकारात्मक रुख रखा। उनके अलावा 13 देशों का एक समूह जिसमे पाकिस्तान. इटली और दक्षिणी कोरिया शामिल हैं, ने भी इसके खिलाफ रुख अपनाया।

               सयुंक्त राष्ट्र महासभा के नए अध्यक्ष सैम कुटेसा के आने के बाद और उनके प्रयासों से इसमें तेजी आई। सैम कुटेसा ने इस मामले पर अमेरिका, चीन और रूस द्वारा लिखे गए पत्रों को आम जनता के लिए जारी कर दिया जिसमे इस मामले पर उनका रुख साफ होता है।

अमेरिका का रुख -
                                
अमेरिका ने इस विस्तार में किसी भी नए सदस्य को वीटो पावर का विरोध किया और पुराने सदस्यों की वीटो पावर जैसे की तैसे रखने की बात कही। अमेरिका का मानना है की कई देशों के पास वीटो पावर होने से सुरक्षा परिषद में किसी भी प्रस्ताव को पास करना मुश्किल हो जायेगा।

रूस का रुख ----
                        
रूस ने रुख अपनाया की पहले के स्थाई सदस्यों के किसी भी अधिकार में ( वीटो पावर सहित ) कोई भी कटौती ना की जाये।
चीन का रुख -----
                          
 चीन ने सुरक्षा परिषद के विस्तार पर तो सहमति दिखाई परन्तु उसने कहा की नए स्थाई सदस्य बनाने की बजाए अस्थाई सदस्यों की संख्या बढ़ा दी जाये ताकि छोटे और मध्यम देशों को बारी बारी भूमिका निभाने का मौका मिल सके। व्यवहारिक रूप से चीन को भारत की सदस्यता की बजाय जापान की सदस्यता पर ज्यादा एतराज है जो उसका पारम्परिक विरोधी है।
                      
  लेकिन सैम कुटेसा के प्रयासों से इस प्रस्ताव पर सहमति बन गयी और सभी देशों ने सर्व सम्मति से ये प्रस्ताव पास कर दिया। अब आगे की बातचीत पाठ आधारित होगी और किसी नतीजे पर पहुंचना आसान होगा। इस प्रस्ताव के बाद ये उम्मीद बढ़ गयी है की सुरक्षा परिषद के विस्तार का लम्बे समय से लटका हुआ मुद्दा जल्दी हल होगा।

भारत की स्थिति ----
                               
  अभी जो बातचीत चल रही है वो इस मामले पर है की सुरक्षा परिषद के विस्तार का क्या रूप हो। उसमे कितने देशों को शामिल किया जाये। जो नए देश शामिल किये जाएँ वो स्थाई सदस्य हों या अस्थाई हों। अगर स्थाई सदस्य शामिल किये जाएँ तो उनके अधिकार क्या होंगे और क्या उनको वीटो का अधिकार दिया जायेगा या नही। एक बार इस मुद्दे पर सहमति बनने के बाद और विस्तार का फार्मूला तय हो जाने के बाद देशों की दावेदारी पर विचार करने का नंबर आएगा। इसलिए अभी इसे इस रूप में पेश करना की सयुंक्त राष्ट्र महासभा में भारत की दावेदारी पर विचार हो रहा है, गलत होगा। बात एक कदम आगे जरूर बढ़ी है लेकिन भारत के लिए अभी न्यूयार्क बहुत दूर है।




