मुंबई में इन दिनों इन्द्र देवता मेहरबान हैं। सागर उफान मार रहा है। साथ में हड़ताल राज्य सरकार के ऊपर ज्वार भाटा की तरह आ रही है। पहले तो मानसून ने महाराष्ट्र में बहुत देर से दस्तक दी। इसके बाद दस्तक का जो सिलसिला शुरू हुआ वो अभी तक राज्य सरकार के ऊपर मुसीबत बनाकर आता जा रहा है। पहले रेसिडेंट डॉक्टरों ने हड़ताल की। अपनी मांगों पर अड़ गए। और न राज्य सरकार झुकी, न ही डॉक्टर । अंततः सरकार को झुकाना पड़ा और फ़िर तो इसके बाद महाराष्ट्र के सरकारी कर्मचारियों का मिजाज़ ही बदल गया। और अब डाक्टर , शिक्षक हड़ताल पर चले गए है।
वैसे अगर देखा जाए तो सर्वोच्च न्यायालय ने बंद और हड़ताल पर पाबंदी लगा रखा है। बावजूद इसके अपनी मांगों को लेकर विभिन्न संगठन गाहे- बगाहे हड़ताल करने से बाज नहीं आ रहे हैं। वे मानकर चलते हैं किअपनी मांगें मनवाने का यही एक रास्ता है। घी कभी सीधी उंगली से नहीं निकलता है। कई श्रम संगठन आज भी हड़ताल को अपना अधिकार मानते हैं। हड़ताल करने वाले कभी ये नहीं सोचते कि हड़ताल करने से आम जनता में क्या असर पड़ेगा। और जनजीवन कितना प्रभावित होगा। जब समझौता और समाधान के सभी रस्ते बंद हो जाए तो हड़ताल करना उनका अन्तिम अस्त्र बनता है।
अगर अतीत में जाएँ तो मुंबई में दत्ता सावंत हड़ताल कराने में अग्रणी थे। उन्होंने कपडा मिल मालिकों की लम्बी हड़ताल कराई थी। इससे फायदा नहीं बल्कि बहुत बड़ा नुकसान हुआ था। मिल मालिक झुके नहीं और मजदूरों पर भुखमरी और बेकारी की नौबत आ गयी। मिल मालिकों ने मिलों की जमीन को बेंचकर अपनी रकम खड़ी कर ली। और मजदूरों के परिवारों पर तबाही टूट पड़ी। हड़ताल जब लम्बी खिचती है तो मालिक या नियोक्ता नहीं बल्कि सीमित साधनों वाला श्रम जीवी वर्ग इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। यानी कि चाकू खरबूजे पर गिरे या फ़िर खरबूजा चाकू पर गिरे। नुकसान खरबूजे का ही होना है।
अभी रेसिडेंट डॉक्टरों का इलाज हुआ ही था कि वैद्यकीय अधिकारी और प्राध्यापक बीमार हो गए हैं। वो भी इन दिनों सरकार से मांगे मनवाने में अडे हुए हैं। ज़ाहिर है इस हड़ताल से मरीजों का इलाज और छात्रों की शिक्षा पर विपरीत असर पडेगा।लेकिन जब सरकार की नीतियां ही ग़लत हो तो असंतोष के बादल फटना लाज़मी है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि जब सरकार हड़तालियों की मांगें मान लेती है तो फ़िर आखिरकार सरकार इतना देर क्यों लगाती है। जिससे अव्यवस्था फैलती है। देश का विकास रुक जाता है। और देश आगे बढ़ने के बजाय पीछे की ओर जाता है। अब क्या ये माना जाए कि आज नेताओं में वो क्षमता नहीं है जो विवेक का इस्तेमाल करके किसी समस्या के उत्पन्न होने से पहले उसका समाधान ढूंढ सकें। जब सब कुछ नुकसान हो जाता है तब सरकार के दिमाग की नसें काम करना शुरू करती है। साल भर का लेखा - जोखा लिया जाए तो डॉक्टरों, शिक्षकों,बैंक कर्मियों, एयर लाइंस कर्मचारियों , उद्योग में कार्यरत श्रमिकों की हड़ताल होती ही रहती है। हड़ताल तो विदेशों में भी होती रहती है। लेकिन वहाँ का तरीका अलग है। जापान में एक जूता फैक्ट्री में हड़ताल हुयी तो कर्मचारियों ने अपना विरोध प्रकट कराने के लिए इस दौरान एक ही पैर का जूता बनाया। उन्होंने काम करते हुए अपना विरोध जारी रखा। अंततः प्रबन्धन झुका और मांगें पूरी हो गयी।
