Friday, January 22, 2010

सरकारी भोजन की थाली में कुपोषण

सिखों के पहले गुरू , गुरू नानक कहा करते थे कि राम दा चिड़िया राम दा खेत छक्कों चिड़ियाँ भर-भर पेट। आज सरकारी योजनायें भी पेट भर खाना खिलने की योजनायें निकाल रहीं हैं। लेकिन जब यही योजनायें भूखीं हो तो तो स्वाभाविक हैं। योजना दम तोड़ देगी और वो योजना खुद कुपोषण का शिकार हो जाएगी। जाहिर हैं इस योजना का जिसे फायदा होगा वो भी कुपोषण का शिकार होगा। ऐसे में अगर सरकार ये कहें कि बच्चों में कुपोषण दूर करना है तो सबसे पहले सरकार को अपना कुपोषण दूर करना होगा।यूनिसेफ और वाशिंगटन स्थित इंटरनॅशनल फ़ूड पालिसी रिसर्च संस्थान ने जो आंकड़े पेश किये हैं उससे साफ़ पता चलता हैं कि सरकार की कितनी योजनायें कुपोषण की शिकार हैं। बच्चोके लिए अनेक सरकरी योजनायें होने के बावजूद भी बच्चों में कुपोषण का ग्राफ बढ़ता जा रहा हैं। इससे बाल मृत्यु दर का आंकड़ा असमान छू रहा हैं। यूनिसेफ का सर्वेक्षण कहता हैं कि दुनिया भर के कुपोषित बच्चों का एक तिहाई हिस्सा भारत में निवास करता हैं। यानी हिन्दुस्तान में पांच साल से कम उम्र के छः करोड़ से ज्यादा बच्चे भूखे पेट सोने को मजबूर हैं। योनिसेफ़ के मुताबिक देश में मध्यप्रदेश की तस्वीर भयावह हैं। वहां कुपोषण के शिकार बच्चों में से सात फ़ीसदी से अधिक बच्चों का वजन औसत भार से काफी कम हैं। इसके अलावा वहां ३३ फ़ीसदी बच्चे गंभीर क्षय रोग की चपेट में हैं। केरल की स्थिति देश में सबसे अच्छी हैं। वहां २९ फ़ीसदी बच्चों का ही वजन औसत से कम मिला। जबकि क्षय रोग से पीड़ित बच्चे १६ फ़ीसदी पाए गए। भारत के महापंजीयक कार्यालय द्वारा जारी प्रतिवेदन का ही अगर अध्ययन किया जाये , तो देश में साल २००८ में नवजात शिशु मृत्यु दर प्रति एक हजार में ५३ फ़ीसदी थी। यूनिसेफ के द स्टेट ऑफ द वर्ल्ड चिल्ड्रेन रिपोर्ट में कहा गया हैं कि भारत में शिशु जन्म दर दुनिया के १४३ देशों से ज्यादा हैं। भारत के महापंजीयक के प्रतिवेदन के अनुसार नवजात बच्चों के मौत के मामले में मध्य प्रदेश पहले स्थान पर हैं। जबकि दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश हैं। इस मामले में गोवा की स्थिति बेहतर हैं। जहाँ मृत्यु दर प्रति हजार में दस है। देश की राजधानी दिल्ली में यह आंकड़ा ३५ हैं।

भूख सूचकांक

वाशिंगटन की आई.ऍफ़.आर.आर.आई। ने भूख की वैश्विक स्थिति पर एक सूचकांक जारी किया हैं जिसे जी.एच..आई। यानी ग्लोबल हंगर इंडेक्स कहतें हैं। इस सूचाकान में लिए गए आंकड़े २००० से २००५ की अवधि के हैं। इस सूचकांक में भूख को तीन तरीकों से मापा गया हैं। लोगों में कैलोरी की न्यूनता,बच्चों में कुपोषण की कमीं , और बच्चों की मृत्यु दर । जिसका मुख्या कारण कुपोषण है। जी.एच.आई.२००७ के आधार पर ११८ विकासशील देशों में भारत को 95vaan स्थान प्राप्त हुआ है। इसमें भारत का भूख २५.०३ हैं। जब कि चीन का सूचकांक ८.३७ हैं। और सूची में वह ४७वेन पायदान पर हैं। इंडेक्स के अनुसार भारत कि विकास दर के अनुपात में जी.एच.आई.में सुधार नहीं हो पाना चिंता का विषय हैं।

इसके बाद सरकार बच्चों को लुभाने के लिए जो मिड डे मील शुरू की हैं। उसमें कितनी अनियमितताएं रहती हैं। इसे सरकरी थाली बता रही हैं। अब क्या कहा जाये कि सरकार को कुपोषण हैं या फिर थाली में कुपोषण हैं।

3 comments:

jay said...
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jay said...

bahut achha likha hai aapne eksaath itni jaankari bahut mushkil hai please keep it up

prashant said...

acha likha hai bhai agar ise thoda or elaborate kar de to