Monday, September 7, 2015

दैनिक समसामयिकी

दैनिक समसामयिकी


1.जी-20, ओईसीडी ने जारी की नई कापरेरेट गर्वनेंस संहिता:-
छोटे शेयरधारकों के हितों की सुरक्षा और पूंजी जुटाने के वास्ते शेयर बाजार को मुख्य मंच के तौर पर स्थापित करने के लिए जी-20 और ओईसीडी ने शनिवार को सूचीबद्ध कंपनियों और नियामकों के लिए कंपनी संचालन के नए नियमों की घोषणा की। ये नियम भारत सहित सभी सदस्य देशों में लागू होंगे। इस घोषणा के बाद भारत में सेबी सहित दुनिया के सभी नियामकों और नीति निर्माताओं को अपने अपने देशों में सूचीबद्ध कंपनियों के नियमनों में सुधार लाना होगा। सूचीबद्ध कंपनियों के मामले में नए नियमों को यहां जी-20 देशों के वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों के गवर्नरों की बैठक के दौरान जारी किया गया। वित्त मंत्री अरुण जेटली और रिजर्व बैंक गवर्नर रघुराम राजन भी इस बैठक में भाग ले रहे हैं।इन नियमों में निवेशकों के अधिकारों की सुरक्षा और कंपनियों में सीईओ के वेतन को तर्कसंगत रखने के साथ ही निवेशकों के फायदे के लिए उपयुक्त खुलासे पर भी जोर दिया गया है। नए नियमों में विभिन्न देशों के बीच नियामकों के बीच सहयोग बढ़ाने और सूचनाओं के आदान प्रदान के लिए द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यवस्था बनाने को कहा गया है। नियमों में यह भी कहा गया है कि शेयरधारकों को एक दूसरे से बातचीत करने और शेयरधारकों द्वारा एक देश से दूसरे देश में मतदान की अड़चनों को दूर किया जाना चाहिए। जी-20 और ओईसीडी द्वारा जारी इन नियमों में कंपनियों द्वारा वित्तीय जानकारी उपलब्ध कराने, बड़े वित्तीय संस्थानों के व्यवहार और शेयर बाजारों के कामकाज के बारे में सिफािरशें दी गई हैं। नियमों में नियामकों से संबंधित पक्षों के बीच लेनदेन में आपसी हितों के टकराव के मुद्दों को प्रभावी ढंग से निपटने की हिदायत दी गई है। आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) के महासचिव एंजेल गुरिया और तुर्की के उप प्रधानमंत्री सेवडेट यिलमाज ने जी-20 देशों की मंत्रिस्तरीय बैठक के दौरान अलग से इस संहिता को जारी किया। यिलमाज ने बाद में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि जी-20 कंपनियों के लिए पूंजी जुटाने के वास्ते पूंजी बाजार की भूमिका को बेहतर बनाना चाहता है। विशेष तौर पर ऐसे समय जब वर्ष 2007-08 के नियंतण्र वित्तीय संकट के बाद बैंकों के सामने समस्या खड़ी हो रही है। हालांकि, कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य नियमों को अपनाना पड़ता है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होता है कि जरूरी पूंजी उनके पास हो और शेयरधारकों के हितों को सुरक्षित रखा जा सके।

2. भारत, ईयू के बीच निकलेगी एफटीए की राह:- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नवंबर, 2015 में होने वाली पहली ब्रिटेन यात्र में वैसे तो कई आर्थिक मुद्दे उठेंगे, लेकिन भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच मुक्त व्यापार समझौते इसमें काफी अहम रह सकता है। भारत में राजग सरकार के आने के बाद यह पहला मौका होगा, जब दोनों देश लंबित आर्थिक मुद्दों पर आगे बढ़ने की पहल करेंगे। ऐसे में एफटीए की अटकी हुई गाड़ी को फिर आगे बढ़ाने के लिए दोनो देशों के शीर्ष नेताओं से स्पष्ट संकेत मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। ब्रिटेन पहले भी ईयू के साथ भारत के एफटीए का बहुत बड़ा समर्थक रहा है। जुलाई, 2015 में यूरोपीय संघ ने 700 से भी ज्यादा भारत निर्मित दवाओं के आयात पर पाबंदी लगाने का फैसला किया था। इसके जबाव में भारत में यूरोपीय संघ के साथ एफटीए पर प्रस्तावित बातचीत को खारिज कर दिया गया था। उसके बाद मोदी यूरोप की यात्र पर जाने वाले भारत के पहले शीर्ष नेता है। ऐसे में भारतीय पक्ष ही एफटीए का मुद्दा उठाना चाहता है। इसके लिए ब्रिटेन की मदद लेने में कोई हिचक नहीं है। भारत और ईयू के बीच वर्ष 2007 से ही मुक्त व्यापार समझौते को लेकर बातचीत का दौर शुरू हुआ था। अभी तक कुल 12 दौर की बातचीत हो चुकी है। कई मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच सहमति भी बन गई थी। हालांकि मोदी सरकार के आने के बाद अभी तक बातचीत का दौर शुरू नहीं हो पाया है। सूत्रों के मुताबिक यह कोई रहस्य नहीं है कि ब्रिटेन भारत के साथ एफटीए को लेकर कितना उत्साहित है। ब्रिटेन की मंशा है कि अगर भारत और ईयू के बीच एफटीए को लेकर बात आगे नहीं बढ़ पाती है तो फिर द्विपक्षीय स्तर पर ही एफटीए को लेकर बातचीत आगे बढ़ाई जाए। ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन स्वयं भारत के साथ एफटीए के समर्थक हैं। पिछली बार जब वह भारत की यात्र पर आए थे, तब उन्होंने यह मंशा जताई थी कि दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर तेजी से बात होनी चाहिए। माना यह जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने ब्रिटिश पीएम डेविड कैमरन इस मुद्दे को फिर उठाएंगे। भारत के उद्योग जगत की इस पूरे घटनाक्रम पर खास नजर होगी।