अब तो मुंबई में बारिश के मौसम में जहाँ हाई टाइड की धमकी मिलती है तो वही सरकारी कर्मचारी भी पानी की बूँद में हड़ताल की फुहार मार रहे हैं।
देश के नजरिये से अगर इस दौर में सरकार को परिभाषित किया जाये तो पहले देश बेचना, फिर देश की फिक्र करना और अब फिक्र करते हुये देश को अपनी अंगुलियो पर नचाना ही सरकार का राजनीतिक हुनर है।
Friday, July 24, 2009
Thursday, July 23, 2009
पवार का पावर गुल
भारत एक कृषि प्रधान देश है। यह बात अब केवल किताबों में ही सीमित रह गयी है। कृषि प्रधान देश का झुनझुना बजता रहता है। किसान आत्महत्या करते रहते हैं। खाद्य पदार्थों के दाम आसमान छू रहे हैं। देश वासियों की थाली से आज दाल की कटोरी गायब होती जा रही है। और देश के कृषि मंत्री जी के पास अभी तक कृषि से सम्बंधित कोई नीति नहीं बनी है।
दरअसल किसी नेता की पहचान उसके कार्य कलापों से होती है। केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार भी इसके अपवाद नहीं हैं। महाराष्ट्र की राजनीति के चतुर खिलाड़ी , राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार का मतलब क्रिकेट, शक्कर कारखाने और जमीन तक सीमित रह गया है। और इसी में उनकी रुचि है। यही वजह है की कृषि और किसान उनके चछु से ओझल हैं। अगर वाकई पवार अपना पावर (ताकत) कृषि विभाग पर लगाते तो आज किसान आत्म ह्त्या नहीं करते। जिस तरह रोम जलाता रहा और सम्राट नीग्रो बेफिक्र बासुरी बजाते रहे। वैसे ही शरद पवार भी गेंद-बल्ला और राजनीति में इतने उलझे हुए हैं कि किसानो के प्रति हितैषी नीति बनाने के लिए उनके पास फुरसत ही नहीं मिलती महाराष्ट्र के अलावा अन्य राज्यों में भी किसानो ने आत्म हत्या की है। बुंदेलखंड में तो सूखा पीड़ित किसानो को २५-३० रुपये के चेक देकर उनकी असहायता का माखौला उड़ाया गया है। महाराष्ट्र के कपास ,संतरा उत्पादक किसानो की अत्यन्त दुर्दशा हुई है। कर्ज के बोझ और अपमान जनक तकाजों से तंग आकर हजारों किसानो ने मौत को गले लगाना बेहतर समझा । जबकि पवार को यह देखने का मौका ही नहीं मिला कि किसानो के घर में चूल्हा जला या नहीं। जब ज्यादा मुसीबत आयी तो विदेश से घटिया गेहूं मंगा लिया । जिसे जानवर भी खाए तो मर जाए और इंसानों को परोस दिया। इतने सालों से पवार ने अभी तक ऐसी कोई कृषि नीति नहीं बनायी है जिससे दलहन और तिलहन का उत्पादन बढाया जा सके। आज लोगों की थाली से दाल की कटोरी गायब होती जा रही है। शक्कर के दाम अनाप शनाप हैं। यह गोरख धंधा पवार भी जानते हैं। कृषि मंत्री जी को केवल गन्ना और अंगूर उत्पादक किसान ही नजर आते हैं। कपास उत्पादक किसानो की और वो नहीं देखते।और विदर्भ के किसानो की ओर देखना पसंद ही नहीं करते। अगर अंगूर से बनने वाली शराब को बढ़ावा दिया जा सकता है तो क्या पवार साहब विदर्भ के आदिवासी क्षेत्रों में महुए से मदिरा को बढावा देना क्या ग़लत है? पवार जी को केवल बारामती जिले में ही पूरा देश नज़र आता है।
अब यक्ष सवाल ये उठाता है की आख़िर किसानो को राहत कब मिलेगी। क्या जनता ने गलती कर दिया जो चुनकर भेज दिया ? या फ़िर पवार साहब जानते ही न हों की कृषि क्या बला है?