3. जीएसटी आने पर जीडीपी गणना होगी कठिन:- वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) भले ही संसद के गतिरोध से अटक गया हो, लेकिन केंद्र सरकार के अलग-अलग विभाग इसके क्रियान्वयन के लिए जरूरी तैयारियां करने में जुटे हैं। वित्त मंत्रलय के अलावा सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रलय भी प्रमुखता से इस काम को कर रहा है। इस मंत्रलय के अधिकारी जीएसटी के लागू होने पर देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की गणना में आने वाली जटिलता को समझने को अभी से जुट गए हैं। मंत्रलय के एक शीर्ष अधिकारी ने कहा कि जीएसटी के लागू होने के मद्देनजर केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) के अधिकारी अभी से वित्त मंत्रलय तथा राज्यों के विभिन्न विभागों के साथ मिलकर जीडीपी की गणना में आने वाली तमाम जटिलताओं को दूर करने की कोशिश कर रहे हैं। राजस्व विभाग ने जीएसटी नेटवर्क तैयार किया है, उस पर भी अधिकारियों को प्रशिक्षण दिए जाने का कार्यक्रम है। इस अधिकारी के मुताबिक, जीएसटी उपभोग आधारित टैक्स होगा। इसलिए किसी राज्य के बाहर कितनी वस्तुएं गई हैं और उक्त सूबे में कितनी वस्तुओं का उपभोग हुआ है, इस बारे में आंकड़े जुटाने का अभी कोई तंत्र उपलब्ध नहीं है। इसलिए जीडीपी के आकलन में जटिलता आने के आसार हैं। मोदी सरकार ने एक अप्रैल, 2016 से जीएसटी लागू करने का लक्ष्य रखा है। एक अनुमान के मुताबिक जीएसटी के लागू होने पर सकल घरेलू उत्पाद में एक से दो प्रतिशत तक की वृद्धि हो जाएगी। वित्त मंत्री ने जीएसटी को आजादी के बाद अब तक का सबसे बड़ा टैक्स सुधार करार दिया है। वित्त मंत्रलय ने वस्तु व सेवा कर की तैयारियों की दिशा में कदम बढ़ाते हुए एक जीएसटी निदेशालय बनाया है। इसी तरह के निदेशालय राज्यों में भी बनाने का प्रस्ताव है।

4. ओआरओपी लागू, पूर्व फौजी नाराज :- वन रैंक, वन पेंशन (ओआरओपी) के लिए बीते करीब चार दशकों से जोर दे रहे पूर्व सैन्यकर्मियों ने शनिवार को उस वक्त आंशिक विजय हासिल की जब सरकार ने ऐलान किया कि वह इस योजना का कार्यान्वयन करेगी। दूसरी तरफ, पूर्व सैन्यकर्मियों ने इस फैसले को खारिज कर दिया और कहा कि उनका 84 दिनों से चला आ रहा आंदोलन जारी रहेगा।रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा कि ओआरओपी को 2013 के कैलेंडर वर्ष के आधार पर एक जुलाई, 2014 से लागू किया जाएगा। सरकार ने पूर्व सैन्यकर्मियों से कहा कि अपना आंदोलन खत्म कर दें क्योंकि उनकी ओआरओपी की मांग स्वीकार कर ली गई है। संसदीय कार्य मंत्री एम. वेंकैया नायडू ने कहा कि सरकार इससे संबंधित मुद्दों पर बातचीत करने के लिए तैयार है। पर्रिकर ने ऐलान किया सरकार ने ओआरओपी के क्रियान्वयन का फैसला किया है जिसके तहत हर पांच साल पर पेंशन में संशोधन किया जाएगा, लेकिन इसके दायरे में वे सैन्यकर्मी नहीं आएंगे जिन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) ले रखी है। पूर्व सैन्यकर्मी दो साल के अंतराल पर पेंशन की समीक्षा की मांग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ओआरओपी के क्रियान्वयन के विवरण पर काम करने के लिए एक सदस्यीय न्यायिक समिति का गठन कर रही है जो इस जटिल मुद्दे के कई पहलुओं की पड़ताल करने के बाद छह महीने में रिपोर्ट देगी।विशेषज्ञों से होगा विचार-विमर्श : पर्रिकर के अनुसार इस योजना के क्रियान्वयन पर 8,000-10,000 करोड़ रपए का खर्च आएगा। बकाये के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि बकाये की राशि का भुगतान छह-छह माह की चार किश्तों में किया जाएगा। बहरहाल, युद्ध में शहीदों की पत्नियों तथा दूसरे दिवंगत सैन्यकर्मियों की पत्नियों को बकाये की राशि एक किश्त में दी जाएगी। इस योजना के तहत करीब 26 लाख सेवानिवृत्त सैन्यकर्मियों तथा छह लाख से अधिक शहीदों की पत्नियों को लाभ होगा। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि सरकार एक माह के भीतर ओआरओपी पर एक विस्तृत आदेश के साथ आएगी। पर्रिकर ने कहा कि सरकार ने विशेषज्ञों के साथ गहन विचार-विमर्श किया है तथा भारी वित्तीय बोझ के बावजूद ओआरओपी लागू करने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि पूर्व की सरकार ने अनुमान लगाया था कि ओआरओपी को 500 करोड़ रपए के बजट के प्रावधान के साथ लागू किया जाएगा। वास्तविकता यह है कि ओआरओपी के क्रियान्वयन पर 8,000 से 10,000 करोड़ का अनुमानित खर्च आएगा और भविष्य में आगे बढ़ता रहेगा।केंद्रीय मंत्रियों ने की आंदोलन खत्म करने की अपील : संसदीय कार्य मंत्री नायडू ने पूर्व सैन्यकर्मियों से आंदोलन खत्म करने की अपील करते हुए कहा, ‘‘सरकार बातचीत की हमेशा इच्छुक है। मुख्य मुद्दे का समाधान कर लिया गया है। बातचीत के जरिए दूसरे मुद्दों को भी हल किया जा सकता है।गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि ओआरओपी को लेकर अगर कोई कमी है