दरअसल किसी नेता की पहचान उसके कार्य कलापों से होती है। केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार भी इसके अपवाद नहीं हैं। महाराष्ट्र की राजनीति के चतुर खिलाड़ी , राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार का मतलब क्रिकेट, शक्कर कारखाने और जमीन तक सीमित रह गया है। और इसी में उनकी रुचि है। यही वजह है की कृषि और किसान उनके चछु से ओझल हैं। अगर वाकई पवार अपना पावर (ताकत) कृषि विभाग पर लगाते तो आज किसान आत्म ह्त्या नहीं करते। जिस तरह रोम जलाता रहा और सम्राट नीग्रो बेफिक्र बासुरी बजाते रहे। वैसे ही शरद पवार भी गेंद-बल्ला और राजनीति में इतने उलझे हुए हैं कि किसानो के प्रति हितैषी नीति बनाने के लिए उनके पास फुरसत ही नहीं मिलती महाराष्ट्र के अलावा अन्य राज्यों में भी किसानो ने आत्म हत्या की है। बुंदेलखंड में तो सूखा पीड़ित किसानो को २५-३० रुपये के चेक देकर उनकी असहायता का माखौला उड़ाया गया है। महाराष्ट्र के कपास ,संतरा उत्पादक किसानो की अत्यन्त दुर्दशा हुई है। कर्ज के बोझ और अपमान जनक तकाजों से तंग आकर हजारों किसानो ने मौत को गले लगाना बेहतर समझा । जबकि पवार को यह देखने का मौका ही नहीं मिला कि किसानो के घर में चूल्हा जला या नहीं। जब ज्यादा मुसीबत आयी तो विदेश से घटिया गेहूं मंगा लिया । जिसे जानवर भी खाए तो मर जाए और इंसानों को परोस दिया। इतने सालों से पवार ने अभी तक ऐसी कोई कृषि नीति नहीं बनायी है जिससे दलहन और तिलहन का उत्पादन बढाया जा सके। आज लोगों की थाली से दाल की कटोरी गायब होती जा रही है। शक्कर के दाम अनाप शनाप हैं। यह गोरख धंधा पवार भी जानते हैं। कृषि मंत्री जी को केवल गन्ना और अंगूर उत्पादक किसान ही नजर आते हैं। कपास उत्पादक किसानो की और वो नहीं देखते।और विदर्भ के किसानो की ओर देखना पसंद ही नहीं करते। अगर अंगूर से बनने वाली शराब को बढ़ावा दिया जा सकता है तो क्या पवार साहब विदर्भ के आदिवासी क्षेत्रों में महुए से मदिरा को बढावा देना क्या ग़लत है? पवार जी को केवल बारामती जिले में ही पूरा देश नज़र आता है।
अब यक्ष सवाल ये उठाता है की आख़िर किसानो को राहत कब मिलेगी। क्या जनता ने गलती कर दिया जो चुनकर भेज दिया ? या फ़िर पवार साहब जानते ही न हों की कृषि क्या बला है?
Thursday, June 18, 2009
स्विस को स्विच करो. ..
एक कविता सुना था खाए जाओ घूस दनादन कौन पकड़ने वाला। लेकिन यहाँ पर घूस खा रहे हैं साथ ही स्विट्जर्लैंड को भारत का देसी घी भी पिला रहे हो। अब यहाँ भले सूखी रोटी खा रहे हों। लेकिन देश के मलाईदार लोग ख़ुद मलाई खाने के आलावा विदेश को भी मलाई खिला रहे हैं जैसे उनका कोई क़र्ज़ खाया हो।
चुनाव के पहले स्विस बैंक ने खूब सुर्खियाँ बटोरी लेकिन नतीजे आते ही सबके दिमाग से स्विस का स्विच ऑफ़ हो गया। स्विस बैंक में जमा काला धन जग जाहिर हैं । अगर बैंक में जमा राशि के बारे में बात किया जाए तो सबसे पहले दुनिया के सामने २००६ में रिपोर्ट आयी थी। उस रिपोर्टके मुताबिक १४५६ बिलियन डॉलरयानी करीब ७४ लाख ९८ करोड़ रूपया भारत का स्विस बैंक में जमा है। और यह राशि दुनिया के सभी देशों की जमा राशि से ज्यादा है।
एक मोटे अनुमान के मुताबिक पूर्व राष्ट्रपति डॉ। शर्मा के जमाने में इस राशि का अनुमान एक लाख करोड़ रुपया था। इसके बाद श्री के.आर.नारायण के ज़माने में अनुमान दो लाख करोड़ रूपया का था। और साल २००६ में ये राशि बढ़कर तकरीब ७५ लाख रुपये में पहुँच गयी थी। और २००९ में मार्च माह के अंत में २३ लाख करोड़ रुपये की बढोत्तरी की संभावनाएं मिली हैं। यानी भारत की लगभग ९७ लाख करोड़ रुपये स्विट्जर्लैंड मैं जमा है।