5. चीन की सेना से हटेंगे 1.70 लाख अधिकारी:- चीन द्वारा अपने सैनिकों की संख्या में कटौती करने की नए पहल से करीब 1.70 लाख अधिकारी कम हो जाएंगे क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी सेना अपनी वर्तमान सात कमान और तीन कोर में से दो को खत्म करने की योजना बना रही है ताकि सुरक्षा बल को व्यवस्थित किया जा सके। वर्तमान में चीनी सैनिकों की संख्या 23 लाख है।हांगकांग के साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने अज्ञात सैन्य अधिकारियों के हवाले से लिखा है कि राष्ट्रपति शीन जिनपिंग द्वारा पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को व्यवस्थित करने की योजना में तीन लाख सैनिकों में से करीब आधे अधिकारी हैं जिन्हें हटाया जाना है। पोस्ट ने चीन के अधिकारियों के हवाले से लिखा है कि वर्तमान सात सैन्य कमान और तीन सैन्य कोर में से दो को खत्म कर देने से चीन की थलसेना में लेफ्टिनेंट से लेकर कर्नल तक 1.70 लाख अधिकारी हटा दिए जाएंगे। उन्हें समय पूर्व सेवानिवृत्ति के पैकेज की पेशकश की जाएगी।हर सैन्य कमान में दो से तीन सैन्य कोर हैं और हर कोर में 30 हजार से 50 हजार सैनिक हैं। दो कमान को हटा देने का मतलब है कि करीब एक लाख 20 हजार सैनिक कम हो जाएंगे। बड़ी संख्या में सैनिकों को कम करने की योजना का उद्देश्य थल सेना के पायलटों का वायुसेना और नौसेना में विलय करना है क्योंकि पीएलए संयुक्त अभियान युद्धकौशल की योजना बना रही है। दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य ताकत पीएलए इस महीने के अंत तक सैनिकों को कम करने के ब्यौरे की घोषणा कर सकता है। जापान के खिलाफ जीत की 70वीं वर्षगांठ के अवसर पर शी द्वारा तीन लाख सैनिकों को कम करने की घोषणा के तुरंत बाद रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता यांग युजुन ने स्पष्ट किया कि इस पहल का उद्देश्य सेना का आधुनिकीकरण और पुनर्गठन करना है तथा कटौती की प्रक्रि या 2017 तक पूरी हो जाएगी। पोस्ट ने खबर दी है कि पेइचिंग सेना को छोड़कर सभी प्रांतीय और निगम की सेनाओं को बंद कर दिया जाएगा और 50 हजार सैनिकों को बर्खास्त किया जाएगा। पेइचिंग सेना पीएलए के शक्तिशाली सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के तहत आती है और राजधानी की रक्षा करती है।सूत्रों ने कहा, चिकित्सा, संचार और कला ब्रिगेड जैसी गैर युद्धक इकाइयों के कम से कम एक लाख सैनिक हटाए जाएंगे और सीमा पर तैनात 50 हजार सैनिकों का पीपुल्स आम्र्ड पुलिस में विलय किया जाएगा। जिन्हें हटाया जाएगा उन्हें अच्छा पैकेज दिया जाएगा और 50 हजार सैनिकों का नागरिक पदों पर स्थानांतरण किया जाएगा। कुछ को जल्द सेवानिवृत्त होने के लिए भी आकर्षक पैकेज मिलेगा। सेना का पुनर्गठन पूरा होने पर पीएलए में पांच मुख्य सैन्य कमान होंगे। अधिकारियों ने बताया, इन पांच कमान के अंदर बचे 15 सैन्य कोर वायुसेना और नौसेना के अधिकारियों की भर्ती कर संयुक्त अभियान कमान को मजबूती देंगे। चीन को अमेरिका और रूस के बाद तीसरी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति माना जाता है। दुनिया के सुपर पावर अमेरिका के पास 14 लाख सैन्यकर्मी हैं जबकि 11 लाख रिजर्व सैनिक हैं।