अब यक्ष सवाल ये उठता है की इतनी भारी भरकम राशि वहाँ पडी हुयी है इधर देश के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने वर्ल्ड बैंक से बड़ी रकम क़र्ज़ के रूप में उठाने का फैसला किया है। बताया जा रहा है कि यह रकम लगभग ४.२ अरब अमेरिकी डॉलर होगी। आर्थिक मंदी से जूझ रहे बैंक व्यवसाय को राहत पहुचाने के लिए ये कदम उठाया जा रहा है। अब ऐसे में यही लगता है हम कर्ज में मरेंगे क्योंकि मनमोहन सरकार कर्ज की धार से मारेगी। वैसे भी भारत वर्ल्ड बैंक का ही घी पीता रहा है । आज भी हम मानसिक गुलामी का दंश ६० साल बाद भी झेल रहे है। और देश बहाली के बजाय बदहाली की ओर जा रहा है ऐसे में जरूरत है कि हम अपने पैसों को ही लाने की करवाई क्यों न करें जिससे कर्ज के मर्ज से बचा जा सके साथ ही काला धन भी देश में आ जाएगा इसी लिए भारत सरकार को जरूरत है कि स्विस बैंक की स्विच को ऑन करें।
चुनाव के पहले स्विस बैंक ने खूब सुर्खियाँ बटोरी लेकिन नतीजे आते ही सबके दिमाग से स्विस का स्विच ऑफ़ हो गया। स्विस बैंक में जमा काला धन जग जाहिर हैं । अगर बैंक में जमा राशि के बारे में बात किया जाए तो सबसे पहले दुनिया के सामने २००६ में रिपोर्ट आयी थी। उस रिपोर्टके मुताबिक १४५६ बिलियन डॉलरयानी करीब ७४ लाख ९८ करोड़ रूपया भारत का स्विस बैंक में जमा है। और यह राशि दुनिया के सभी देशों की जमा राशि से ज्यादा है।
एक मोटे अनुमान के मुताबिक पूर्व राष्ट्रपति डॉ। शर्मा के जमाने में इस राशि का अनुमान एक लाख करोड़ रुपया था। इसके बाद श्री के.आर.नारायण के ज़माने में अनुमान दो लाख करोड़ रूपया का था। और साल २००६ में ये राशि बढ़कर तकरीब ७५ लाख रुपये में पहुँच गयी थी। और २००९ में मार्च माह के अंत में २३ लाख करोड़ रुपये की बढोत्तरी की संभावनाएं मिली हैं। यानी भारत की लगभग ९७ लाख करोड़ रुपये स्विट्जर्लैंड मैं जमा है।
अब यक्ष सवाल ये उठता है की इतनी भारी भरकम राशि वहाँ पडी हुयी है इधर देश के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने वर्ल्ड बैंक से बड़ी रकम क़र्ज़ के रूप में उठाने का फैसला किया है। बताया जा रहा है कि यह रकम लगभग ४.२ अरब अमेरिकी डॉलर होगी। आर्थिक मंदी से जूझ रहे बैंक व्यवसाय को राहत पहुचाने के लिए ये कदम उठाया जा रहा है। अब ऐसे में यही लगता है हम कर्ज में मरेंगे क्योंकि मनमोहन सरकार कर्ज की धार से मारेगी। वैसे भी भारत वर्ल्ड बैंक का ही घी पीता रहा है । आज भी हम मानसिक गुलामी का दंश ६० साल बाद भी झेल रहे है। और देश बहाली के बजाय बदहाली की ओर जा रहा है ऐसे में जरूरत है कि हम अपने पैसों को ही लाने की करवाई क्यों न करें जिससे कर्ज के मर्ज से बचा जा सके साथ ही काला धन भी देश में आ जाएगा इसी लिए भारत सरकार को जरूरत है कि स्विस बैंक की स्विच को ऑन करें।
Thursday, June 11, 2009
सीनातान कर बोलता नस्लवाद