6. अमेरिका, सऊदी जारी रखेंगे सुरक्षा सहयोग:- अमेरिका और सऊदी अरब मध्य पूर्व में विशेषकर ईरान से क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे का मुकाबला करने के लिए सुरक्षा सहयोग जारी रखेंगे। व्हाइट हाउस के मुताबिक, सऊदी अरब के शाह सलमान बिन अब्द अल अजीज ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से साथ मुलाकात की। दोनों देशों ने एक संयुक्त बयान में क्षेत्र में सुरक्षा, संपन्नता और स्थिरता को कायम रखने के प्रयास की जरूरत बताई। शाह ने ईरान और विश्व के प्रमुख छह देशों के बीच समझौते के तहत संयुक्त व्यापक कार्ययोजना का समर्थन किया। दोनों देशों ने कहा कि इसके पूरी तरह लागू हो जाने पर ईरान के परमाणु हथियार बनाने पर रोक लगेगी और क्षेत्र में सुरक्षा बढ़ेगी। अमेरिका और सऊदी अरब की दोस्ती से केवल दो देशों को फायदा नहीं होगा बल्कि संपूर्ण विश्व को इससे फायदा होगा। दोनों ने आतंकी संगठन आईएस से मुकाबले के लिए भी सैन्य सहयोग जारी रखने का समर्थन किया। ईरान को फिलहाल राहत नहीं : अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आइएईए) द्वारा परमाणु समझौते के सत्यापन तक ईरान को प्रतिबंध से राहत नहीं मिलेगी। अमेरिका के वित्त मंत्री जैकब लिउ ने जापान के उप प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री तारो असो के साथ मुलाकात के दौरान यह जानकारी दी। जी-20 देशों के वित्त मंत्रियों की बैठक से इतर दोनों नेताओं ने संयुक्त व्यापक कार्ययोजना पर भी चर्चा की। लिउ ने कहा कि ईरान के खिलाफ आतंकवाद और क्षेत्रीयता अस्थिरता के खतरे को लेकर लगाया गया प्रतिबंध अभी जारी रहेगा।