जिस जगह को भारतीयों ने विद्या का घर बनाया। जहाँ क्रिकेट के मैदान पर चौके छक्के लगते थे। वो जगह अब नस्लवाद का ऑपरेशन थियेटर बन गया है। अब कितने आश्चर्य की बात है किजिस रंगभेद के ख़िलाफ़ अथक संघर्ष कर नेल्सन मंडेला ने दक्षिण अफ्रीका में उसका नामोनिशान मिटा डाला। और अमेरिका में अहिंसक आन्दोलन कर मार्टिन लूथर किंग ने जिसे दफ़न कर दिया। वही वर्णभेद आज आस्ट्रेलिया में अपना घिनौना सर उठाकर समूची मानवता को कलंकित कर रहा है। यह केवल भारत की ही नहीं समूचे विश्व के लिए चिंता का विषय होना चाहिए कि आस्ट्रेलिया में रंगभेद का कोढ़ पनप रहा है। और वहाँ भारतीय छात्रों पर लगातार हमले हो रहे हैं। इतना होने के बावजूद भी वहां की सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। और उल्टे भारतीय छात्रों से अपनी सुरक्षा का ख़ुद ध्यान रखने की सलाह दे रही है। ये बेहद गैरजिम्मेदारना रवैया है। आस्ट्रेलिया सरकार को हर हाल में अपने यहाँ मौजूद सभी भारतीयों की सुरक्षा का जिम्मा लेना चाहिए। पहले तो इस मामले पर आस्ट्रेलिया सरकार ने लीपापोती करने की कोशिश की। लेकिन जब मामला उजागर हुआ। तो स्वीकार कर लिया कि हमारे यहाँ रंगभेद के मामले होते रहते हैं। भारतीय छात्रों पर हमला होना ये कोई पहली बार नहीं है। इसकेपहले भी भारतीयों पर हमले होते रहे है। लेकिन तब छिटपुट की घटनाएँ थी। तब भारतीय ज्यादा शिकायत भी नहीं करते थे। क्योंकि उनके अन्दर ऐसी भावना घर कर गयी थी शिकायत करने से कोई कार्रवाई होती नहीं है।जो कोई भी मामले सामने आते थे उस पर कोई ध्यान नहीं देता था। भारत सरकार ने भी कभी ध्यान नहीं दिया। इसी के आज नतीजे हैं कि भारतीय वहां काल के गाल में समा रहे हैं।
इधर अभिनेता अमिताभ बच्चन ने आस्ट्रेलिया के एक विश्वविद्यालय से मिलाने वाली मानद उपाधि को ठुकरा दी है। और कहा है कि जब तक मेरे देश के नागरिकों के साथ अमानवीयता हो रही है तो मेरी आत्मा मुझे उस देश से सम्मान लेने की अनुमति नहीं दे रही है। अब ऐसे में आस्ट्रेलिया सरकार को होश आना चाहिए कि उसकी छवि कितनी मटियामेट हो रही है। दुनिया नस्लवाद को नकार चुकी है। ओबामा जैसे अश्वेत नेता अमेरिका के राष्ट्रपति बन चुके है। इसके बाद अगर आस्ट्रेलिया में रंगभेद पनप रहा है तो समूची दुनिया को धिक्कार करना चाहिए।
इधर अभिनेता अमिताभ बच्चन ने आस्ट्रेलिया के एक विश्वविद्यालय से मिलाने वाली मानद उपाधि को ठुकरा दी है। और कहा है कि जब तक मेरे देश के नागरिकों के साथ अमानवीयता हो रही है तो मेरी आत्मा मुझे उस देश से सम्मान लेने की अनुमति नहीं दे रही है। अब ऐसे में आस्ट्रेलिया सरकार को होश आना चाहिए कि उसकी छवि कितनी मटियामेट हो रही है। दुनिया नस्लवाद को नकार चुकी है। ओबामा जैसे अश्वेत नेता अमेरिका के राष्ट्रपति बन चुके है। इसके बाद अगर आस्ट्रेलिया में रंगभेद पनप रहा है तो समूची दुनिया को धिक्कार करना चाहिए।
Tuesday, June 9, 2009
सागर की छाती पर बन गया पुल
कानूनी दावं पेंच सियासी अखाडे की जंग और स्थानीय लोगों की नाराजगी झेलकर मुंबई करों के स्वागत के लिए सागर की छाती पर बांद्रावरली सी लिंक बनाकर तैयार हो गया है। २००१ में पुल बनाने की नींव शुरू हुई थी। और २००४ में बनाकर तैयार होना था। लेकिन इस योजना को नज़र लग गयी और काम धीरे धीरे खटाई में पड़ता चला गया। चार सौ करोड़ रुपये में बनकरतैयार होने वाला ये पुल १६०० करोड़ रुपये बनकरतैयार हुआ। प्रोजेक्ट पर काम जैसे ही काम शुरू हुआ। तो सागर की अथाह गहराई की तरह अड़चने आने शुरू हों गयी। कभी मछिमारों की मार तो कभी पर्यावरण विदों ने अड़ंगा डालते रहे। रही सही कसर सियासत भी होती रही । और नतीजे ये निकलते रहे की प्रोजेक्ट ख़ुद सागर में गोताखाने लगा। लेकिन पुल को बनाने वाली कंपनी हिन्दुस्तान कन्स्ट्रशन ने हार नहीं मानी । और सागर की अथाह गहराईको नापने के लिए आतुर रही।