Tuesday, August 4, 2015

अटल पेंशन योजना

अटल पेंशन योजना
अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana) कम लागत पर दी जाने वाली पेंशन योजना हैं यह पेंशन असंगठित एवम छोटे क्षेत्रों में कार्य करने वाले लोगो को आर्थिक रूप से सुरक्षित करने हेतु लॉन्च की गई हैं |यह 60 साल से अधिक की आयु वाले लोगो के लिए की जाने वाली आर्थिक मदद हैं जिसे वे खुद अपनी जवानी में अर्जित करेंगे |
Atal Pension Yojana Launch Date अटल पेंशन योजना तिथी :
अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana) 1 जून 2015 को शुरू की जाएगी |सरकार का कहना हैं वर्ष 2010-11 में शुरू की गई स्वालंबन पेंशन योजना में कुछ खामी हैं जिन्हें Atal Pension Yojana में दूर कर दिया गया हैं | साथ ही स्वावलंबन योजना से जुड़े लोगों को अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana)से जोड़ दिया जायेगा |
Atal Pension Yojana Features In Hindi:
अटल पेंशन योजना के लिए योग्यता Eligibility Criteria For Atal Pension Yojana
अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana) से 18 वर्ष से 40 वर्ष तक के नागरिक जुड़ सकते हैं इस तरह इस योजना में नागरिक का योगदान 20 वर्षो का होगा |
अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana) में धारक का आधार कार्ड होना आवश्यक हैं ताकि योजना के लाभ आसानी से उपभोक्ता को मिले अगर अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana) से जुड़ते वक्त उपभोक्ता का आधार कार्ड नहीं हैं तब वह बाद में आधार कार्ड सबमिट कर सकता हैं | अर्थात अटल पेंशन योजना Atal Pension Yojana  में दाखिला लेते वक्त आधार कार्ड रूकावट नहीं बनेगा परन्तु कुछ समय बाद आधार नम्बर देना जरुरी हैं |
सेविंग बैंक अकाउंट होना चाहिये |
अटल पेंशन योजना में कितनी पेंशन मिलेगी (How Much Amount Will Get In Atal Pension Yojana)
अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana) में 1000 रुपये से 5000 रुपये तक की पेंशन राशि मिलेगी |
यह राशि नागरिक पर निर्भर करेगी अर्थात व्यक्ति किस उम्र में इस अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana) से जुड़ा |
दूसरा नागरिक ने कितना योगदान दिया |
देखे कितनी राशि पर कितनी  पेंशन मिलेगी Pension Calculation In Atal Pension Yojana
अगर उपभोक्ता 42 रूपये प्रति माह अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana) के तहत जमा करता हैं तब उसे 60 वर्ष की उम्र के बाद 1000 रूपये प्रति माह पेंशन मिलेगी |
अगर उपभोक्ता 210 रुपये प्रति माह अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana) के तहत जमा करता हैं तब उसे 60 वर्ष की उम्र के बाद 5000 रूपये प्रति माह पेंशन मिलेगी |
Atal pension Premium Chart
पेंशन आंकड़ा उपभोक्ता के अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana) से जुड़ने के समय एवं उनके योगदान पर निर्भर करेगा जो कि निम्न बिन्दुओं में हैं  |
1000 रूपये की मासिक  पेंशन एवं 1.7 लाख उत्तराधिकारी राशि के लिए उपभोक्ता द्वारा किया जाने वाला योगदान जो कि उपभोक्ता की उम्र के अनुसार कितना होगा टेबल में देखे  |
SN अटल पेंशन से जुड़ते वक्त उपभोक्ता की उम्र उपभोक्ता का मासिक योगदान उपभोक्ता का सांकेतिक मासिक योगदान
1 42 42 42
2 40 40 50
3 35 35 76
4 30 30 116
5 25 25 181
6 20 20 291
2000 रूपये की मासिक  पेंशन एवम 3.4 लाख उत्तराधिकारी राशि के लिए उपभोक्ता द्वारा किया जाने वाला योगदान जो कि उपभोक्ता की उम्र के अनुसार कितना होगा टेबल में देखे  |
SN अटल पेंशन से जुड़ते वक्त उपभोक्ता की उम्र उपभोक्ता द्वारा किया जाने वाला योगदान वर्षो में उपभोक्ता का सांकेतिक मासिक योगदान
1 18 42 84
2 20 40 100
3 25 35 151
4 30 30 231
5 35 25 362
6 40 20 582
3000 रूपये की मासिक  पेंशन एवम 5.1 लाख उत्तराधिकारी राशि के लिए उपभोक्ता द्वारा किया जाने वाला योगदान जो कि उपभोक्ता की उम्र के अनुसार कितना होगा टेबल में देखे  |
SN अटल पेंशन से जुड़ते वक्त उपभोक्ता की उम्र उपभोक्ता का मासिक योगदान उपभोक्ता का सांकेतिक मासिक योगदान
1 42 42 126
2 40 40 150
3 35 35 226
4 30 30 347
5 25 25 543
6 20 20 873
4000 रूपये की मासिक  पेंशन एवम 6.8 लाख उत्तराधिकारी राशि के लिए उपभोक्ता द्वारा किया जाने वाला योगदान जो कि उपभोक्ता की उम्र के अनुसार कितना होगा टेबल में देखे  |
SN अटल पेंशन से जुड़ते वक्त उपभोक्ता की उम्र उपभोक्ता का मासिक योगदान उपभोक्ता का सांकेतिक मासिक योगदान
1 42 42 168
2 40 40 198
3 35 35 301
4 30 30 462
5 25 25 722
6 20 20 1164
5000 रूपये की मासिक  पेंशन एवम 8.5 लाख उत्तराधिकारी राशि के लिए उपभोक्ता द्वारा किया जाने वाला योगदान जो कि उपभोक्ता की उम्र के अनुसार कितना होगा टेबल में देखे  |
SN अटल पेंशन से जुड़ते वक्त उपभोक्ता की उम्र उपभोक्ता का मासिक योगदान उपभोक्ता का सांकेतिक मासिक योगदान
1 42 42 210
2 40 40 248
3 35 35 376
4 30 30 577
5 25 25 902
6 20 20 1454
उपभोक्ता किस तरह से अटल पेंशन योजना में योगदान देगा Payment Mode In Atal Pension Yojana
योगदान राशि उपभोक्ता के खाते से बैंक द्वारा ले ली जायेगी | यह प्रक्रिया auto-debit facility के तहत पूरी होगी | इस ऑटो डेबिट फेसिलिटी के कारण समय एवं अन्य खर्चे में बचत होगी साथ ही तारीख याद रखने की परेशानी भी नहीं होगी |
सरकार की तरफ से अटल पेंशन योजना में किया जाने वाला योगदान Contribution By Government In Atal Pension Yojana
31 दिसंबर 2015 से पहले जो व्यक्ति इस अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana) का हिस्सा बनते हैं उन्हें सरकार द्वारा 50 % का योगदान दिया जायेगा | यह सरकारी योगदान अधिकतम 1000 रूपये प्रति वर्ष होगा | साथ ही यह योगदान पहले 5 वर्षो तक ही दिया जायेगा |
साथ ही यह फेसिलिटी उन्हीं को दी जायेगी जो आय कर दाता नहीं हैं एवम जिनकी EPF एवम EPS अकाउंट नहीं हैं  |
अटल पेंशन योजना के तहत दंड Penalty Criteria In Atal Pension Yojana In Hindi)
अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana) के तहत उपभोक्ता द्वारा राशि देने में देरी करने पर बैंक द्वारा दंड राशि ली जाएगी जो कि 1 रुपए से 10 रुपये के बीच होगी |
अटल पेंशन योजना के तहत दंड इस प्रकार हैं
अगर उपभोक्ता ने 100 रुपये तक का भुगतान किया हैं तो दंड 1 रूपये प्रति माह होगा |
अगर उपभोक्ता ने 101 रुपये से 500 रूपये तक का भुगतान किया हैं तो दंड 2 रूपये प्रति माह होगा |
अगर उपभोक्ता ने 501 रुपये से 1000 रूपये तक का भुगतान किया हैं तो दंड 5 रूपये प्रति माह होगा |
अगर उपभोक्ता ने 1000 रुपये से अधिक का भुगतान किया हैं तो दंड 10 रूपये प्रति माह होगा |
अगर अटल पेंशन योजना Atal Pension Yojana के तहत भुगतान में अधिक देरी की जाए तो अकाउंट के साथ की जाने वाली कार्यवाही निम्नानुसार होगी
Rules of Deactivation Account In Atal Pension Yojana In Hindi
अगर 6 महीने तक अकाउंट में पैसा ना डाला गया तो अकाउंट फ्रिज़ किया जायेगा |
अगर 12 महीने तक अकाउंट में पैसा ना डाला गया तो अकाउंट डीएक्टिवेट किया जायेगा |
अगर 24 महीने तक अकाउंट में पैसा ना डाला गया तो अकाउंट बंद कर दिया जायेगा |
अटल पेंशन योजना के तहत कुछ महत्वपूर्ण बिंदु Key Points Of Atal Pension Yojana In Hindi
अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana)के तहत पेंशन धारक को 60 वर्ष पूरा करते ही मिलेगी |
अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana)के तहत अगर 60 वर्ष की आयु के बाद धारक की मृत्यु हो जाती हैं तब पेंशन उसकी पत्नी अथवा पति को मिलेगी | अगर दोनों की मृत्यु हो जाती हैं तब नॉमिनी को  Corpus अमाउंट  मिलेगा जो कि 1000 रुपये पेंशन के लिए 1.7 लाख एवम 5000 रुपये पेंशन के लिए 8.5 लाख होगा |
अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana )के तहत अगर धारक की मृत्यु 60 वर्ष से पहले ही हो जाती हैं तब जमा की गई राशि ब्याज सहित नॉमिनी को दे दी जाएगी और अकाउंट बंद कर दिया जायेगा |
अटल पेंशन योजना के लाभ Advantages Of Atal Pension Yojana In Hindi
अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana) में धारक को 1 हजार रुपये से 5 हजार रुपये तक की पेंशन मिलने की पूरी गेरेंटी होती हैं |
अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana) के तहत उन लोगो को फायदा मिलेगा, जो किसी स्ट्रक्चर्ड नौकरी में नहीं हैं |
अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana) के तहत वे लोग जो करदाता नहीं हैं उन्हें सरकार का योगदान मिलेगा |
अटल पेंशन योजना (Atal Pension Yojana) गरीबो के लिए लाभकारी हैं |
Atal Pension Yojana In Hindi यह सरकारद्वारा किया गया अहम फैसला हैं क्यूंकि जब तक मनुष्य जवान हैं हर परिस्थिती का सामना कर सकता हैं पर वृद्धावस्था में आई कठिनाई मनुष्य को तोड़ देती हैं | ऐसे में Atal Pension Yojana जैसी योजना जीवन को कुछ हद तक सहारा देती हैं….