लगभग ५० मंजिल की ईमारत की ऊंचाई पर बनाये गए इस पुल को केबल से बांधा गया है। और इसके केबल चीन से मंगाए गए हैं। एक केबल तकरीबन ८०० टन का वजन सहन कर सकता है।सात किलोमीटर के लंबे इस पुल ५.१ किलोमीटर का समुद्री मार्ग है। इस पुल से हर दिन करीबन सवा लाख गाड़िया गुजरेंगी।
मुसाफिरों को जो रास्ता तय करने में 40 मिनट का समय खर्च करना पड़ता था, अब यह दूरी महज 6-7 मिनट में तय की जा सकेगी। करीबन साढ़े सात किलोमीटर लम्बे इस अजूबे में ट्रैफिक का दबाव न पड़े इसके लिए इस पुल को आठ लेन का बनाया गया है। इस पुल की ऊंचाई समुद्रीय सतह से 126 मीटर से भी ज्यादा है। आम लोगों की भाषा में कहे तो मुंबई की 50 माले वाली बिल्डिंग से भी ज्यादा ऊंचा है।
पुल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरा पुल केबल्स की मदद से बांधकर खड़ा किया गया है। पुल में लगे केबल्स चीन से मंगवाए गए हैं। करीबन 432 केबल्स द्वारा बांधे गए इस पुल को जंग से बचाने के लिए खास पेस्ट और पोलिथीन से कवर किया गया है। इसके अलावा पुल में कंक्रीट और स्टील का ही ज्यादातर इस्तेमाल किया गया है।
इस सुहाने सफर के लिए लोगों को अपनी जेब भी ढीली करनी पड़ेगी और सरकार की कमाई भी खूब होगी। इस पुल से एक दिन में लगभग 80 लाख रुपये बतौर टोल टैक्स के रूप में मिलेंगे।एक अनुमान के मुताबिक पुल से हर दिन करीबन एक लाख तीस हजार गाड़ियां गुजरेंगी। लेकिन मोटरसाइकिल प्रेमियों के लिए निराशा भरी बात यह है कि इस पुल पर मोटरसाइकिल चलाने की अनुमति नहीं दी गई है।क्योंकि लम्बा समुद्री पुल होने की वजह से मोटरसाइकिल चालकों के लिए यह पुल खतरनाक साबित हो सकता है जो की तेज हवाएं और गाड़ियों की रफ्तार के चलते मोटरसाइकिल चालक का संतुलन कभी भी बिगाड़ सकती है।इस पुल से करीबन 1।30 लाख गाड़िया गुजरेंगी। एक गाड़ी से औसत टोल टैक्स 60 रुपये भी मान लिया जाए तो 78 लाख रुपये होता है इसको देखते हुए माना जा रहा है कि एक दिन में इस पुल से करीबन 80 लाख रुपये टोल टैक्स के रुप में वसूला जाएगा।
पुल की खासियत को देखकर आई आई बी ई ने ब्रिज को देश का सर्वश्रेष्ठ ब्रिज का एवार्ड दिया है। अब इस ब्रिज को जल्द ही आम जनता के हाथों में आ जाएगा जिससे सभी लोग ऊंचाई से सागर का नज़ारा ले सकते है। और भारत की आधुनिक तकनीक और बुलंद इरादों के बल पर देश का पहला समुद्री पुल बनकर तैयार हो गया है। जो सागर की गहराई और आसमान की ऊंचाई नाप रहा है। सागर की छाती पर बनकर पूरे देशवासियों का तहे दिल से स्वागत कर रहा है।
लगभग ५० मंजिल की ईमारत की ऊंचाई पर बनाये गए इस पुल को केबल से बांधा गया है। और इसके केबल चीन से मंगाए गए हैं। एक केबल तकरीबन ८०० टन का वजन सहन कर सकता है।सात किलोमीटर के लंबे इस पुल ५.१ किलोमीटर का समुद्री मार्ग है। इस पुल से हर दिन करीबन सवा लाख गाड़िया गुजरेंगी।
मुसाफिरों को जो रास्ता तय करने में 40 मिनट का समय खर्च करना पड़ता था, अब यह दूरी महज 6-7 मिनट में तय की जा सकेगी। करीबन साढ़े सात किलोमीटर लम्बे इस अजूबे में ट्रैफिक का दबाव न पड़े इसके लिए इस पुल को आठ लेन का बनाया गया है। इस पुल की ऊंचाई समुद्रीय सतह से 126 मीटर से भी ज्यादा है। आम लोगों की भाषा में कहे तो मुंबई की 50 माले वाली बिल्डिंग से भी ज्यादा ऊंचा है।
पुल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह पूरा पुल केबल्स की मदद से बांधकर खड़ा किया गया है। पुल में लगे केबल्स चीन से मंगवाए गए हैं। करीबन 432 केबल्स द्वारा बांधे गए इस पुल को जंग से बचाने के लिए खास पेस्ट और पोलिथीन से कवर किया गया है। इसके अलावा पुल में कंक्रीट और स्टील का ही ज्यादातर इस्तेमाल किया गया है।
इस सुहाने सफर के लिए लोगों को अपनी जेब भी ढीली करनी पड़ेगी और सरकार की कमाई भी खूब होगी। इस पुल से एक दिन में लगभग 80 लाख रुपये बतौर टोल टैक्स के रूप में मिलेंगे।एक अनुमान के मुताबिक पुल से हर दिन करीबन एक लाख तीस हजार गाड़ियां गुजरेंगी। लेकिन मोटरसाइकिल प्रेमियों के लिए निराशा भरी बात यह है कि इस पुल पर मोटरसाइकिल चलाने की अनुमति नहीं दी गई है।क्योंकि लम्बा समुद्री पुल होने की वजह से मोटरसाइकिल चालकों के लिए यह पुल खतरनाक साबित हो सकता है जो की तेज हवाएं और गाड़ियों की रफ्तार के चलते मोटरसाइकिल चालक का संतुलन कभी भी बिगाड़ सकती है।इस पुल से करीबन 1।30 लाख गाड़िया गुजरेंगी। एक गाड़ी से औसत टोल टैक्स 60 रुपये भी मान लिया जाए तो 78 लाख रुपये होता है इसको देखते हुए माना जा रहा है कि एक दिन में इस पुल से करीबन 80 लाख रुपये टोल टैक्स के रुप में वसूला जाएगा।
पुल की खासियत को देखकर आई आई बी ई ने ब्रिज को देश का सर्वश्रेष्ठ ब्रिज का एवार्ड दिया है। अब इस ब्रिज को जल्द ही आम जनता के हाथों में आ जाएगा जिससे सभी लोग ऊंचाई से सागर का नज़ारा ले सकते है। और भारत की आधुनिक तकनीक और बुलंद इरादों के बल पर देश का पहला समुद्री पुल बनकर तैयार हो गया है। जो सागर की गहराई और आसमान की ऊंचाई नाप रहा है। सागर की छाती पर बनकर पूरे देशवासियों का तहे दिल से स्वागत कर रहा है।
Friday, June 5, 2009
आंकडें बाजी का खेल
आम जनता के दुखदर्द और उसकी माली हालत में आला अधिकारी कितने अवगत हैं , जो एयर कंडीशन कमरों में बैठकर कागजों पर आंकडों की फसल उगते हैं। उनमें से कितने अधिकारी ऐसे हैं जिन्होंने देश के धूल भरे देहातों या मलिन बस्तियों की ख़ाक छानी है। और महसूस किया है की गरीब लोग किस हालत में रहते हैं। महंगाई की चक्की में पिसते , दुर्दशा और अभाव में जैसे तैसे रोते झींकते जीवन बिताते गरीब को सिर पर छप्पर और दो वक्त का भोजन भी मुश्किल से नसीब होता है। गरीबी रेखा के नीचे जीवन बिताने वालों की आबादी करोड़ों में है। लेकिन हमारे यहाँ के नौकरशाहों की इसकी कोई चिंता नहीं है। अब तो सर्वे भी कहता है भारत के नौकरशाह सबसे आलसी हैं। ऐसे कई सरकारी संगठन हैं जिनका काम है सरकार को आंकडे उपलब्ध कराना जिससे सरकार अग्रिम योजनाओं को क्रियान्वित कर सके। लेकिन ये आंकडे कितने सही है या वास्तविकता के करीब हैं इसपर भी बहस हो सकती है। और सरकार है की इन आंकडों को भी सही मान लेती है । आंकडों का खेल करने वाले बड़े - बड़े विशेषज्ञों का आंकलन कितना सटीक होता है इसे लेकर संदेह हो सकता है। केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन यानी सी एस ओ ने देश के प्रति व्यक्ति की मासिक आय तीन हाजार रुपये से भी अधिक बताई है। लेकिन सच्चाई ये है की साल १९९९-२००० के स्थिर मूल्य पर २००० रुपये से कुछ ही अधिक है। अब यह कितनी अजीब बात है कि सभी वास्तविक गणनाओं का आंकलन साल १९९९-२००० के स्थिर मूल्य के आधार पर किया जाता है। वरतमान मूल्यों के आधार पर नहीं। अब आप भी आंकलन कीजिये कि एक दशक पहले के आधार पर किया गया आंकलन कितना सटीक हो सकता है। वर्त्तमान मूल्यों के आधार पर तो सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की वृधि १४.