Friday, July 10, 2015

खाली पेट पानी पीने के 10 फायदे ..

खाली पेट पानी पीने के 10 फायदे ..

स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं के लिए हम दवाओं का सेवन करते हैं,और कई उपाय आजमाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं, कि बहुत सी स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान केवल पानी में छुपा हुआ है। सि‍र्फ पानी पीकर आप खुद को स्वस्थ और उर्जावान बनाए रख सकते हैं। जानिए पानी पीने के यह 10 फायदे-

1 -  विषैले तत्व करे बाहर -  भरपूर मात्रा में पानी पीने से, शरीर में मौजूद हानिकारक एवं विषैले तत्व पसीने व मूत्र द्वारा शरीर से बाहर निकल जाते हैं। जिससे विषाणुओं से बचाव होता है, बीमारियां नहीं होती। सुबह के वक्त खाली पेट पानी पीने से शरीर की बेहतर सफाई होती है।

2  पेट संबंधी समस्या-  सुबह उठकर खाली पेट पानी पीने से पेट की सारी समस्याएं खत्म हो जाती हैं।इससे कब्ज में राहत मिलती है, आंतों में जमा मल निकलने में आसानी होती है, जिससे पेट पूरी तरह से साफ होता है, और भूख भी खुलती है।

3  तनाव से राहत- सुबह खाली पेट एवं दिनभर पानी पीते रहने से तनाव नहीं होता, और मानसिक समस्याएं भी ठीक हो जाती हैं। जब आप सोकर उठते हैं, तो दिमाग शांत होता है। ऐसे समय पानी पीना दिमाग को ऑक्सीजन प्रदान कर, उसे तरोजाता बनाए रखता है, जिससे दिमाग सक्रिय रहता है।

4  वजन कम करे-  सुबह के वक्त एकदम ठंडा पानी पीने से आपका मेटाबॉलिज्म 24 प्रतिशत तक बढ़ता है, जिससे वजन आसानी से कम होता है, वहीं गरम पानी पीने से भी अतिरिक्त चर्बी कम होती है, और आपका वजन कम हो जाता है।

5  पेशाब संबंधी समस्याएं-  सुबह खाली पेट पिया जाने वाला पानी, रातभर शरीर में बने हानिकारक तत्वों को एक ही बार में पेशाब के जरिए निकालने का काम करता है, इसके साथ ही समय-समय पर भरपूर मात्र में पानी पीते रहने पर, पेशाब में जलन, यूरि‍न इंफेक्शन एवं अन्य समस्याएं समाप्त हो जाती है।

6  त्वचा बने स्वस्थ- खाली पेट पानी पीने से कोशिकाओं को ऑक्सीजन मिलती है, और वे सक्रिय रहती हैं, जिससे त्वचा पर ताजगी बनी रहती है। इसके साथ ही पसीने द्वारा हानिकारक तत्व शरीर से बाहर निकलने पर, त्वचा अंदर से साफ होती है और उसमें नमी बनी रहती है, जिससे त्वचा स्वस्थ व चमकदार दिखाई देती है।

7  शरीर का तापमान- खाली पेट पानी पीने से दिन की शुरूआत से ही आपके शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है, जिससे छोटी- छोटी बीमारियों से शरीर सुरक्षित रहता है।


8   रोग प्रतिरोधक क्षमता-  पानी शरीर में अवांछित तत्वों को रहने नहीं देता, और शरीर के सभी अंगों को स्वस्थ बनाए रखता है। इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

9   नई कोशि‍का-  पानी रक्त में हानिकारक तत्वों को घुलने नहीं देता, और उसके शुद्धि‍करण में सहायक होता है, जिससे नई कोशि‍काओं और मांसपेशि‍यों के बनने की प्रक्रिया बढ़ जाती है ।

10  नमी बनाए रखे-  सुगमता से कार्य करने के लिए शरीर के अंगों में नमी को होना बेहद आवश्यक है, जिसे बनाए रखने का कार्य पानी करता है। इसलिए दिन की शुरूआत में ही खाली पेट पानी पीना बेहतर होता है, ताकि पूरा दिन शरीर के सभी अंग सुगमता से कार्य कर सकें ।