२ बैठती फीसदी है। इसी तरह प्रति व्यक्ति आय वर्तमान मूल्यों के आधार पर ३७४९० रुपये वार्षिक हो गयी। स्थिर मूल्यों पर यह अभी भी २५४९४ रुपये वार्षिक यानी २१२४ रुपये मासिक चल रही है। आंकडों का यह मायाजाल उस वर्ग के लिए ठीक है जिन्हें वेतन भत्ता वृद्धि और बदलते वेतनमान का लाभ मिलता है।वेतन आयोग की सिफारिशें आम गरीब के लिए कोई मायने नहीं रखती हैं। इसके विपरीत इसके फलस्वरूप बाज़ार में अधिक पैसा पहुँचने से महंगाई बढ़ जाती है। जिससे गरीब दुखी और बेबस हो जाता है। और आज आज़ादी के ६१ साल बीत जाने के बाद भी गरीब जस के तस हैं हाँ चुनाव जब भी आते है तो गरीबों को मोहरा बनाकर मुद्दे तय होते है। नतीजा ये निकालता है कि उन्हें सस्ते दाम पर गेहूं चावल देने का भरोसा दिया जाता है और नौकरशाह और राजनेता मलाई खाते है। आखिर क्या आंकड़े सरकार इसी लिए मंगाती है कि गेहूं चावल ही देते रहें। और मलाई मिलाती रहे धन्य हैं ये आंकडे। और धन्य है आंकडों का खेल।
Thursday, May 28, 2009
मुंबई की सुरक्षा में छेद
भारत को मनमोहनी सरकार फ़िर से मिल गयी। लेकिन देश को अब अंतर्राष्ट्रीय स्तरपर एक नयी दिशा व दशा तय करनी होगी। आतंक से जूझ रहे देश को सबसे पहले श्रीलंका से सबक लेकर आतंक की लहलहाती फसल को जड़ से काटना होगा। सबसे ज्यादा आतंक का घिनौनी खेल मुंबई ने देखा है । अगर मुंबई की बात की जाए तो मुंबई न केवल अंतर्राष्ट्रीय स्तर का बड़ा शहर है।बल्कि देश की आर्थिक राजधानी भी है। लेकिन कानून व्यवस्था के ढीलेपन की वजह से हालत बिल्कुल लावारिश मालुम पड़ती है। आतंक, बमबारी, अपराधी गिरोह सभी ने इसका सुख चैन छीन लिया है। सहसा ऐसी वारदात हो जाती है की लोग सिहर उठाते हैं। और भगवान भरोसे मुंबई रहती है। कानून के रखवाले कुम्भकरण की नींद में सो रहे हैं या फ़िर अपराधियों से मिलीभगत है ? कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है की मुंबई के अंतर्राष्ट्रीय विमानतल के कार्गो टर्मिनल से दिनदहाडे चार नकाबपोश लुटेरे १०० किलो सोना चांदीभरे बॉक्स लूट ले जायेंगे। ऐसा द्रश्य अगर किसी फ़िल्म में दिखाई देता तो शायद स्क्रिप्ट राईटर की कल्पना की उड़ान मान लेते। लेकिन वास्तव में जब ऐसी दुस्साहसिक लूट होती है तो वाकईअचम्भा होता है। एअरपोर्ट की सुरक्षा को भेदकर लुटेरे लूट कर चंपत हो गए.आतंक के साए की वजह से एअरपोर्ट में भारी चौकसी रहती है। और वहाँ जांच पड़ताल के चलते पंछीभी पर नहीं मार सकता है। ऐसे में सवाल यह उठता है की ये लुटेरे वहाँ तक कैसे पहुँच गए। उनसे कोई पूछताछ कैसे नहीं हुई। एअरपोर्ट हाई सिक्योरिटी ज़ोन में आता हैं। कोई बस अड्डा नहीं की टहलते टहलते चाहे जो कोई पहुँच जाए। जिस तरह से लूटेरोंने लूट को अंजाम दिया है उससे यही लगता है की किसी के आंखों से काजल चुराने वाली बात है। क्योंके एक सामान्य यात्री को कई सुरक्षा घेरों से निकला होता है। मुंबई में सुरक्षा के नाम पर पहले भी कई छेद देखे गए है। और इसकी कीमत मुम्बई करों को जान देकर चुकानी पड़ी। अभी आतंक के छर्रे खाया घायल ताज कराह रहा है। की एक बार फ़िर सुरक्षा व्यवस्था तार तार हो गयी। आख़िर मुंबई की सुरक्षा पर कब बंद होगा छेद,अमनचैन के लुटेरों को कब तक मिलेगी छूट , और कब सागर की अथाह गहराई नापने वाले मुंबई को मिलेगी चैन।
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